बुधवार, अप्रैल 06, 2011

पालमपुर- एक सफर ताजगी भरा

हिमाचल प्रदेश की उन कुछ जगहों में से पालमपुर भी एक है जो हिल स्टेशनों जैसा सुकून तो देती हैं साथ ही आम हिल स्टेशनों की भीड-भाड से बचाये रखती है। वहीं यहां के चाय बागान वह नजारा देते हैं जो बाकी हिमाचल में दुर्लभ हैं। एक ताजगी भरी यात्रा पर ले जा रहे हैं अविनाश शर्मा:

पालमपुर हिमाचल प्रदेश की मनोरम वादियों में बसा एक छोटा सा पर्वतीय स्थल है। इस छोटी सी सैरगाह को धौलाधार पर्वतमाला के साये में फैली कांगडा घाटी का सुन्दरतम स्थान कहा जाता है। समुद्र तल से 1205 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पालमपुर सर्दी हो या गर्मी, हर मौसम में सैलानियों को आकर्षित करता है। कहते हैं पालमपुर के नाम की उत्पत्ति स्थानीय बोली के ‘पुलम’ शब्द से हुई थी। जिसका अर्थ ‘पर्याप्त जल’ होता है। वास्तव में इस क्षेत्र में जल की कोई कमी नहीं है। हर ओर जल के सोते, झरनें या नदियां मौजूद हैं। शायद इसीलिये यहां की हवाओं में शीतलता के साथ नमी भी है। हवाओं की यह नमी और पहाडी ढलानों पर खुलकर पडती सूर्य की किरणों का मिला-जुला रूप यहां की जलवायु को एक विशिष्टता प्रदान करता है। एक ऐसी विशिष्टता जो चाय की खेती के अनुकूल है। इस क्षेत्र की यह खासियत भांप कर 1849 में डॉक्टर जमसन ने यहां पहली बार चाय की खेती की थी। कुछ दशकों में कांगडा घाटी की चाय विश्व प्रसिद्ध हो गयी। आज पालमपुर शहर बडे-बडे चाय बागानों के मध्य ही बसा है।

यहां आने वाले पर्यटकों के लिये सबसे बडा आकर्षण ये हरे-भरे चाय के बागान हैं। पैदल घूमते हुए मार्ग के दोनों ओर दूर-दूर तक चाय के झाडीनुमा पौधे और उनमें पत्तियां चुनते लोग एक सुन्दर दृश्य प्रस्तुत करते हैं। कमर पर लम्बी टोकरी बांधे ये लोग अपने काम में व्यस्त रहते हैं। कुछ पर्यटक भी इन बागानों के मध्य घूमते पहुंच जाते हैं। जो अपने आप में अलग ही अनुभव होता है।

पालमपुर में ‘न्युगल खड’ नामक स्थान एक पिकनिक स्पॉट के समान है। यह स्थान पहाड के छोर पर एक खडी चट्टान पर स्थित है। जहां से बांदला जलधारा और धौलाधार की 15000 फुट से ऊंची पर्वत श्रंखलाओं का खूबसूरत नजारा दिखाई पडता है। इस स्थान से हर दिशा में प्राकृतिक सुषमा का साम्राज्य देखने को मिलता है। यहां पर्यटन विभाग का न्युगल कैफे भी है।

पास ही करीब 5 शताब्दी पुराना बांदला माता मन्दिर और विन्ध्यवासिनी मन्दिर भी दर्शनीय है। चाय बागानों के अतिरिक्त चीड व देवदार के जंगल भी पालमपुर की हरीतिमा में अपना योगदान देते हैं।

शहर का केन्द्र सुभाष चौक है जिसके आस-पास यहां का बाजार फैला है। जहां अनेक फास्ट फ़ूड पार्लर और रेस्तरां हैं। पर्यटक चाहें तो को-ओपरेटिव टी फैक्टरी में चाय की प्रोसेसिंग का काम भी देख सकते हैं। यहां पहुंचकर चाय की महक और उसका स्वाद उन्हें चाय खरीदने को भी अवश्य आकर्षित कर लेगा।

एक आदर्श पर्यटन स्थल के रूप में पालमपुर की प्रसिद्धी का एक और बडा कारण है। दरअसल इस स्थान को आधार बनाकर सैलानी कांगडा घाटी के अनेक दर्शनीय स्थल सरलता से देख सकते हैं। इसके लिये पहले सैलानी कांगडा घाटी रेलवे की टॉय ट्रेन का मनमोहक सफर तय कर पालमपुर पहुंचते हैं। जिसके आस-पास विभिन्न दिशाओं में कई महत्वपूर्ण स्थल थोडी-थोडी दूर स्थित हैं। जहां बस या टैक्सी द्वारा जाना आसान है।

13 किलोमीटर दूर स्थित अन्द्रेटा ऐसा ही एक स्थान है। यह स्थान कलाप्रेमियों का तीर्थ कहा जाता है। यह स्थान ग्रामीण व पंजाबी थियेटर को समर्पित नोरा रिचर्ड की स्मृतियों से जुडा है। वह गांधी जी की शिष्या भी थीं। उनके अलावा अन्द्रेटा का सम्बन्ध प्रसिद्ध चित्रकार पद्मश्री सोबा सिंह व बीसी सान्याल से भी है। यहां सोबा सिंह की छोटी सी कला दीर्घा है। जहां उनके बहुत से चित्रों में सोहनी-माहीवाल, हीर-रांझा, उमर-ख्य्याम व कांगडा दुल्हन जैसे प्रसिद्ध चित्र भी प्रदर्शित हैं। यहां अन्द्रेटा पॉटरी व क्राफ्ट सोसायटी का संग्रहालय भी दर्शनीय है।

प्रसिद्ध ऐतिहासिक बैजनाथ मन्दिर पालमपुर से मात्र 18 किलोमीटर दूर है। लगभग 1200 वर्ष प्राचीन यह मन्दिर वास्तुशिल्प व पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। मन्दिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग की गिनती 12 ज्योतिर्लिंगों में होती है। मन्दिर के आस-पास सुन्दर उद्यान है। जहां से पर्वत शिखरों पर मंडराते बादलों का दृश्य पर्यटकों को प्रभावित करता है। शिवरात्रि पर यहां एक विशाल मेला लगता है।

लगभग 17 किलोमीटर दूर एक और धार्मिक स्थल चामुण्डा देवी मन्दिर है। यह स्थान चामुण्डा – नंदिकेश्वर धाम के रूप में भी जाना जाता है। बाण गंगा के तट पर स्थित यह धाम एक उग्र सिद्ध पीठ है। मां काली ने जिस रूप में यहां चण्ड-मुण्ड राक्षसों का वध किया था, उस रूप को यहां चामुण्डा देवी के रूप में पूजा गया। नवरात्रों के मौके पर यहां भक्तों की अपार भीड होती है। चामुण्डा से मात्र 18 किलोमीटर दूर प्रसिद्ध पर्यटन स्थल धर्मशाला है। पालमपुर से कांगडा का व्रजेश्वरी देवी मन्दिर और ज्वालाजी का ज्वालामुखी मन्दिर भी अधिक दूर नहीं है।

व्रजेश्वरी देवी को नगरकोट कांगडे वाली माता भी कहा जाता है। वहीं ज्वालामुखी मन्दिर देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक होने के कारण प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। मान्यता है कि इस स्थान पर सती की जिव्हा गिरी थी। यहां चट्टान की दरारों से निरन्तर एक ज्वाला प्राकृतिक रूप से निकलती रहती है। नीले रंग की यह ज्वाला ही देवी का रूप मानी जाती है। मन्दिर में देवी की प्रतिमा भी विद्यमान है। ज्वालाजी मन्दिर का स्वर्ण से मढा गुम्बद अत्यन्त भव्य है। कृपालेश्वर मन्दिर, वीर भद्र मन्दिर, कुरुक्षेत्र कुण्ड व गुप्तगंगा कांगडा के अन्य दर्शनीय स्थल हैं।

कांगडा घाटी के बीड व बिलिंग स्थान साहसिक खेलों से जुडे हैं। ये स्थान पालमपुर से मात्र एक-डेढ घण्टे की दूरी पर स्थित हैं। इनकी गिनती देश के महत्वपूर्ण पैराग्लाइडिंग केंद्रों के रूप में होती है। इनके अलावा पालमपुर से कुछ चुने हुए ट्रैकिंग मार्ग भी विभिन्न दिशाओं की ओर जाते हैं जिन पर प्रकृति का वैभव ट्रैकिंग के शौकीन लोगों की प्रतीक्षा करता है। पालमपुर से कुछ दूर गोपालपुर वन्य प्राणी उद्यान है। चामुण्डा मन्दिर की ओर जाते हुए यह उद्यान भी देखा जा सकता है।

कांगडा क्वीन

कांगडा घाटी के प्राकृतिक सौंदर्य को करीब से देखने के उद्देश्य से इस मार्ग पर चलने वाली विशेष रेलगाडी कांगडा क्वीन के सफर का आनन्द उठाना उपयुक्त है। यह देश के उन कुछ रास्तों में से एक है जिन पर अब भी छोटी लाइन की गाडियों का आनन्द लिया जा सकता है। घुमावदार पहाडी रास्तों से गुजरने वाली इस ट्रेन की खिडकी से प्रकृति के अनेक रूप देखने को मिलते हैं। पठानकोट से पालमपुर तक चलने वाली यह टॉय ट्रेन पर्यटकों के लिये खासतौर पर शताब्दी शैली में चलायी जाती है। सुबह सवा आठ बजे पठानकोट से प्रस्थान कर यह ट्रेन दोपहर एक बजे के लगभग पालमपुर पहुंचती है। यूं तो मार्ग में अनेक स्टेशन हैं। किन्तु यह ट्रेन केवल कांगडा व ज्वालामुखी रोड स्टेशन पर ही रुकती है। पहाडों पर खिले रंग-बिरंगे जंगली फूल, दूर तक दिखते धान के खेत, स्लेट पत्थर की छत वाले घर और घाटी के स्थानीय सीधे-साधे लोग टॉय ट्रेन से दिखने वाले दृश्यों में विविध रंग भरते हैं। मार्ग का आकर्षण दो सुरंगें भी हैं। सुरंगों से जब ट्रेन गुजरती है तो यात्री बरबस रोमांचित हो जाते हैं। इसके अलावा पहाडी नदियों पर बने ऊंचे पुल और मार्ग के अर्द्ध गोलाकार मोड भी सैलानियों को रोमांचित कर देते हैं। वास्तव में कांगडा घाटी रेलवे का यह धीमा सफर एक यादगार सफर बन जाता है।

कांगडा घाटी के प्रमुख स्थलों की सैर करने के लिये पालमपुर एक उपयुक्त आधार स्थल है। मानसून को छोडकर आप यहां हर मौसम में जा सकते हैं। पालमपुर का निकटतम ब्रॉडगेज रेलवे स्टेशन पठानकोट है। जहां से छोटी लाइन की टॉय ट्रेन द्वारा सैलानी पालमपुर पहुंच सकते हैं। पालमपुर स्टेशन से शहर करीब तीन किलोमीटर दूर है। स्टेशन से टैक्सी द्वारा शहर तक पहुंच सकते हैं। बस मार्ग द्वारा पालमपुर मण्डी, चण्डीगढ, धर्मशाला, शिमला व दिल्ली से जुडा है। अमृतसर व चण्डीगढ के हवाई अड्डे यहां के निकटतम हवाई अड्डे हैं।

लेख: अविनाश शर्मा (दैनिक जागरण यात्रा, 26 मार्च 2006)

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