गुरुवार, अप्रैल 07, 2011

उदयपुर- एक खूबसूरत अहसास

यह लेख 27 अगस्त 2006 को दैनिक जागरण के यात्रा परिशिष्ट में छपा था।

झीलों की नगरी उदयपुर न केवल प्रकृति की इनायतों के लिये दुनियाभर में लोकप्रिय है बल्कि उसका गौरवशाली इतिहास भी सैलानियों को अपनी ओर खींचे ले आता है। अविनाश शर्मा का आलेख:

खूबसूरत झीलों, आलीशान महलों और मनोरम उद्यानों का शहर उदयपुर रोमानियत भरा ऐतिहासिक शहर है। यहां की फिजाओं में आज भी वीर राजाओं की शौर्य गाथाएं गूंजती हैं। सूर्यवंशी सिसौदिया राजाओं का मेवाड पर 1200 वर्षों तक शासन रहा। 16वीं सदी के मध्य तक इनकी राजधानी चित्तौडगढ थी। 1557 में मुगल सेनाओं के आक्रमण से चित्तौडगढ तहस-नहस हो गया तो राणा उदयसिंह ने 1559 में आयड नदी के किनारे उदयपुर शहर बसाकर, उसे मेवाड की राजधानी बनाया। उनके पुत्र महाराणा प्रताप जैसे यौद्धाओं के गौरवशाली इतिहास की यह धरती अरावली की पहाडियों के मध्य है। उस समय नगर की सुरक्षा के लिये चारों ओर मजबूर चारदीवारी बनवाई गई थी। इसके 11 भव्य द्वार थे। समय बदलने के साथ शहर का स्वरूप बदलने लगा। लेकिन आज भी उस दीवार का कुछ भाग और सूरजपोल, किशनपोल, चांदपोल, उदयपोल, हाथीपोल जैसे शेष बचे द्वार उस दौर के गवाह हैं।

इतिहास को समझने के लिये पर्यटकों को सिटी पैलेस निमंत्रण देता है। यह आलीशान महल उस दौर की बहुत सी अनमोल विरासतों को संजोये है। सिटी पैलेस अलग-अलग समय में बनवाये गये चार बडे और कुछ छोटे महलों का एक समूह है। पिछौला झील के किनारे स्थित इस राजमहल का एक भाग संग्रहालय के रूप में सैलानियों के लिये खुला है। महल के एक हिस्से में आज भी यहां के पूर्व राजाओं का परिवार रहता है और अन्य भागों को हेरिटेज होटलों का रूप दे दिया गया है।

सिटी पैलेस में प्रवेश के लिये दो द्वार हैं। पहले द्वार- बडी पोल का निर्माण 1600 ईस्वी में हुआ था। दूसरे द्वार- त्रिपोलिया गेट का निर्माण 1725 में किया गया था। महल के अंदर पर्यटक गणेश ड्योढी से प्रवेश करते हैं। मुख्य द्वार के ऊपर सूर्यवंशीय राणाओं का प्रतीक सूर्य लगा है। पहले यह सूर्य सोने से निर्मित था, जिसे बाद में बदलकर उसकी अनुकृति लगा दी गई। मूल सूर्य संग्रहालय के अंदर लगा है। प्रवेश करते ही सामने ‘राय आंगन’ है। यह महल का सबसे पुराना हिस्सा है। इसे उदयसिंह द्वारा 1565 में बनवाया गया था। राय आंगन की दीवारों पर राणा प्रताप द्वारा लडे गये युद्धों के चित्र बने हैं। "मोर चौक" कांच और टाइल्स की कला का अदभुत उदाहरण है। यहां दीवारों पर बनी मोरों की विभिन्न मुद्राएं अलग-अलग मौसम का प्रतीक हैं। इसी तरह ‘माणिक महल’ में कांच और चीनी मिट्टी की बनी सुन्दर आकृतियां देखने योग्य हैं। ऊपरी मंजिल पर एक वाटिका में घने पेड भी लगे हैं, जिसे देख आश्चर्य होता है। दरअसल यह महल के मध्य एक ऊंचे टीले पर स्थित वाटिका है। महल का यह हिस्सा ऊंचे टीले के चारों ओर बना है। जनाना महल राजपरिवार की स्त्रियों के लिये बना खास महल था। वहीं मोती महल में सैलानी शीशे की सुन्दर कारीगरी देखते हैं। महल के अन्य हिस्से में शीशमहल, दरबार हाल, शम्भू निवास आदि हैं। ऊपर बना सूरज गोखडा एक प्रकार की बालकनी है। जहां बैठकर महाराणा जनता को सम्बोधित करते थे। सिटी पैलेस में स्थित दीर्घाओं के चित्र आदि के अलावा अस्त्र-शस्त्र, राजसी प्रतीक और महाराणाओं की विरासत प्रदर्शित हैं। इनमें महाराणा प्रताप का जिरह बख्तर और ऐतिहासिक भाला विशेष आकर्षित करते हैं।

शहर के सौन्दर्य को दोगुना करती यहां की झीलों में सबसे प्रमुख पिछौला झील है। करीब चार किलोमीटर लम्बी इस झील का नाम पिछौला गांव पर पडा था। झील के मध्य है जगनिवास महल। यह महल 1730 में ग्रीष्म निवास के रूप में महाराणा जगतसिंह ने बनवाया था। पानी पर तैरता प्रतीत होता यह सफेद जलमहल बेहद सुंदर है। आज यह राजसी शान-शौकत वाला लेक पैलेस होटल बन गया है। यहां नाव से ही जाया जा सकता है।

झील के मध्य जगमन्दिर नामक एक ओर छोटा सा महल है। इसकी वास्तुकला में मुगल शैली का काफी प्रभाव है। अन्दर अनेक जगह उस दौर की चित्रकला के भी प्रमाण हैं। फतहसागर, रंगसागर, स्वरूप सागर व दूध तलाई झीलें पिछौला झील से जुडी हैं। ये झीलें ही उदयपुर के मौसम को खुशगवार बनाती हैं। इसलिये आज उदयपुर अच्छे मानसून के बाद सैलानियों की पसंदीदा सैरगाह है।

अरावली की पहाडियों से घिरी एक और बडी झील है फतह सागर। इसके मध्य में भी एक बगीचा है जिसे एक समय में रानियों के साथ विलास के लिये इस्तेमाल किया जाता था। इसे अब नेहरू गार्डन कहा जाता है। फतह सागर के सामने ‘मोती मगरी’ नामक पहाडी पर देश के महानतम यौद्धाओं में से एक और हल्दीघाटी की ऐतिहासिक लडाई के नायक महाराणा प्रताप का स्मारक है। इसे महाराणा फतह सिंह ने बनवाया था। यहां महाराणा प्रताप की भव्य प्रतिमा है। स्मारक परिसर में ही एक छोटा सा खंडहर है जो पन्ना धाय का आवास था।

सहेलियों की बाडी भी उदयपुर का एक बेहद खूबसूरत स्थल है। यह राज परिवार की स्त्रियों के आमोद-प्रमोद के लिये बनवाई गई शानदार वाटिका है। सुन्दर बगीचों के मध्य बनी छतरियां, बीच में सरोवर, संगमरमर के बने खूबसूरत हाथी और पानी में खिले कमल वाटिका की शोभा बढाते हैं। चारों तरफ बने बगीचे में कई तरह के दुर्लभ वनस्पति मिल जायेंगे, जिनमें विशालकाय पत्तों वाली मनी प्लांट की ऊंची बेल शामिल है। महाराजाओं के लिये जिस मानसून महल का निर्माण किया गया था वह सज्जनगढ पैलेस शहर के दूसरे छोर पर पहाडी पर स्थित है। आज यहां एक वन अभ्यारण्य बनाया गया है। महाराणा सज्जन सिंह द्वारा बनवाया गया गुलाब बाग गुलाब के फूल की विभिन्न किस्मों के लिये जाना जाता है। बाग में एक पुस्तकालय है जिसमें कुछ दुर्लभ पांडुलिपियां व पुस्तकें संग्रहीत हैं। कहा जाता है कि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने यही पर सत्यार्थ प्रकाश की रचना भी की थी। यहां एक छोटा सा चिडियाघर और एक खिलौना ट्रेन भी है।

साढे तीन सौ वर्ष पुराना जगदीश मन्दिर सिटी पैलेस के निकट ही है। इंडो-आर्यन शैली में बना यह मन्दिर उदयपुर का सबसे बडा मन्दिर है। जिसका निर्माण 1651 में महाराणा जगतसिंह ने करवाया था। मन्दिर के गर्भगृह में विष्णु की काले पत्थर की प्रतिमा सुशोभित है। मन्दिर प्रांगण में विष्णु वाहन गरुड की प्रतिमा भी है।

राजस्थान की धरती पारम्परिक लोक कलाओं के मामले में भी काफी समृद्ध है। उदयपुर स्थित भारतीय लोककला मंडल में पर्यटकों का ऐसी लोककलाओं से परिचय होता है। पर्यटकों के लिये यहां लोक नृत्य और कठपुतली शो का आयोजन भी होता है। देश के पश्चिमी क्षेत्र की लोककला व शिल्पकला के साथ वहां के ग्रामीण जीवन की झांकी देखनी हो तो शिल्पग्राम से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता।

आसपास

हल्दीघाटी: 1576 में मुगलों व महाराणा प्रताप के मध्य हुए भयंकर युद्ध की साक्षी। यह स्थान शहर से 40 किलोमीटर दूर है।

एकलिंगजी: मेवाड के राणाओं के कुलदेवता शिव का मन्दिर। शहर से 22 किलोमीटर दूर। मन्दिर ऊंची चारदीवारी से घिरा है जिसके अन्दर छोटे-छोटे 108 मन्दिर मौजूद हैं। ये मन्दिर भगवान शिव को समर्पित हैं। मुख्य मन्दिर के सुन्दर मंडप में शिव की चतुर्मुखी काले संगमरमर की बनी प्रतिमा विराजमान है।

नाथद्वारा: वैष्णव मत का विख्यात श्रीनाथ यानी कृष्ण मन्दिर। उदयपुर से 48 किलोमीटर दूर। इस मन्दिर का निर्माण 17वीं शताब्दी के अन्त में हुआ था। मन्दिर के गर्भगृह में भगवान की श्यामवर्णी पाषाण प्रतिमा विराजमान है। यह प्रतिमा महाराणा राजसिंह द्वारा मथुरा से लाकर स्थापित की गई थी। ब्रजभूमि के बाहर देश में कृष्ण के सबसे पूजनीय स्थानों में से एक।

जयसमंद: उदयपुर से 48 किलोमीटर दूर यह विशाल झील 17वीं सदी में महाराणा जयसिंह द्वारा बनवाई गई थी। यहां राजपरिवार की स्त्रियों के लिये ग्रीष्म ऋतु में रहने के लिये एक महल का निर्माण भी किया गया है। यह एशिया की दूसरी सबसे बडी मानव निर्मित झील है।

राजसमंद: यह झील उदयपुर से 66 किलोमीटर दूर कांकरोली में स्थित है। इसे महाराणा राजसिंह ने 1660 में बनवाया था। यहां से चारभुजाजी मन्दिर भी निकट ही है।

उदयपुर की यात्रा के साथ ही पर्यटक रणकपुर के प्रसिद्ध जैन मन्दिर (96 किलोमीटर दूर), कुम्भलगढ (84 किमी) और चित्तौडगढ (116 किमी) देखने का कार्यक्रम भी बना सकते हैं।

कैसे जायें

रेलमार्ग: उदयपुर के लिये दिल्ली, जयपुर व अहमदाबाद से सीधी दैनिक ट्रेनें हैं।

सडक मार्ग: उदयपुर दिल्ली (670 किमी), मुम्बई (739 किमी), आगरा (630 किमी), अहमदाबाद (262 किमी), माउंट आबू (185 किमी) आदि शहरों से सीधी बस सेवा से भी जुडा है।

वायुमार्ग: उदयपुर के लिये दिल्ली व मुम्बई से रोजाना उडानें उपलब्ध हैं।

कहां ठहरें

उदयपुर में देश की सबसे महंगी (1.30 लाख रु. रोजाना के कोहिनूर सूट) से लेकर सबसे सस्ती होटलें (सौ रुपये रोजाना) तक मौजूद हैं। उदय विलास, शिव निवास व लेक पैलेस में ठहरना सबके बूते की बात नहीं। लेकिन स्टेशन से सूरजपोल के रास्ते में बीसियों होटल हैं जहां कम खर्च में आराम से रुका जा सकता है।


कब जायें

उदयपुर की स्थानीय संस्कृति के रंग देखने का अवसर पर्यटकों को मेवाड उत्सव व गणगौर उत्सव के समय मिलता है। वसंत के आगमन पर होने वाले मेवाड उत्सव पर शोभा यात्रा निकलती है। इसमें यहां के लोकनृत्य, लोकगीत व आतिशबाजी का नजारा मिलता है। चैत्र मास की तीज पर गौरी की पूजा के गणगौर पर्व में सजेधजे हाथी व घोडों के जुलूस के साथ शंकर भगवान की प्रतिमा भी ले जाई जाती है। इस दिन महिलाएं पारम्परिक वेशभूषा में नजर आती हैं। बारिश अच्छी हो तो सावन के महीने में यहां की रौनक कुछ और ही होती है। सावन के हर सोमवार और फिर हरियाली अमावस्या पर फतहसागर की पाल पर लगने वाला मेला शहरवासियों की जान होता है। वैसे मौसम व प्राकृतिक खूबसूरती के लिहाज से देखा जाये तो उदयपुर जाने का उपयुक्त समय सितम्बर से मार्च के बीच है।


खरीदारी

उदयपुर में ऐसा बहुत कुछ है जो लोग यादगार के रूप में साथ ले जाना चाहेंगे। मेवाड राजपूत शैली के लघु चित्र, कशीदाकारी की वस्तुएं, नाथद्वारा की पिछवाइयां, संगमरमर पर पच्चीकारी वाले शिल्प, कठपुतली, बांधनी के कपडे व साडियां और चांदी के आभूषण आदि के अलावा भी अनेक कलात्मक हस्तशिल्प यहां मिलते हैं। उदयपुर के चारों तरफ की पहाडियों में मार्बल की बेइंतहा खानें व कटिंग मशीनें हैं। देश के कोने-कोने में यहां से मार्बल घर-दफ्तर बनाने के लिये जाता है। इसीलिये यहां मार्बल की सजावटी वस्तुओं का भी खासा बाजार है। जगदीश चौक, चेतक सर्किल, हाथीपोल, घंटाघर, शिल्पग्राम आदि स्थान खरीदारी के लिये उपयुक्त हैं। उदयपुर देशी-विदेशी सैलानियों में खासा लोकप्रिय है, इसलिये जाहिर है कि खरीदारी में उस तरह की सौदेबाजी करनी होती है, जैसी बाकी सभी पर्यटन स्थलों पर होती है।

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