गुरुवार, जुलाई 14, 2011

श्यामला देवी के नाम पर बना शिमला

प्रस्तुति: कविता

संदीप पंवार के सौजन्य से

इस बार हम आपको ले चलते हैं, बर्फ से ढकी चोटियों के शहर जहां के मौसम के बारे में सोचकर ही ठण्ड महसूस होने लगती है, जहां कुछ समय के लिये तो सडकें भी सफेद हो जाती हैं (अरे भाई बर्फ से)। जी हां, शिमला।

शिमला सभी पर्वतीय स्थलों में सबसे ज्यादा पसन्द किया जाने वाला हिल स्टेशन है। एक मामूली गांव से बढकर शिमला आज एक शाही विकसित स्थल बन चुका है। इस शहर को अपना नाम हिमालय की देवी श्यामला (मां काली का एक रूप) से मिला। अंग्रेजों के समय से ही यह शहर लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता आया है। आजादी के पहले भी शिमला अंग्रेजों का पसंदीदा हिल स्टेशन रहा है। इतना ही नहीं, सन 1864 में अंग्रेजों ने इसे गर्मियों की राजधानी घोषित किया और फिर आजादी के बाद यह 1966 तक पंजाब की राजधानी रही। आज यह हिमाचल प्रदेश की राजधानी है। यह शहर आज भी अंग्रेजों के साथ बिताये गुजरे पलों की खूबसूरती तथा अपने हिमपात और सुहाने मौसम के कारण लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। हिमाचल प्रदेश के मध्य में स्थित यह शहर देश की राजधानी दिल्ली से 342 किलोमीटर दूर है। 18 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला यह शहर समुद्र तल से 2213 मीटर ऊंचा है। यहां का तापमान सर्दियों में 4 से 18 डिग्री और गर्मियों में 30 डिग्री तक हो जाता है। यानी सर्दियों में यहां बहुत ठण्ड रहती है।

तो चलिये थोडा शिमला घूम आये:

शिमला पहुंचने के साधन

शिमला जाने के लिये आप रेल, सडक या वायुयान, किसी भी साधन से जा सकते हैं।

हवाई यातायात: दिल्ली और चण्डीगढ से नियमित उडानें हैं जो जुब्बलहट्टी तक जाती हैं। जुब्बलहट्टी शिमला से 20 किलोमीतर दूर है।

रेल यातायात: शिमला के करीबी रेलवे स्टेशन कालका और चण्डीगढ हैं। दिल्ली से जाने वाली हिमालयन क्वीन तथा शताब्दी एक्सप्रेस कालका तक जाती हैं। एक और गाडी हावडा-कालका मेल दिल्ली से होते हुए जाती है। कालका तक जाने के बाद आप आगे टॉय ट्रेन से जा सकते हैं।

सडक यातायात: दिल्ली के आई एस बी टी से डीलक्स कोच बसें चण्डीगढ होते हुए शिमला पहुंचती हैं। आप चाहें तो चण्डीगढ से किराये पर कार लेकर भी जा सकते हैं।

लो, अब हम शिमला पहुंच गये। पर घूमने से पहले हम थोडा रिफ्रेश हो जाते हैं।

कहां ठहरें: शिमला में रहने के काफी अच्छे साधन हैं। इनमें से होटल सिसिल, होटल वुडविले पैलेस, ओबराय क्लार्क्स होटल, हिमलैण्ड होटल ईस्ट खास हैं।

अपने होटल में थोडे आराम के बाद आप घूमने के लिये तैयार होंगे। तो आइये, यहां के दर्शनीय स्थल देखने चलें।

शहर कैसे घूमें: शहर घूमने के लिये आप यहां से टैक्सी किराये पर ले सकते हैं।

मनोरंजक स्थल:

इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज: 1888 में बनी यह संस्था शहर से चार किलोमीटर की दूरी पर है। अंग्रेजों के शासन में बनाई गई इसकी इमारत अपनी बढिया वास्तुकला के साथ साथ सुन्दर बागों के लिये जानी जाती है पर इस भव्य इमारत का लुत्फ उठाने के लिये पहले टिकट लेनी पडेगी।

तारा देवी मन्दिर: शिमला से 11 किलोमीटर दूर पर्वत की चोटी पर स्थित यह मन्दिर मां तारा देवी को समर्पित है। बालूत के पेडों से घिरे इस मन्दिर से आप शिमला की घाटियों का विहंगम दृश्य देख सकते हैं।

संत माइकल्स चर्च: किसी समय में यह चर्च अपने स्टेन ग्लास वर्क के लिये भारत का सबसे सुन्दर चर्च माना जाता था। यह चर्च आशा, विश्वास, सहनशीलता और विनम्रता का प्रतीक है।

चैडविक फाल्स: घने जंगलों से घिरा यह वाटर फाल शिमला से 7 किलोमीटर की दूरी पर है। यह 67 मीटर की ऊंचाई से गिरता है।

प्रोस्पेक्ट हिल: यह एक पिकनिक स्पॉट है जो शिमला बिलासपुर रास्ते पर स्थित है। शिमला के पश्चिम में पांच किलोमीटर दूर यह स्थल अपने आसपास के क्षेत्र की खूबसूरती को दर्शाता है।

हिमाचल स्टेट म्यूजियम: हिमाचल प्रदेश की मूर्तियों, सिक्कों तस्वीरों आदि का यह संग्रहालय शहर से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

संकटमोचन मन्दिर: शिमला-चण्डीगढ रोड पर स्थित यह मन्दिर श्री हनुमान को समर्पित है। इस मन्दिर से आप शिमला की चहल-पहल को देख सकते हैं।

लक्कड बाजार: रिज से कुछ ही दूरी पर स्थित लक्कड बाजार में आप लकडी के विभिन्न रूपों और आकारों को देख सकते हैं। चाबी के छल्ले, छडी, खिलौने आदि लकडी से बना हुआ सामान आप यहां सस्ते दामों पर खरीद सकते हैं।

रिज: रिज एक ऐसी जगह है जहां जंगल की वादियों में प्रकृति के बीच हर कोई अपना समय बिताने जरूर आना चाहेगा। यहां बैठकर आप थोडे समय के लिये अपनी सभी चिंताएं भूल जायेंगे।

तो लो, हमने शिमला तो घूम लिया, अब आओ खाना पीना भी हो जाये।

खाना कहां से खायें?

-माल के स्कैंडल पॉइण्ट में स्थित डेवीकोस रेस्तरां की पाव भाजी बहुत मशहूर है।

-माल के पूर्वी छोर में स्थित बालजीस रेस्तरां भारतीय तथा पश्चिमी व्यंजनों के लिये विख्यात है।

-होटल ओबराय क्लार्क भी अपने व्यंजनों के लिये मशहूर है।

-मिल्क शेक, काफी और स्नैक्स आदि के लिये आप पार्क कैफे जा सकते हैं।

खाना पीना हो गया हो तो, थोडी शापिंग भी कर लें।

शापिंग कहां से करें

शिमला के माल में बहुत से बडे शोरूम हैं।

-स्कैण्डल पाइण्ट के पास हिमाचल एम्पोरियम के कुल्लू शालें, हाथ से बुने मोजे, दस्ताने, टोपियां आदि प्रसिद्ध हैं।

-दीवानचंद आत्माराम का शोरूम गर्म कपडों के लिये विख्यात है।

-स्कैण्डल पाइण्ट से थोडी दूर तिब्बतन मार्किट में आप जीन्स, टी-शर्ट , बैग, जैकेट आदि खरीद सकते हैं।

-लक्कड बाजार में लकडी की चीजें खरीद सकते हैं।

अब जब शिमला आये ही हैं, तो उसके आसपास भी घूम आयें।

शिमला के आसपास के मनोरंजक स्थल

नालदेहरा: खुली धूप से भरा यह हरा भरा मैदान शिमला से 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां का गोल्फ कोर्स और देवदार के जंगल अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिये विख्यात हैं। यहां रहने के लिये लकडी की झोंपडियां भी मौजूद हैं।

चैल: विश्व का सबसे ऊंचा क्रिकेट मैदान तथा पोलो ग्राउण्ड वाला यह क्षेत्र कभी पटियाला की राजधानी था। तीन पहाडियों पर बने इस क्षेत्र की पहली चोटी पर चैल पैलेस, दूसरी चोटी पर चैल गांव और तीसरी चोटी पर स्नो व्यू मैंशन है। यहां से तीन किलोमीटर आगे एक वाइल्डलाइफ सेंचुरी है।

फागु: शिमला से 22 किलोमीटर दूर यह स्थान दूर ऊंचे पर्वतों का मनमोहक दृश्य दिखाता है। यहां का देशूमाता मन्दिर और सेबों के बाग भी यहां की सुन्दरता को बढाते हैं। यह स्थल ट्रेकिंग के शौकीन लोगों को भी जरूर पसन्द आयेगा।

कुफरी: कुफरी अपनी बर्फ से ढकी चोटियों के लिये मशहूर है। यहां एक हिरण पार्क भी है तथा कई अन्य पिकनिक स्पाट भी हैं। शिमला से 12 किलोमीटर दूर इस मंजिल तक आप आधे घण्टे में पहुंच जायेंगे।

मशोबरा: यह एक छोटा सा गांव है जो शिमला से 13 किलोमीटर दूर शिमला-नालदेहरा के रास्ते पर स्थित है। घने जंगलों से घिरा यह गांव अपनी हरियाली के लिये जाना जाता है तथा यहां का दुर्गा देवी का मन्दिर भी देखने योग्य है।

तो बताइये, कैसा लगा शिमला? अब तो आप शिमला के बारे में बहुत कुछ जान गये होंगे।


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बुधवार, जुलाई 13, 2011

दिलकश पोखरा

भारत का सबसे निकट पडोसी नेपाल प्रकृति व संस्कृति, दोनों में हमसे काफी साझा करता है। इसलिये कई बार तो लोग नेपाल जाने को विदेश जाना भी नहीं मानते। भारत से नेपाल जाने के कई रास्ते हैं और कई वजहें भी। प्रकृति की कई बेमिसाल देन नेपाल में मौजूद हैं।

पोखरा नेपाल में दूसरी सबसे ज्यादा घूमे जाने वाली जगह है। यह 827 मीटर ऊंचाई पर स्थित है और ट्रेकिंग और राफ्टिंग के लिये भी प्रसिद्ध है। पोखरा की अदभुत प्रकृति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि महज 800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस जगह से 8000 मीटर ऊंचाई वाली चोटियां बस हाथ बढाकर छू लेने वाले फासले पर स्थित है। दुनिया में कहीं और आपको इतनी जल्दी एक हजार मीटर से आठ हजार मीटर ऊंचाई का सफर तय करने को नहीं मिलेगा।

फेवाताल का दृश्य और पीछे स्थित माछापुछे (6977 मीटर) पर्वत की शोभा मानों शान्ति और जादू के सम्मोहन में बांध लेती है। चारों तरफ पर्वतों से घिरी पोखरा घाटी घने जंगलों, प्रवाही नदियों, स्वच्छ झीलों और विश्व प्रसिद्ध हिमालय के दृश्यों के लिये विख्यात है। काठमाण्डू से 200 किलोमीटर पश्चिम में स्थित यह नगर काठमाण्डू और भैरहवा (नेपाल का एक सीमान्त शहर जो भारत के गोरखपुर से नजदीक है) से वायु और सडक मार्ग से जुडा है। पोखरा धौलागिरी, मनासलू, माछापुछे, अन्नपूर्णा जैसी महत्वपूर्ण चोटियों और अन्य हिमालयी दृश्यों का आनन्द प्रदान करता है।

क्या देखें

पर्वतीय दृश्य: पोखरा का सबसे विलक्षण दृश्य अन्नपूर्णा पर्वत श्रेणी का है जो रंगमंच के पर्दे की शोभा प्रदान करता है। वैसे अन्नपूर्णा पर्वत श्रेणी में सबसे ऊंची चोटी अन्नपूर्णा (8091 मीटर) है, लेकिन माछापुछे पडोस की सभी चोटियों पर शासन करती है। माछापुछे शिखर मेहराबदार शिखर है।

फेवा झील: यह नेपाल की दूसरी सबसे बडी झील है जो पोखरा के आकर्षण का केंद्र है। उसका पूर्वी किनारा जो बैडैम या लेकसाइड के नाम से लोकप्रिय है। यह पर्यटकों के पसन्द का निवास स्थल है जहां अधिकतर होटल, रेस्तरां और हैंडीक्राफ्ट की दुकानें अवस्थित हैं।

बेगनास और रूपा झील: ये दोनों झीलें पोखरा से 15 किलोमीटर दूरी पर स्थित हैं और अपने चारों ओर स्वच्छ वातावरण के कारण पूर्णतया नैसर्गिक अनुभूति प्रदान करते हैं।

वाराही मन्दिर: फेवा झील के मध्य भाग में निर्मित यह पैगोडा शैली का दोमंजिला मन्दिर देवी शक्ति का उपासना स्थल है।

डेविस फाल: डेविस झरना एक विस्मयकारी झरना है जो पोखरा से दो किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में है।

गुप्तेश्वर गुफा: यह एक धार्मिक गुफा है जो डेविस फाल के नजदीक है। यह गुफा तीन किलोमीटर लम्बी है। गुफा के अन्दर एक शिवलिंग स्थित होने के कारण हिन्दुओं के लिये इस गुफा का विशेष महत्व है।

विंध्यवासिनी मन्दिर: देवी भगवती जो शक्ति का ही एक दूसरा स्वरूप समझी जाती हैं, यह मन्दिर उनकी पूजा का स्थल है।

कैसे पहुंचें

सभी विदेशी यात्री जो भारत से नेपाल जाना चाहते हैं उन्हें नेपाल-भारत सीमा पर जिन रास्तों का इस्तेमाल करना चाहिये, वे हैं:

1. काकडभिट्टा

2. वीरगंज

3. बेलहिया, भैरहवा

4. नेपालगंज

5. धनगढी और

6. महेंद्र नगर

सडक मार्ग से अपनी गाडी लेकर आने वाले पर्यटकों के पास नेपाल की सीमा में प्रवेश के लिये अंतर्राष्ट्रीय परिवहन प्रपत्र होना अनिवार्य है।

· दिल्ली से काठमाण्डू के लिये सीधी निजी बसें उपलब्ध होती हैं जो काठमाण्डू 28 घण्टे में पहुंचाती हैं।

· वाराणसी से सुनौली (भारत-नेपाल सीमा) की बसें छूटती हैं और दस घण्टे में पहुंचाती हैं। सुनौली से काठमाण्डू की यात्रा आठ घण्टे और पोखरा की छह घण्टे में पूरी की जाती है। गोरखपुर से भी सुनौली के लिये लगातार बसें छूटती हैं जहां पहुंचने के लिये लगभग तीन घण्टे लगते हैं।

· लखनऊ से- लखनऊ से बसें तीन घण्टे में रूपैडिहा (भारत-नेपाल सीमा) तक पहुंचाती हैं। रूपैडिहा से काठमाण्डू की यात्रा 15 घण्टे की और पोखरा की 14 घण्टे की है।

· पटना से रक्सौल के लिये चलने वाली बसें छह घण्टे में रक्सौल मुख्य टर्मिनल पहुंचा देती हैं। रक्सौल से काठमाण्डू तक की यात्रा आठ घण्टे में और पोखरा की छह घण्टे में तय की जाती हैं।

· सिलीगुडी से नेपाल की सीमा में प्रवेश के लिये पानी टंकी और काकडभिट्टा (नेपाल) तक 36 किलोमीटर की दूरी तय करनी पडती है। काकडभिट्टा से काठमाण्डू के लिये बसें मिलती हैं जो 14 घण्टे में काठमाण्डू पहुंचाती हैं।

· इसके अलावा दिल्ली से करीब आठ घण्टे में और नैनीताल से करीब साढे तीन घण्टे में बनबसा पहुंचा जा सकता है। बनबसा से महेन्द्रनगर की दूरी करीब 13 किलोमीटर की है जहां से काठमाण्डू के लिये दिन-रात बसों की सुविधा उपलब्ध है।

भारतीय मुद्रा: नेपाल के सभी बैंक एक्सचेंज काउण्टरों पर भारतीय रुपये स्वीकार हैं। लेकिन 500 और 1000 रुपये के नोट नेपाल लाना वर्जित और दण्डनीय हैं। सभी मुख्य क्रेडिट कार्ड बडे-बडे होटलों और सभी डिपार्टमेंटल स्टोर में स्वीकार किये जाते हैं। भारतीय स्टेट बैंक द्वारा जारी किये गये ट्रैवलर्स चैक के बदले भी आसानी से नेपाली रुपये भुनाये जा सकते हैं।

यह लेख दैनिक जागरण के यात्रा परिशिष्ट में 26 अप्रैल 2009 को प्रकाशित हुआ था।


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मंगलवार, जुलाई 12, 2011

नीमराना फोर्ट- आज मैं ऊपर, आसमां नीचे...

यात्रा वृत्तान्त: उपेंद्र स्वामी

रोमांच की तलाश इंसान को कहां कहां नहीं ले जाती, फिर नीमराना फोर्ट तो दिल्ली से महज सवा सौ किलोमीटर की दूरी पर है। इस साल जनवरी में जब से फ्लाइंग फोक्स के बारे में सुना था, तब से उसमें हाथ आजमाने का बहुत मन था क्योंकि वह न केवल भारत का अपनी तरह का अकेला जिप टूर है बल्कि इसकी एक जिप लाइन दक्षिण एशिया में सबसे लम्बी और समूचे एशिया में दूसरी सबसे बडी है।

जैसी शुरू में मेरे मन में थी, वैसी ही आपके मन में सामान्य जिज्ञासा हो सकती है कि आखिर यह जिप टूर है क्या बला? जिप टूर दरअसल वह सफर है जो लोहे के तारों पर हुक से बंधे होकर (लटककर) किया जाता है। आपने तस्वीरों, फिल्मों या हकीकत में लोगों को नदियां पार करते देखा होगा। ठीक उसी तरह अब यह जिपलाइन किसी जगह को नये अंदाज व नई निगाह से देखने का रोमांच है। पहाड पर आप एक जगह से दूसरी जगह तक का सफर इसी तार के जरिये करते हैं।

दिल्ली से सटी अरावली की पहाडियों में राजस्थान की सीमा में घुसते ही स्थित नीमराना फोर्ट भारत के इस अकेले जिपलाइन टूर का मेजबान है। फ्लाइंग फोक्स इसे संचालित करने वाली कम्पनी है। फ्लाइंग फोक्स के मेहमान के तौर पर जब मैं नीमराना फोर्ट में ही फ्लाइंग फोक्स के दफ्तर पहुंचा तो वहां मौजूद इंस्ट्रक्टरों ने बडी गर्मजोशी से स्वागत किया। कपडों, उपकरण व सामान की आरम्भिक तैयारी के बाद हम पहाडी की चोटी की तरफ चले। हमें पहले ही सीट हारनेस पहना दिया गया था। सीट हारनेस मजबूत बेल्टों का वह जाल होता है जो कमर पर पहन लिया जाता है। शरीर का वजन उठाने में सक्षम यह हारनेस कमरपेटी व जांघ पर कस जाती है, उसमें हुक (जिन्हें कैराबिनर्स कहा जाता है) लगे होते हैं जो शरीर को किसी तार या रस्सी से लटका देते हैं। रॉक क्लाइंबिंग, रैपलिंग, रिवर क्रासिंग और पर्वतारोहण में भी इसी तरह के उपकरण काम आते हैं।

तो ये कमरपेटियां बांधे हुए हमने पहाडी पर चढना शुरू किया। हमारे साथ दो कुशल व काबिल अंग्रेज इंस्ट्रक्टर थे। (आप चाहें तो आपको हिन्दीभाषी इंस्ट्रक्टर भी मिल सकते हैं) लगभग बीस मिनट की चढाई के बाद हम चोटी पर आ पहुंचे। वहां से नीमराना फोर्ट पैलेस, जो खुद पहाडी काटकर बनाया गया था, छोटा सा नजर आता है। चोटी पर एक प्लेटफार्म बना हुआ था, यह पहली जिपलाइन की शुरूआत थी। यही पर एक छोटा सा हिस्सा अभ्यास और सफर की पूरी प्रक्रिया समझाने के लिये भी है। जिपिंग (इसे यही कहा जाता है) को समझने, सारे एहतियात जानने, खुद को तैयार करने में 15-20 मिनट का वक्त लग गया। इंस्ट्रक्टर उस इलाके के इतिहास की भी जानकारी देते हैं। बहरहाल, इसके बाद शुरू हुआ असली रोमांच।

दो इंस्ट्रक्टरों में से एक पहले आया, वह दूसरे प्वाइण्ट पर पहुंचने के बाद वॉकी-टॉकी से पीछे वाले इंस्ट्रक्टर को सब ठीक-ठाक होने की सूचना देता है, तभी बाकी लोग जाना शुरू करते हैं। चूंकि सफर पहाडी की चोटियों पर होता है, इसलिये मौसम का भी ध्यान रखा जाता है। तेज बारिश, हवा या बिजली में जिप टूर को रोकना पडता है। आगे जाने वाला इंस्ट्रक्टर हवा के असर को भी भांप लेता है। हालांकि पहले प्वाइंट पर अभ्यास के दौरान हमें यह बताया गया था कि हवा पीछे से या सामने से आये तो कैसे अपनी गति को नियन्त्रित रखना है, कैसे गति बढायें या ब्रेक लगायें, हवा तिरछी बह रही हो तो कैसे अपना सन्तुलन बनाये रखना है, इंस्ट्रक्टर के इशारे दूर से कैसे समझे जाते हैं, वगैरह वगैरह।

जिपिंग की पूरी प्रक्रिया मैकेनिकल है यानी लोहे के तार के झोल से शरीर को मिलने वाली गति से हम एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक पहुंचते हैं। खींचने की कोई मशीनी प्रक्रिया नहीं है। ऐसे में यदि हम किसी बिन्दु से थोडा पीछे रह जाते हैं तो सेना के जवानों की तरह अपने हाथों से खींच-खींचकर खुद को प्लेतफार्म तक पहुंचाते हैं। तो इंस्ट्रक्टर के ओके कहने के बाद मैं आगे बढा। हारनेस से दो बेल्ट बंधी होती हैं- एक में पुली लगी होती है, जिसके जरिये हम रस्सी पर बढते हैं और दूसरे में अतिरिक्त सुरक्षा के लिये कैराबिनर। हाथों में मजबूत दस्ताने होते हैं। जितनी भी घबराहट होती है वह पहले जिप के लिये शुरू करते वक्त होती है, क्योंकि अनुभव नया होता है। उसके बाद सिर्फ मजेदार रोमांच है। पहली जिप में थोडी हवा मिली क्योंकि वह पहाडी की चोटी पर ही एक सिरे से दूसरे सिरे तक है। उसकी लम्बाई खासी है (350 मीटर) लेकिन सतह से ऊंचाई ज्यादा नहीं है। इसलिये जिपिंग के पहले अनुभव के लिये बिल्कुल दुरुस्त है। फ्लाइंग फोक्स ने इन जिप लाइनों के नाम भी बडे रोचक रखे हैं, जैसे कि पहली जिपलाइन का नाम है- टू किला स्लैमर।

पहली जिप जहां उतारती है, वहां से दूसरे प्लेटफार्म तक थोडा नीचे पहाडी पर पैदल उतरना होता है। दूसरी जिप (वेयर ईगल्स डेयर) सबसे लम्बी है, लगभग चार सौ मीटर। नीचे अरावली पहाडियों के बीच नीमराना फोर्ट और कस्बे के विहंगम और खूबसूरत नजारे के लिये सबसे उपयुक्त। पहली जिप के बाद मन से डर तो भाग चुका था। मजा आने लगा था। मैं अपने भीतर के फोटोग्राफर को रोक न पाया और बीच में रुककर अपने कैमरे से नीचे नीमराना फोर्ट की तस्वीरें खींचने लगा। यह यकीन हो चला था कि बेल्ट मुझे तार से लटकाये रखने में खासी सक्षम है। इसलिये एक हाथ से बेल्ट को पकडकर अपना सन्तुलन बनाये रखा तो दूसरे हाथ से कैमरे को थामकर क्लिक करने लगा।

एक परिंदे की नजर से नीचे का वह हवाई नजारा अदभुत था। हालांकि उसका खामियाजा मैंने यह भुगता कि तीसरे प्लेटफार्म तक मुझे अपनी सारी ताकत लगाकर खुद को खींचकर ले जाना पडा। तीसरी जिप (गुडबॉय मिस्टर बॉण्ड) छोटी सी है, महज नब्बे मीटर, बाकी जिपलाइनों की चमक में आप इसे भूल ही जायेंगे। चौथी जिपलाइन (हाई एज अ काइट) भी पहली और दूसरी की तुलना में छोटी, ढाई सौ मीटर ही है लेकिन यह जिपलाइन सतह से सबसे ऊपर (बीच में लगभग सौ फुट से ज्यादा) है। पांचवी जिपलाइन (बिग बी) 175 मीटर ही लम्बी है लेकिन यह पांचों में सबसे तेज है, इतनी कि आखिरी प्लेटफार्म तक पहुंचते-पहुंचते हो सकता है कि आपको सामने इंस्ट्रक्टर यह इशारा करता नजर आये कि अपनी गति धीमी करें और आपको दस्ताने पहने हाथ से तार को रगडकर ब्रेक लगाना पडे। आखिरी प्लेटफार्म महल की ऊपरी चहारदीवारी पर ही है। इस तरह पांचवी जिप हमें फिर से महल में पहुंचा गई। सफर जहां से शुरू हुआ था, लगभग दो घण्टे में वहीं खत्म हुआ। दिल में रोमांच, नीचे जमीन और सैंकडों फुट ऊपर परिंदों की तरह हवा में तार से लटका मैं। आजमाइये, मेरी ही तरह आपके लिये भी यह यादगार अनुभव रहेगा।

पूरी हिफाजत

यह तो अफसोस की बात है ही कि भारत में रोमांचक खेलों के नियमन में कोई नियम-कायदे बने हुए नहीं हैं। लेकिन फ्लाइंग फोक्स की जिपिंग इस तरह के रोमांच के लिये नवीनतम यूरोपीय मानकों पर खरी उतरती है। पूरे टूर की डिजाइन व निर्माण स्विस इंजीनियरों ने किया है। सभी उपकरण भी स्विट्जरलैण्ड व फ्रांस से आयातित हैं। संचालन का काम इस क्षेत्र में 15 साल से ज्यादा का अनुभव रखने वाले ब्रिटिश विशेषज्ञों के हाथ में है। रोज हर उपकरण की बारीकी से जांच होती है। फ्लाइंग फोक्स का कहना है कि तार तो इतना मजबूत है कि अगर इतनी बडी हारनेस मिल जाये तो हम हाथी तक को जिप करा सकते हैं। नीमराना में डेढ हजार से ज्यादा लोग अब तक इस रोमांच का मजा ले चुके हैं। फ्लाइंग फोक्स का लक्ष्य इस साल के लिये पांच हजार का है। अपनी जमी-जमाई नौकरियां छोडकर नीमराना में इस रोमांच की नींव रखने वाले ब्रिटेन के रिचर्ड मैककेलम और जोनाथन वाल्टर अब इस अनुभव को भारत के बाकी हिस्सों में भी ले जाने की योजना बना रहे हैं।

जिप, जैप, जू......

इसके लिये नीमराना फोर्ट पैलेस पहुंचना होता है। फ्लाइंग फोक्स का बेस यहीं है। नीमराना कस्बा राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 8 पर जयपुर जाते हुए दिल्ली से 125 किलोमीटर दूर है। फोर्ट हाइवे से अन्दर लगभग तीन किलोमीटर जाकर है।

14वीं सदी का नीमराना फोर्ट पैलेस एक हैरीटेज होटल है और हैरीटेज होटल के रूप में संचालित हो रही देश की सबसे पुरानी इमारतों में से एक है। दिल्ली व आसपास के लोगों के लिये यह एक वीकएण्ड डेस्टिनेशन के रूप में या महज दिनभर की सैर व पिकनिक के लिये भी लोकप्रिय है।

दस साल से ज्यादा उम्र, 4 फुट 7 इंच से ज्यादा लम्बाई, 43 इंच से ऊपर कमर और 127 किलो से कम वजन वाला कोई भी व्यक्ति यहां जिपिंग कर सकता है।

किराया है वयस्क के लिये 1495 रुपये और बच्चों के लिये 1195 रुपये। लेकिन एडवांस बुकिंग कराने पर इसमें 15 फीसदी तक छूट मिल जाती है। इसके अलावा समूह और परिवारों के लिये टिकटों में अलग से रियायत है। एक खास बात यह भी है कि फ्लाइंग फोक्स का टिकट लेने पर नीमराना फोर्ट पैलेस में प्रवेश का शुल्क नहीं लगता, जो आमतौर पर 12 साल से ज्यादा उम्र के लोगों के लिये 500 रुपये है (केवल होटल में नहीं ठहरने वालों के लिये)। आप सीधे नीमराना जाकर भी टिकट ले सकते हैं लेकिन तब सीट मिलने की गारण्टी नहीं रहती।

फोर्ट से रवाना होने के बाद पांचों जिपलाइन करके वापस पहुंचने में लगभग दो से ढाई घण्टे का समय लगता है। बहुत कुछ हवा, ग्रुप की संख्या और हिम्मत पर भी निर्भर करता है। एक ग्रुप में अधिकतम दस लोग होते हैं।
सामान्य दिनों में जिपिंग टूर सवेरे 9, 10 व 11 बजे और दोपहर बाद 1, 2 व 3 बजे शुरू होते हैं।

यह लेख दैनिक जागरण के यात्रा परिशिष्ट में 2 जून 2009 को प्रकाशित हुआ था।


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सोमवार, जुलाई 11, 2011

फिर चलें लद्दाख

कई रोमांचप्रेमी ऐसे हैं जो हर साल जून-जुलाई-अगस्त में लद्दाख जाने को सालाना तीर्थयात्रा की तर्ज पर लेते हैं। लेकिन आप रोमांचप्रेमी न हों तो भी लद्दाख की खूबसूरती देखने लायक है। मौसम और माहौल तैयार है, बस आपके आने की देरी है। लद्दाख हिमालयी दर्रों की धरती है। अपने अनूठे प्राकृतिक सौंदर्य के लिये लद्दाख दुनिया में बेमिसाल है। यहां बौद्ध संस्कृति की स्थापना दूसरी सदी में ही हो गई थी। इसी के चलते इसे मिनी तिब्बत भी कहा जाता है। लद्दाख की ऊंचाई कारगिल में 9000 फुट से कराकोरम में 25000 फुट तक है।

मेले व त्यौहार

लद्दाख क्षेत्र में मूलतः बौद्ध धर्म की मान्यता है। पूरे इलाके में हर तरफ आपको बौद्ध मठ देखने को मिल जायेंगे। ज्यादातर बडे मठों में हर साल अपने-अपने आयोजन होते हैं। तिब्बती उत्सव आमतौर पर काफी जोश व उल्लास के साथ मनाये जाते हैं। मुखौटे और अलग-अलग भेष बनाकर किये जाने वाले नृत्य-नाटक, लोकगीत व लोकनृत्य यहां की संस्कृति का प्रमुख अंग हैं। यहां की बौद्ध परम्परा का सबसे बडा आयोजन हेमिस का होता है। गुरू पदमसम्भव के सम्मान में होने वाला यह आयोजन तिथि के अनुसार होता है। इसी तरह ज्यादातर मठ सर्दियों व गर्मियों में अपने-अपने जलसे करते हैं। हेमिस समेत आठ बौद्ध उत्सव तो जुलाई व अगस्त में ही होते हैं। पर्यटन विभाग भी अपने स्तर पर हर साल सितम्बर में पंद्रह दिन का लद्दाख उत्सव आयोजित करता है।

कैसे जायें

वायु मार्ग से: लेह के लिये दिल्ली, जम्मू व श्रीनगर से सीधी उडानें हैं। ये उडानें लगभग प्रतिदिन हैं।

सडक मार्ग से: लेह जाने के दो रास्ते हैं। एक श्रीनगर से (434 किलोमीटर) और दूसरा मनाली से (473 किलोमीटर)। दोनों रास्ते जून से नवम्बर तक ही खुले रहते हैं। साल के बाकी समय में वायु मार्ग ही एकमात्र रास्ता है। दोनों ही रास्ते देश के कुछ सबसे ऊंचे दर्रों से गुजरते हैं। लेकिन जहां मनाली से लेह का रास्ता बर्फीले रेगिस्तान से होता हुआ जाता है, वहीं श्रीनगर का रास्ता अपेक्षाकृत हरा-भरा है। दोनों ही रास्तों पर राज्य परिवहन निगमों की बसें चलती हैं जो दो-दो दिन में सफर पूरा करती हैं। वैसे श्रीनगर व मनाली, दोनों ही जगहों से टैक्सी भी ली जा सकती है।

कहां ठहरें:

लेह में ठहरने के लिये हर तरह की सुविधा है। ज्यादातर होटल चूंकि स्थानीय लोगों द्वारा चलाये जाते हैं इसलिये उनकी सेवाओं में पारिवारिक लुत्फ ज्यादा होता है। यहां गेस्ट हाउसों में तीन सौ रुपये दैनिक किराये के डबल बेडरूम से लेकर बडी होटल में 2600 रुपये रोजाना तक के कमरे मिल जायेंगे। लेकिन यहां घरों से जुडे गेस्ट हाउसों में रहना न केवल किफायती है बल्कि लद्दाखी संस्कृति व रहन-सहन से परिचित भी कराता है। जून से सितम्बर के टूरिस्ट सीजन में होटल बुकिंग पहले से करा लेना सुरक्षित रहता है।

कपडे व बाकी सामान

सुबह व शाम के समय तो यहां पूरे सालभर गरम कपडे पहनने होते हैं। जून से सितम्बर तक दिन में थोडी गरमी होती है। हालांकि अगस्त से ही दिन के तापमान में भी गिरावट आने लगती है। गरमियों में भी दिन का तापमान यहां कभी 27-28 डिग्री से ऊपर नहीं जाता। सर्दियों में तो लेह तक में न्यूनतम तापमान शून्य से बीस डिग्री तक नीचे चला जाता है। इतनी ऊंचाई वाले इलाके होने से वहां हवा हल्की होती है। लिहाजा उसके लिये शरीर को तैयार करना होता है। अगर वहां आप रोमांचक पर्यटन के इरादे से जा रहे हों तो जरूरी सामान साथ रखें।

रोमांचक पर्यटन

यह इलाका ट्रैकिंग, पर्वतारोहण और राफ्टिंग के लिये काफी लोकप्रिय है। यूं तो यहां पहुंचना ही किसी रोमांच से कम नहीं, लेकिन यहां आने वालों के लिये उससे भी आगे बेइंतहा रोमांच उपलब्ध है। दुनिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित सडकों (मारस्मिक ला व खारदूंग ला) के अलावा इस इलाके में सात हजार मीटर से ऊंची कई चोटियां हैं जिन पर चढने पर्वतारोही आते हैं। स्थानीय भ्रमण व खारदूंग ला जाने के लिये आपको यहां मोटरसाइकिल भी किराये पर मिल सकती है।

यह लेख दैनिक जागरण के यात्रा परिशिष्ट में 28 जून 2009 को प्रकाशित हुआ था।

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रविवार, जुलाई 10, 2011

गंगोत्री- चलो गंगाधाम

यात्रा वृत्तान्त: पल्लवी शर्मा

अक्षय तृतीया का दिन उत्तरकाशी के लिये विशेष महत्व रखता है। इस तिथि को प्रत्येक वर्ष उत्तराखण्ड के चार में से दो धाम गंगोत्री और यमुनोत्री के पट यात्रियों के लिये खुल जाते हैं। इसी के साथ चारधाम यात्रा का शुभारम्भ हो जाता है। अक्षय तृतीया को गंगाजी डोली में सवार होकर अपने शीतकाल के निवास मुखीमठ से गंगोत्री स्थित गंगा मन्दिर पहुंचकर वहां अपना ग्रीष्मकालीन निवास स्थापित कर लेती हैं।

मुखीमठ को आम भाषा में लोग मुखबा के नाम से जानते हैं। ऐसी मान्यता है कि मुखबा गंगाजी का मायका है जहां वह साल के छह माह रहती हैं। अक्षय तृतीया से एक दिन पहले गंगाजी की डोली मुखबा से गंगोत्री के लिये प्रस्थान करती है। हमारे एक मित्र का परिवार मुखबा में रहता है, वह हमें डोली यात्रा में भाग लेने का निमन्त्रण दे गये थे। हमने तुरन्त उनका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया और यात्रा से एक दिन पूर्व संध्या के समय मुखबा पहुंच गये। मुखबा अत्यंत ही सुन्दर गांव है। यहा अधिकतर भवन लकडी से निर्मित हैं। यह क्षेत्र अपनी काष्ठ कला के लिये प्रसिद्ध है जिसके उत्कृष्ट नमूने मुखबा के भवनों पर स्थित हैं। भवनों पर की गई नक्काशी देखने लायक है। हम गांव को देखकर ही खुश हो गये और बेसब्री से सुबह के जलसे का इंतजार करने लगे। सुबह से ही गांव में हलचल शुरू हो गई। सूर्योदय से पहले ही ढोल बजने लगे और उनकी थाप से सारा गांव जाग गया। गंगोत्री के पण्डे जिन्हें रावत कहते हैं, सभी मुखबा के ही मूल निवासी हैं। गंगाजी की डोली वे ही सजाते हैं। सुबह से ही आसपास के गांवों से लोगों का तांता लग गया था, सभी गंगाजी को विदा करने आये थे। गांव के सब लोग सुबह ही नहा धोकर मन्दिर में दर्शन के लिये पहुंच गये। मन्दिर के बाहर भीड लग गई थी, हम भी इसी भीड में शामिल हो गये।

पहाडों की परम्परा के अनुसार बेटी की विदा के समय गांव में सभी कुछ न कुछ भेंट करते हैं। आज गंगाजी की विदाई के समय भी सभी गांव के लोग यथासम्भव अनाज का दान मन्दिर में चढा रहे थे। प्रत्येक वर्ष वे अपनी इस दिव्य पुत्री को पूरे सम्मान के साथ उसकी ससुराल गंगोत्री विदा करते हैं। दिन चढते-चढते मन्दिर के प्रांगण में खूब भीड लग गई।

सबसे पहले गांव के ग्राम देवता- सोमेश्वर की डोली आई और उसे मन्दिर के सामने एक चबूतरे पर रख दिया गया, फिर उसकी पूजा अर्चना की गई और सबने उनका आशीर्वाद लिया। इतने में सेना का बैंड आ गया। सेना के जवान भी देवी को विदा करने आते हैं और उनके बैंड की धुनों के साथ ही डोली गंगोत्री के लिये रवाना होती है। हम सभी मन्दिर की सीढियों पर बैठकर डोली को सजते देखने लगे। लकडी से बनी डोली को लाल वस्त्रों, फूल और पत्तियों से सजाने के बाद उसमें गंगाजी और सरस्वती जी की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। फिर उसे लाल वस्त्र से ढककर उस पर चांदी की पेटी बांधी जाती है। डोली को चांदी के छत्रों, फूलों और गंगा तुलसी से सजाया जाता है। अभी डोली को सजा ही रहे थे कि इतने में धराली गांव से भी एक देवता की डोली आ गई। अब गंगाजी का लश्कर तैयार था। हम सब उत्सुकता से गंगाजी के बाहर आने की प्रतीक्षा करने लगे। हमें अधिक इंतजार नहीं करना पडा। शीघ्र ही मंत्रोच्चार प्रारम्भ हो गया और पंडों के कंधों पर सवार होकर गंगाजी की डोली मन्दिर से बाहर आ गई। हम सभी डोली से आशीर्वाद लेने के लिये आगे बढे। फूल और गंगा तुलसी चढाकर हमने भी अन्य सभी के साथ डोली का स्वागत किया।

दोनों स्थानीय देवताओं ने गंगा डोली का स्वागत किया और सेना के बैंड ने संगीत से देवी का अभिनंदन किया। सबसे आगे सेना का बैंड चला, उसके बाद सोमेश्वर की डोली, फिर गंगाजी की डोली और फिर धराली से आई डोली थी। डोलियों के पीछे गंगोत्री के रावल और उनके पीछे श्रद्धालु जनों की भीड थी। जै गंगा मैया की- के उदघोष के साथ ही जुलूस मुखबा से रवाना हुआ। गांव की महिलाएं और बच्चे, सभी जन अपनी देवी को विदा करने उमड पडे। बैंड की धुन और ढोल की थापों के साथ डोली मुखबा से अपने पहले पडाव मार्कण्डेय की ओर बढी। मार्कण्डेय मुखबा से दो किलोमीटर दूर भागीरथी के किनारे पर स्थित प्राचीन मन्दिर है। यहां डोली को रखकर मन्दिर में पूजा अर्चना की जाती है और आसपास के गांवों के लोग आकर गंगाजी के दर्शन करते हैं।

यहां से डोली फिर झाला के लिये रवाना हुई। यहां से पुल पार करने के बाद हम गंगोत्री राजमार्ग पर आ गये। रास्ते में जगह जगह रोक कर लोग प्रसाद बांट रहे थे और डोली का स्वागत शंखध्वनि से कर रहे थे। मन्दिर के पट खुलने के अवसर पर वहां रहने वाले साधु-सन्यासी भी अपनी कुटियों में लौट आये थे और सभी देवी की डोली का स्वागत करने रास्ते पर खडे थे। चारों ओर से- जै गंगा मैया की- और शंखों की आवाज आ रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे सारी भागीरथी घाटी देवी को नमन कर रही हो।

हमारा अगला पडाव कोपांग था जहां सेना का कैम्प और मन्दिर है। सेना के जवानों ने डोली के साथ आये भक्तों के लिये भण्डारे का प्रबन्ध किया था। पूरी सब्जी और मिठाई का भोजन करने के बाद हम आगे बढे। यहां से हमने डोली का साथ छोड दिया और गाडी से डोली के रात्रि विश्राम स्थल भैरोंघाटी पहुंच गये। यहां पर बडी रौनक थी। जगह-जगह पर अलाव जल रहे थे और भण्डारे की तैयारी चल रही थी। हम सभी यहां पर रुककर डोली के आने की प्रतीक्षा करने लगे। शीघ्र ही बैंड, ढोल आदि की आवाज आने लगी और डोली भैरों घाटी पहुंच गई। डोली को रात के लिये मन्दिर के अन्दर रख दिया गया। संध्या आरती की गई और प्रसाद बांटा गया। सबने चाय पी और नाश्ता किया, इसके बाद रात में सोने का प्रबन्ध किया जाने लगा।

भैरोंघाटी में भैंरोजी के मन्दिर और एक गढवाल मण्डल विकास निगम के होटल के अलावा रहने का कोई स्थान नहीं है। होटल अभी बन्द था और मन्दिर में रहने की जगह भी सीमित थी इसलिये अधिकतर लोग डोली को रात के लिये भैरोंघाटी छोड कर गंगोत्री चल दिये। हमने भी गंगोत्री में रात बिताना ठीक समझा। हम वहां से गंगोत्री के लिये रवाना हो गये। गंगोत्री पहुंचने पर देखा कि एक या दो स्थान छोड कर सभी कुछ बन्द था। लोग आने वाले कल की तैयारियों में लगे थे और मन्दिर के खुलने के साथ शुरू होने वाली चारधाम यात्रा का इंतजार कर रहे थे। उस रात हमें बिडला धर्मशाला में रहने की जगह मिली। खाने के लिये कहीं कोई प्रबंध नहीं था, हम ईशावास्यम आश्रम पहुंचे और वहां स्वामी जी की अनुकम्पा से हमें भोजन नसीब हुआ। रात में बहुत ठण्ड थी, हमारे पास गर्म बिस्तर थे इसलिये हमारी रात आराम से कटी। हम अपने गर्म बिस्तरों में बैठकर डोली के साथ मन्दिर में रुके लोगों के विषय में सोच रहे थे कि वे कैसे इतनी ठण्ड में सो रहे होंगे। आस्था हो तो मनुष्य कुछ भी कर सकता है। ठण्ड, गर्मी या बरसात सभी सहने की शक्ति आ जाती है।

सुबह उठने पर बाहर निकलकर देखा कि कई जगह अभी तक बर्फ थी। धर्मशाला के पीछे भी करीब दो फुट बर्फ जमी थी। हम नहा-धोकर जल्दी से मन्दिर के अहाते में पहुंच गये। दिन चढने के साथ ही गंगोत्री में भीड बढने लगी। यात्री मन्दिर के पट खुलते देखने के लिये एकत्रित हो रहे थे। दस बजे तक गाडियों की कतारें लग गई थीं। सभी डोली के भैरोंघाटी से आने की बाट देख रहे थे। आखिर साढे दस बजे डोली आ ही गई। बैंड की धुन और ढोल की थापों ने देवी के अपनी ससुराल और ग्रीष्मकालीन निवास गंगोत्री में आगमन का सन्देश दिया। सभी डोली देखने के लिये उमड पडे। डोली को लाकर मन्दिर के बरामदे में रख दिया गया। पट मुहूर्त के अनुसार खोले जाते हैं, मुहूर्त में अभी कुछ समय शेष था इसलिये डोली को बाहर ही रखा गया था। सभी जाकर देवी के दर्शन कर रहे थे और उनका आशीर्वाद ले रहे थे। समय बीतने के साथ ही भीड भी बढती जा रही थी।

हम सभी मन्दिर में ही बैठकर भीड को देख रहे थे। कहीं टीवी वाले थे तो कहीं अखबारवाले, विदेशी भी काफी संख्या में उपस्थित थे। हमारे पास बैठे कुछ लोग तो हिमाचल से पैदल पहाड पार करके आये थे। इतने में ढोल नगाडों की आवाज आई और साथ ही एक देवता की डोली और उसके साथ एक बस भरकर लोग थे। वे पास के किसी गांव से आये थे और अपने देवता को देवी के दर्शन कराने लाये थे। मुहूर्त का समय आ ही गया। मन्दिर समिति के कार्यालय में हलचल देखकर हम मन्दिर के सामने आकर बैठ गये। ढोल-नगाडों-तुरही की आवाज और मंत्रोच्चार के साथ ही मन्दिर के पट खुले। सभी ने अखण्ड ज्योति के दर्शन किये। साथ ही देवी की प्रतिमा को पूरे सम्मान के साथ मन्दिर के गर्भगृह में स्थापित कर दिया गया। देवी आखिर अपने ससुराल पहुंच गईं। उनके ससुराल पहुंचने के साथ ही एक और यात्रा सीजन का आरम्भ हुआ। अगले छह माह तक देवी अपने प्रताप से गंगोत्री में रौनक बनाये रखेंगी। हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन उनके दर्शन के लिये भारत ही नहीं, बल्कि संसार के कोने-कोने से आकर उनके चरणों से आशीर्वाद लेकर जायेंगे। हम भी उनका आशीर्वाद लेकर वापस अपने घर लौट गये। हमारी यात्रा पूरी हो गई थी।

खास बातें

1. चारधाम यात्रा अक्षय तृतीया से शुरू होती है। हालांकि बद्रीनाथ व केदारनाथ के कपाट बाद में खुलते हैं।

2. गंगोत्री समुद्र तल से 3200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां का मौसम खासा ठण्डा रहता है। जाते समय कपडे उसी हिसाब से लेकर जायें।

3. गंगोत्री मन्दिर के पट सवेरे 6.15 बजे से दोपहर 2 बजे तक और फिर दोपहर 3 बजे से रात साढे नौ बजे तक खुलते हैं। मंगला आरती सवेरे छह बजे होती है लेकिन उस समय पट बन्द रहते हैं। संध्या आरती शाम 7.45 बजे और ठण्ड बढने पर सात बजे होती है।

4. गंगोत्री जाने के लिये सबसे निकट का हवाई अड्डा जौली ग्रांट (ऋषिकेश से 26 किलोमीटर दूर) है। ऋषिकेश (249 किलोमीटर) ही आखिरी रेल स्टेशन भी है।

5. उत्तरकाशी, टिहरी गढवाल और ऋषिकेश से गंगोत्री के लिये आसानी से बसें मिल जाती हैं।

6. ठहरने के लिये गंगोत्री में हर किस्म के इंतजाम हैं। लग्जरी होटल, बढिया होटल, सस्ते होटल, गेस्ट हाउस, धर्मशालाएं, आश्रम- सब कुछ। लेकिन यात्रा के दिनों में यहां भीड भी खासी रहती है।

यह लेख दैनिक जागरण के यात्रा परिशिष्ट में 26 अप्रैल 2009 को प्रकाशित हुआ था।


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शनिवार, जुलाई 09, 2011

डलहौजी

प्रस्तुति: कविता

संदीप पंवार के सौजन्य से

डलहौजी एक ऐसा पर्वतीय स्थल है, जिसकी स्थापना अंग्रेजों के जमाने में लार्ड डलहौजी ने की थी। हिमाचल प्रदेश में स्थित यह शहर अपनी खूबसूरती के कारण देशभर के प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इनके साथ ही चले आते हैं वे लोग जो गर्मी से बचने के लिये या फिर अपने व्यस्त समय में से थोडा समय निकालकर शान्ति से आराम करना चाहते हैं।

हिमालय की पीर पंजाल श्रंखला के सामने पांच पर्वतों पर फैले इस शहर के कई कोनों से आप रावी, ब्यास और चेनाब नदियों को बहते देख सकते हैं। पर्वतों की एक के बाद बढती श्रंखला, बर्फ से ढकी चोटियां, हरे-भरे पेड ही तो यहां के मुख्य आकर्षण हैं और ये सभी भव्य दृश्य आप पांगी वैली से देख सकते हैं। पांगी वैली ट्रैकिंग के शौकीन लोगों के लिये खास जगह है।

तो चलो, चलते हैं डलहौजी। पर आइये, पहले यहां के बारे में थोडा और जान लें:

डलहौजी हिमाचल प्रदेश की धौलाधार श्रंखला में पठानकोट से 80 किलोमीटर दूर स्थित है, जिसकी ऊंचाई लगभग 5000 फीट से 7800 फीट है।

यहां का मौसम अक्सर सुहाना रहता है। गर्मियों में यहां का तापमान 12 डिग्री से 25 डिग्री तक तथा सर्दियों में 2 डिग्री से 10 डिग्री तक रहता है। सर्दियों में तो यहां बर्फ भी पडती है। तो क्या आप डलहौजी घूमने के लिये तैयार हैं? आओ चलें।

डलहौजी पहुंचने के संसाधन

डलहौजी जाने के लिये आप रेल या सडक यातायात से जा सकते हैं।

रेल यात्रा

रेल यात्री पठानकोट तक के लिये झेलम एक्सप्रेस, दिल्ली जम्मू एक्सप्रेस या हिमाचल एक्सप्रेस से जा सकते हैं। फिर वहां से टैक्सी, कार या बस द्वारा दो घण्टों में आप डलहौजी पहुंच जायेंगे।

सडक यातायात

हिमाचल प्रदेश टूरिज्म द्वारा शिमला और धर्मशाला से डलहौजी के लिये डीलक्स बसें चलती हैं। हालांकि यहां की सडकें चौडी नहीं हैं फिर भी ड्राइव कंफर्टेबल है।

अब जब हम डलहौजी पहुंच ही गये हैं तो पहले होटल में थोडा आराम कर लें और रिफ्रेश हो जायें।

रहने योग्य स्थल: डलहौजी में रहने के लिये आप निम्न होटलों में रह सकते हैं- एलप्स हालिडे रिसार्ट, ग्राण्ड व्यू होटल, होटल माउण्ट व्यू आदि।

आराम बहुत हो गया, अब आइये शहर घूमने निकलते हैं।

शहर कैसे घूमें: शहर घूमने के लिये टैक्सी ही सबसे सही साधन है।

रोचक स्थल

गर्म सडक: ओक, सिडार और पाइन के पेडों की कतारों से सजी यह सडक डलहौजी में सैर करने के लिये सबसे सही है। इसके रास्ते में आपको पत्थरों पर बने तिब्बती देवी-देवताओं के रंगीन चित्र दिखाई देंगे। इस रास्ते पर कार आदि चलाना मना है।

पंच पुला: गांधी चौके से थोडी दूरी पर पंच पुला वह जगह है, जहां बहती धारा पर पांच पुल मिलकर बने हैं। यहां पर विख्यात आजादी के मतवाले सुभाष चंद्र बोस और अजीत सिंह की याद में एक मैमोरियल भी बना है।

कालाटोप वन्यजीव सेंचुरी: गांधी चौक से 8.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस सेंचुरी में बार्किंग डियर, काले भालू आदि जैसे जानवरों का संरक्षण किया जाता है। यहां पर कई तरह के पक्षी भी पाये जाते हैं।

देनकुण्ड चोटी: गांधी चौक से 9 किलोमीटर दूर का दृश्य तो सच में मनभावन है। यहां से आप उत्तरी भारत की प्रमुख नदियां- चेनाब, रावी और ब्यास आसानी से देख सकते हैं।

सतधारा: इस स्थान पर सात विभिन्न धाराएं बहती हैं। इस पानी में अभ्रक धातु के तत्व भी मौजूद हैं।

सुभाष बावली: जीपीओ स्क्वायर स्प्रिंग से 1.6 किलोमीटर दूर इस बावली से आप बर्फ से ढकी चोटियों को देख सकते हैं। घूमते-घूमते आप थक गये होंगे। तो आओ, थोडी पेट-पूजा हो जाये।

खाना कहां से खायें

-मुस्लिम सदर बाजार में शुद्ध हिमाचली खाना उपलब्ध है।

-सुभाष चौक के प्रीत पैलेस में मुगलई, कश्मीरी तथा चीनी व्यंजन उपलब्ध हैं।

-गांधी चौक के क्वालिटी रेस्तरां में भी अनेक व्यंजन उपलब्ध हैं।

-सुभाष चौक के मोती महल में बार सहित दक्षिण भारतीय व्यंजन परोसे जाते हैं।

अब घूमने निकले ही हैं तो थोडी शापिंग भी कर लें।

शापिंग कहां से करें

गर्म शालें खरीदने के लिये ठण्डी सडक पर स्थित हिमाचल हैण्डलूम एम्पोरियम एक अच्छी जगह है। तिब्बती चटाइयों को गांधी चौक से 3 किलोमीटर दूर खजियार रोड पर तिब्बत हैण्डीक्राफ्ट सेंटर से आर्डर पर भी बनवाया जा सकता है। गांधी चौक की सडकों पर बहुत सी छोटी दुकानें हैं जहां पारम्परिक वस्तुएं तथा अन्य सजावटी सामान मिलता है।

चलिये अब डलहौजी के आसपास भी घूम आयें।

शहर के आसपास के दर्शनीय स्थल

खजियार: यह डलहौजी से 24 किलोमीटर दूर एक पिकनिक स्थल है। जंगलों से घिरा, हरे मैदानों के बीच एक छोटा सा तालाब है, जिसके चारों ओर लकडी के मकान हैं। इस शहर को अपना नाम प्राचीन गुम्बद वाला मन्दिर ‘खजिनाग’ से मिला। यहां आप घुडसवारी कर सकते हैं। यहां बस व टैक्सी हर समय मौजूद होती हैं। रात बिताने के लिये मिनी स्विस होटल है।

तो लो, हमने आपको पूरा डलहौजी शहर घुमा दिया।


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शुक्रवार, जुलाई 08, 2011

श्रीखण्ड महादेव- मनोहारी सुषमा से सराबोर

लेख: गिरधारी लाल चोपडा

संदीप पंवार के सौजन्य से

हिमाचल प्रदेश के कुछ शिखर भगवान शिव के लिये अर्पित हैं। इनमें से कई शिखरों पर शिवालय हैं तो कुछ केवल शिव सूचक रूप में विराजमान शिलाखण्ड एवं भू-भाग उपासना के पर्याय हैं। ऐसा ही एक तिलिस्मी छटा एवं सुषमा से सराबोर स्थल है- श्रीखण्ड, जहां महादेव विशाल शिलाखण्ड के रूप में श्रद्धालुओं को जीवन मुक्ति एवं आत्मिक सुख देते प्रतीत होते हैं। वास्तव में श्रीखण्ड चोटी जो महादेव की शिला से अलंकृत है, श्रीखण्ड के नाम से सुविख्यात है। श्रीखण्ड महादेव के पावन दर्शन प्राप्त करने के निमित्त प्रतिवर्ष असंख्य शिवभक्त दुर्गम रास्ते के जोखिम को भुलाकर श्रीखण्ड महादेव आते हैं।

एक जनश्रुति के अनुसार भगवान शिव ने भस्मासुर को वरदान दिया कि वह जिस किसी के सर पर हाथ रख देगा, वह भस्म हो जायेगा। वरदान प्राप्ति के बाद दानव में दुर्भावना पैदा हो गई और उसने शिव अर्धांगिनी को पाने की कुचेष्टा से शिव को ही भस्म करने की ठानी। भगवान शिव भस्मासुर से बचते हुए सुरक्षित स्थान की तलाश में भागने लगे। अंततः निरमंड के समीप देवढांक में एक गुफा में छिप गये। वहां भगवान शिव के चरणों को भस्मासुर ने पकड लिया जबकि कंदरा मार्ग से भगवान शिव का सिर श्रीखण्ड में प्रकट हुआ। सिर अर्थात शिरी (श्री) खण्ड अंश ही कालान्तर में श्रीखण्ड नाम से प्रचलित हुआ।

श्रीखण्ड पहुंचने के लिये दो मार्ग हैं- एक मार्ग जिला शिमला के उपमण्डल रामपुर के ज्यूरी नामक स्थान से गौनवी व फांचा होते हुए है और दूसरा मार्ग जिला कुल्लू के निरमंड-अरसू-जांव होते हुए है। अरसू-डीम-जांव या बागीपुल से जांव होते हुए श्रीखण्ड महादेव की यात्रा अधिक रोमांचक और कल्याणकारी है। इस मार्ग से दशमेश अखाडा निरमंड से छडी यात्रा का आयोजन भी होता है। जिला कुल्लू की ओर से श्रीखण्ड महादेव की यात्रा करने हेतु रामपुर बुशहर से बस द्वारा अरसू अथवा बागीपुल तक सहज ही पहुंचा जा सकता है। डीम अथवा बागीपुल से श्रीखण्ड यात्रा का रोमांच पैदल यात्रा से आरम्भ होता है। सिंहगाड श्रीखण्ड यात्रा का प्रथम पडाव है। यहां रात्रि ठहराव के लिये वन विभाग की कुटीर हैं, इसके अतिरिक्त यहां शिव सेवा में तन्मयता से रत श्रीखण्ड परिवार के सदस्यों द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु एक सराय का निर्माण किया गया है।

इसी सेवा दल द्वारा यहां श्रद्धालुओं के लिये निःशुल्क भोजन व जलपान प्रदान किया जाता है। अगले दिन प्रातः दूसरे पडाव भीम द्वार (भीम गुफा) की यात्रा प्रारम्भ होती है। भीम द्वार तक का मार्ग लम्बा और दुर्गम है।

भीम द्वार का सम्बन्ध महाभारत के पात्र महाबली भीम से बताया जाता है। लोक मान्यता के अनुसार बकासुर की नरभक्षी वृत्ति से ब्राह्मणों के गांव जांव में आतंक फैल गया था। इसी बीच पाण्डव अज्ञातवास काल में हिमालय के दुर्गम स्थलों की ओर प्रवृत्त हुए। इसी यात्रा के दौरान भीम द्वार के समीप महाबली भीम ने बकासुर का वध करके हिमालयवासियों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। यहां अभी भी बिल्कुल रक्तवर्ण का एक नाला बहता है जो इस पौराणिक घटना का साक्षी है। भीम द्वार ही श्रीखण्ड यात्रा का अंतिम पडाव है। अतः श्रद्धालु यहां से प्रातः जाकर दर्शन करके वापस भीम द्वार लौट आते हैं। भीम द्वार में भी श्रीखण्ड परिवार की ओर से लंगर का आयोजन होता है। इसके अतिरिक्त हिमाचल सरकार की ओर से रात्रि ठहराव हेतु यहां पर टेंट लगाये जाते हैं।

अगले दिन प्रातः तीर्थ यात्री भीम द्वार से चार किलोमीटर दूर नयन सरोवर पहुंचते हैं। नयन सरोवर एक सौम्य झील है। यहां पहुंचकर श्रद्धालु स्नान करके पुण्य अर्जित करने के साथ-साथ थकान भी मिटाते हैं। ऐसी मान्यता है कि पाण्डव अपने अज्ञातवास काल में यहां रुके और उन्होंने तराशे पत्थरों से यहां की धरा को और सुन्दर बनाया। एक अन्य लोक मान्यता के अनुसार यहां की सुन्दर झील का अस्तित्व माता पार्वती के अश्रुओं से हुआ माना जाता है।

नयन सरोवर के पश्चात श्रीखण्ड महादेव की यात्रा का अंतिम चरण आरम्भ होता है। नयन सरोवर से आगे चलकर लगभग दो किलोमीटर दूरी पर भीम बई स्थान आता है। यहां तराशे गये भीमकाय पत्थरों का पुंज जिसे भीमसेन द्वारा उठाये गये भार (बोझा अथवा बई) कहा जाता है, आकर्षण का केन्द्र हैं। कहा जाता है कि पाण्डव यहां भगवान शिव का भव्य मन्दिर बनाना चाहते थे पर किसी कारणवश मनोरथ पूर्ण न हो सका। भीम बई से आगे एक किलोमीटर के करीब चढाई युक्त रास्ता श्रीखण्ड महादेव की ओर जाता है। श्रीखण्ड महादेव में महादेव विशाल लिंग के रूप में विराजमान हैं। श्रीखण्ड से जुडी एक अन्य जनश्रुति यह भी है कि शिव भक्त रावण ने भगवान को प्रसन्न करने के निमित्त अपने दस सिर भगवान के चरणों में यही चढाये थे।

पिछले कुछ वर्षों से श्रीखण्ड महादेव यात्रा की ओर श्रद्धालुओं तथा प्रकृति प्रेमियों का रुझान बढा है। वास्तव में इस यात्रा की लोकप्रियता में शिव समर्पित लोगों का योगदान सराहनीय रहा है। वर्ष 1996 से श्रद्धालु व मानव सेवी लोगों का एक समूह ‘श्रीखण्ड परिवार’ आगंतुकों को सुविधा प्रदान करवाने में निष्काम भावना से जुडा है।

हालांकि 1999 से हिमाचल प्रदेश सरकार ने श्रीखण्ड यात्रा को मेले का स्वरूप प्रदान किया है लेकिन अभी तक सरकारी स्तर पर किये गये प्रयास पर्याप्त प्रतीत नहीं होते।

हिमालय के अंचल में स्थित हिमाचल में शैवमत का प्राधान्य इस बात का प्रमाण है कि भगवान शिव हिमालय में वास करने वाले हैं। वास्तव में हिमालय क्षेत्र भगवान शिव की ससुराल है, अतः यहां का जनमानस श्रद्धाभाव से शिव के प्रति समर्पित है। फिर शिव तो आशुतोष हैं, इन्हें रिझाना अत्यन्त सरल है। वास्तव में शिव ही सर्वस्व और सम्पूर्ण हैं।


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गुरुवार, जुलाई 07, 2011

एक चम्बा उत्तराखण्ड में

लेख: रविशंकर जुगरान

मैदानी भागों में तपिश चरम पर है और बच्चों के स्कूल भी खुलने को हैं। जो लोग रह गये, वे बचे हुए समय में कहीं न कहीं निकलने की योजना बना रहे होंगे। आप लोगों के पास हिल स्टेशनों की एक लम्बी-चौडी लिस्ट होगी। लेकिन कई लोग इस संशय में होंगे कि ये हिल स्टेशन उनकी जेब के मुताबिक मुफीद होंगे या नहीं। खैर, कोई बात नहीं। यदि आप सीमित बजट में खूबसूरत हिल स्टेशन की सैर करना चाहते हैं तो बिना किसी झिझक के चले आइये चम्बा।

आमतौर पर चम्बा का नाम आते ही लोगों के जेहन में हिमाचल की ही तस्वीर उभर कर सामने आती है लेकिन यदि आप उत्तराखण्ड आयें तो यहां भी आप चम्बा के दर्शन कर सकते हैं। इस चम्बा की खूबसूरती भी देखते ही बनती है। फर्क सिर्फ इतना है कि हिमाचल का चम्बा पर्यटन के नक्शे पर अपना मुकाम बना चुका है जबकि उत्तराखण्ड में स्थित चम्बा अभी अपनी जगह बनाने की कोशिश में है।

मसूरी, ऋषिकेश, नई टिहरी, धरासू और उत्तरकाशी की सडकों के बीच स्थित चम्बा छोटा किन्तु मनोहारी पर्यटन स्थल है। गंगोत्री जाने वाले पर्यटक और तीर्थयात्रियों को चम्बा के दर्शन करने का मौका मिलता है। देवदार और बुरांश के घने जंगलों के बीच चम्बा प्रकृति प्रेमियों के लिये स्वर्ग सरीखा है क्योंकि हिमालय के सभी शिखरों को चम्बा के आसपास से आप आसानी से देख सकते हैं। बंदरपूंछ और भागीरथी शिखरों के दृश्य हर किसी को लुभाते हैं। गर्मी में जंगली गुलाब, जलीय पौधे और मौसमी फल यहां बहुतायत में मिलते हैं। चम्बा मौसमी फलों के लिये भी मशहूर है क्योंकि यहां का एक इलाका फल पट्टी के रूप में जाना जाता है। वन्य प्रेमियों के लिये भी ये क्षेत्र एक आदर्श स्थान हैं। लंगूर, जंगली बिल्ली, लोमडी, खरगोश के अलावा चम्बा के इर्द-गिर्द के क्षेत्रों में काले भालू भी देखने को मिलते हैं।

टिहरी झील के बनने से इस स्थान का आकर्षण कुछ ज्यादा ही बन गया है क्योंकि टिहरी की झील यहां से ज्यादा दूर नहीं है। चम्बा बर्ड वाचिंग के शौकीनों के लिये भी एक आदर्श स्थान है। बिना किसी दूरबीन की सहायता के अलग-अलग तरह के पक्षियों को करीब से निहारना ही चम्बा की सबसे बडी खासियत है। इस छोटे से कस्बे के इर्द-गिर्द के इलाकों में हडियाल, कबूतर, कस्तूरिका, बकवादी पक्षी और क्ठफोडवा सामान्य रूप में पाये जाते हैं।

चम्बा की सबसे बडी खासियत यह है कि मसूरी और टिहरी जैसे हिल स्टेशनों के करीब होते हुए भी इस छोटे से शान्त कस्बे ने अपने ग्रामीण परिवेश को आज भी संजो रखा है। यही वजह है कि जब सैलानी यहां पहुंचते हैं तो उन्हें शहर के कोलाहल से कुछ समय के लिये शान्ति और सुकून मिलता है। चम्बा उन जगहों में एक है जहां आप आसानी से कुछ दिन बिता सकते हैं। सूर्यास्त का नजारा भी यहां से विस्मयकारी है।

यहां का बागेश्वर मन्दिर भी आकर्षण का केंद्र है। मन्दिर में भगवान शिव की पूजा अर्चना की जाती है। इस मन्दिर में स्थापित लिंग पौराणिक और स्वयंभू है। चम्बा और इसके आसपास देखने योग्य कई अन्य जगहें भी हैं- प्राचीन सुरकंडा देवी मन्दिर यहां से एक घण्टे में पहुंचा जा सकता है तो नई टिहरी जैसा खूबसूरत मास्टर प्लान शहर यहां से मात्र दस किलोमीटर की दूरी पर है जहां से टिहरी बांध और वहां फैलाव लिये हुए झील को आसानी से देखा जा सकता है। घने देवदार वृक्षों के बीच खूबसूरत धनोल्टी भी यहां से बहुत करीब है। धनोल्टी का आकर्षण पर्यटकों को लुभाता है। चम्बा के नजदीक ही रानीचौरी नामक स्थान है जहां पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय का कैम्पस लोगों के आकर्षण का केंद्र है। कृषि वैज्ञानिकों की बनाई फूलों की वाटिका यहां पहुंचने वाले पर्यटकों को लुभाती है। साथ ही यहां पर अंगूरा ऊन का केंद्र भी है जहां दूर-दूर से लोग पहुंचकर अंगूरा ऊन खरीदते हैं।

सुन्दर मौसम और आसपास के मनोहारी दृश्य इसे एक आकर्षक पर्यटन स्थल बनाने के लिये काफी हैं। चम्बा छुट्टियां बिताने के लिये उन आरामदायक स्थानों में से एक है जहां पहुंचकर आप अदभुत शान्ति प्राप्त कर सकते हैं। देवदार, बांज व बुरांश के पेड और इनसे बहने वाली ठण्डी हवाएं और मनोरम दृश्य यहां पहुंचने वालों को आकर्षित करते हैं।

कैसे पहुंचें

देहरादून का जौली ग्राण्ट निकटतम हवाई अड्डा है। हरिद्वार या ऋषिकेश नजदीकी रेलवे स्टेशन हैं। देश के किसी भी कोने से आप हवाई या रेल मार्ग के जरिये इन स्थानों पर पहुंच सकते हैं। इसके बाद चम्बा तक बस या टैक्सी से पहुंचा जा सकता है। हरिद्वार से चम्बा करीब 92 किलोमीटर और ऋषिकेश से 62 किलोमीटर की दूरी पर है। मसूरी से चम्बा की दूरी 105 किलोमीटर है। गर्मियों में यहां का तापमान 15 से 30 डिग्री और जाडों में 8 से 15 डिग्री सेंटीग्रेड के करीब होता है।

कहां ठहरें

यूं तो चम्बा में गढवाल मण्डल विकास निगम का पर्यटक आवास गृह भी है लेकिन अब इस कस्बे ने अपना आकार बढा लिया है और जब से गंगोत्री और यमुनोत्री आने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या में इजाफा हुआ है तब से यहां छोटे-छोटे होटल भी खुल गये हैं जो पर्यटकों को आसानी से सस्ते दामों पर मिल जाते हैं। कुल मिलाकर चम्बा हर किसी की जेब के लिये मुफीद हिल स्टेशन है जहां आप आसानी से कुछ दिन फुर्सत से बिता सकते हैं, बिना किसी टेंशन के।

यह लेख दैनिक जागरण के यात्रा परिशिष्ट में 29 जून 2009 को प्रकाशित हुआ था।



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