केरल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
केरल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, मई 19, 2012

पेरियार राष्ट्रीय उद्यान- प्राकृतिक सौन्दर्य की अदभुत थाती

कुदरत ने केरल में मुक्तहस्त से अपना वैभव बिखेरा है। चप्पे-चप्पे पर बिखरी हरियाली, हरे-भरे वृक्षों से ढके पर्वत, नदियों और झीलों की यह धरती प्रकृति प्रेमियों के लिये स्वर्ग है। राज्य के एक चौथाई क्षेत्र में सदाबहार वन हैं, जहां जंगल की खुशनुमा दुनिया आबाद है। इस छोटे से प्रान्त में प्रकृति के सुन्दरतम स्वरूप की झलक पेरियार राष्ट्रीय उद्यान में देखने को मिलती है, वह अभिभूत हो उठता है इसके सौन्दर्य पर। सचमुच पेरियार दुनिया के उन राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है, जहां वन्य प्राणियों का भरा-पूरा साम्राज्य आपको रोमांचित कर देता है।
पश्चिमी घाट की खूबसूरत पहाडियों से घिरा पेरियार राष्ट्रीय उद्यान 777 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। पार्क के बीचोंबीच केरल की सबसे लम्बी पेरियार नदी पर एक कृत्रिम झील बनाई गई है। 26 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली इस झील के चारों ओर घने जंगल पसरे हुए हैं, जहां वन्य प्राणियों की आवाजें जंगल की निस्तब्धता को भंग करती हैं। सन 1973 में पेरियार को ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ क्षेत्र में शामिल किया गया। यह भारत के दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र का अंतिम टाइगर रिजर्व है। नवीनतम गणना के अनुसार इस समय (1995) यहां 80 बाघ हैं।
कब जायें: मानसूनी बरसात के तीन महीनों को छोडकर पेरियार की यात्रा सितम्बर से मई के मध्य कभी भी की जा सकती है। गर्मी के मौसम में यहां अधिकतम तापमान 29 डिग्री तथा सर्दियों में न्यूनतम तापमान 15.5 डिग्री तक पहुंच जाता है। गर्मियों में सूती और सर्दियों में हल्के गरम कपडों की जरुरत पडती है।
कैसे जायें: पेरियार के लिये निकटतम हवाई अड्डा मदुरई है। आप चाहें तो तिरुअनन्तपुरम अथवा कोचीन की हवाई यात्रा से भी यहां पहुंच सकते हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन बोदिनायकानूर 67 किलोमीटर दूर है। वैसे मदुरई, कोचीन अथवा कोट्टायम तक रेल यात्रा के बाद सडक परिवहन के जरिये यहां पहुंचना अधिक सुविधाजनक है। पेरियार दक्षिण भारत के सभी प्रमुख नगरों से सडक मार्ग द्वारा जुडा हुआ है। कोचीन, तिरुअनन्तपुरम, कोट्टायम और मदुरई से यहां के लिये नियमित बस सेवाएं सुलभ हैं।
प्रमुख नगरों से दूरी: तिरुअनन्तपुरम 220 किलोमीटर, कोचीन 200 किलोमीटर, कोडाईकनाल 160 किलोमीटर, मदुरई 145 किलोमीटर, चेन्नई 639 किलोमीटर।
कहां ठहरें: पर्यटकों के लिये पेरियार में ठहरने के लिये आधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न प्राइवेट होटल, लॉज और सरकारी विश्राम गृह मौजूद हैं। केरल पर्यटन विकास निगम (केटीडीसी) द्वारा संचालित अरण्य निवास और लेक पैलेस में वातानुकूलित कमरों की सुविधा है। केटीडीसी का पेरियार हाउस, लेक क्वीन, अम्बाडी, वन रानी, होली-डे होम, रानी लॉज आदि में भी ठहरने की समुचित व्यवस्था है। इनके अतिरिक्त वन विभाग की ओर से तन्निकुडी, मुल्लाकुडी और मानकावला में पर्यटकों के लिये रियायती दरों पर आवासीय सुविधाएं उपलब्ध हैं।
क्या देखें: जल-क्रीडा में मग्न हाथियों को देखना पेरियार का मुख्य आकर्षण है। यहां झील में तैरते हाथी अक्सर नजर आ जाते हैं। गर्मी के मौसम में अपने शरीर को ठण्डक पहुंचाने के लिये बाघ भी झील में कूद पडते हैं। यदि आप भाग्यशाली हैं तो ये दुर्लभ नजारा आपको भी नजर आ सकता है।
हाथी और बाघ के अलावा यहां गौर, चीतल, सांभर, बन्दर, जंगली सूअर और भालू भी पाये जाते हैं।
उद्यान की सैर के लिये हालांकि यहां प्रशिक्षित हाथियों की समुचित व्यवस्था है, लेकिन इस प्रचलित तरीके से घूमने की बजाय मोटर बोट से यहां भ्रमण का एक अलग ही मजा है। झील में नौकायन के दौरान तटवर्ती क्षेत्र में जंगली जानवर खासतौर पर हाथी, गौर और हिरणों के झुण्ड नजर आ जाते हैं। पेरियार में नौकायन के साथ साथ जंगली जानवरों को निहारने का अनुभव सचमुच अनूठा है। अरण्य निवास से प्रातः 7 बजे से सायं 3 बजे तक प्रत्येक दो घण्टे के अन्तराल में यहां सैर के लिये मोटर बोट की सुविधा उपलब्ध है।
पेरियार के इर्द-गिर्द कई दर्शनीय स्थल हैं। इनमें अरूवी क्रीक (16 किलोमीटर), क्रूसोई आइलैण्ड (19 किलोमीटर), मानकावला (10 किलोमीटर), मुल्लकुडी (29 किलोमीटर), पवारासू (19 किलोमीटर) और पेरियार बांध (12 किलोमीटर) आदि प्रमुख हैं। यदि आपके पास पर्याप्त समय हो तो उक्त स्थलों की सैर अवश्य करनी चाहिये। इन स्थलों की ओर जाते समय रास्ते में आपको नारियल, रबड, कॉफी और कालीमिर्च के बागान भी देखने को मिलेंगे।
कुल मिलाकर पेरियार की यात्रा एक अनूठा अनुभव है। हरियाली और पानी से घिरी इस जगह की शान ही निराली है।

लेख: अनिल डबराल (हिन्दुस्तान में 26 नवम्बर, 1995 को प्रकाशित)
सन्दीप पंवार के सौजन्य से

शनिवार, जनवरी 14, 2012

कुमाराकोम- ईश्वर का देश

प्राकृतिक सौन्दर्य की बात हो और भारत के दक्षिणी अंचल की बात न हो, ये भला कैसे हो सकता है। भारत के दक्षिणी राज्यों में केरल की खूबसूरती सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। केरल के ही कोट्टायम शहर से मात्र 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है वह जगह, जिसके बारे में अपनी ही तरह के एकमात्र मशहूर गायक पॉल मैककार्टनी ने कहा था ’वाकई, यह ईश्वर का अपना घर है।’ यह जगह है कुमाराकोम। 

प्रकृति की दुर्लभ संतान 

केरल की सबसे लम्बी ताजे पानी की झील वेबनद पर बसे कुमाराकोम में दुनिया की सबसे दुर्लभ और खूबसूरत पेड-पौधों, फूलों और पक्षियों की प्रजातियां हैं। यही इसकी खास पहचान भी है। कुमाराकोम बर्ड सेंचुरी दुनिया की उन जगहों में से एक है, जहां 14 एकड के विशाल दायरे में प्रवासी पक्षियों की तमाम प्रजातियां एक साथ देखने का मौका मिलता है और वेबनद झील तो वैसे श्रिंप और प्रॉन मछलियों के लिये स्वर्ग ही है। दुनिया के तमाम हिस्सों से सैलानियों की भीड का खास केंद्र होती हैं ये दोनों ही जगहें। 

आत्मा का सुकून 

चारों ओर से हरियाली से आच्छादित इस साफ पानी की लम्बी झील में जब सैलानी नौकाओं में बैठकर प्रकृति का आनन्द उठाने निकलते हैं, तो दिल को बाग-बाग कर देने वाली मनोरम छटाओं के साथ-साथ पानी की कल-कल मन और आत्मा को वह सुकून देती है कि हर सैलानी मैककार्टनी का जुमला ही दोहराता है। भले ही शब्द अलग हों। वहीं फिशिंग के शौकीन भी इस झील में उतरते ही अपना शौक पूरा करने से नहीं चूकते। 

कुछ अलग है यह गांव 

वैसे शायद आपको पता न हो कि अरुंधती राय के उपन्यास ’द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ का गांव अयमानम भी यहीं है। यह कुमाराकोम से बिल्कुल सटा हुआ गांव है। और उपन्यास में जो ’हिस्ट्री हाउस’ है, वह है ताज गार्डन रिट्रीट होटल, जिसे ब्रिटिश पीरियड में अल्फ्रेड जॉर्ज बेकर ने बनवाया था। अपने स्थापत्य के लिये यह होटल भी यहां के दर्शनीय स्थलों में शुमार किया जाता है। 

सबसे दूर का आकर्षण 

केरल सरकार द्वारा विशिष्ट पर्यटन स्थल का दर्जा हासिल कर चुके कुमाराकोम को पर्यटन पत्रिका कोंदे नास्त ट्रेवलर ने दुनिया के सबसे दूरस्थ और आकर्षक स्थान के रूप में चिन्हित किया है। हालांकि यहां अब होटलों की भरमार है, लेकिन इसके प्राकृतिक सौन्दर्य में बनावटीपन अब तक शामिल नहीं हुआ है। पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इस जगह का उल्लेख करते हुए लिखा है कि यहां की खामोश प्राकृतिक सुन्दरता ध्यान और चिन्तन के लिये सर्वोत्तम माहौल प्रदान करती है। 

तो आओ चलें 

यदि आप इस खामोश प्राकृतिक सौन्दर्य की गोद में ईश्वर के देश का आनन्द उठाना चाहते हैं, तो पहुंच जायें कोच्चि, जो सिर्फ 85 किलोमीटर दूर है और कुमाराकोम का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट है। रेलयात्रा करना चाहते हैं तो नजदीकी रेलवे स्टेशन है कोट्टायम। दोनों ही जगहों से आप सडक मार्ग से कुमाराकोम पहुंच सकते हैं। रहने के लिये ताज गार्डन कुछ लोगों को थोडा महंगा लग सकता है, लेकिन चिन्ता न करें, यहां आपको सस्ते और अच्छे टूरिस्ट रिजॉर्ट्स भी उपलब्ध होंगे। चाहें तो हाउसबोट में भी रह सकते हैं। 

दैनिक जनवाणी में 10 अप्रैल 2011 को प्रकाशित

मंगलवार, अप्रैल 26, 2011

शबरिमला- ब्रह्मचारी अय्यप्पन का वास

यह लेख दैनिक जागरण के यात्रा परिशिष्ट में 30 दिसम्बर 2007 को प्रकाशित हुआ था।
लेख: एम. एस. राधाकृष्ण पिल्लै

शबरिमला दक्षिण के सर्वप्रमुख मन्दिरों में से एक है। हर साल भगवान अय्यप्पन के दर्शन के लिये दिसम्बर-जनवरी में करोडों की संख्या में लोग यहां तीर्थयात्रा करते हैं। यह केरल से जुडे पर्यटन का एक अलग ही स्वरूप है। एक तरफ यह रजस्वला महिलाओं के प्रवेश पर रोक को लेकर चर्चित है तो दूसरी तरफ यह हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की शानदार मिसाल भी पेश करता है।

केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम से 175 किलोमीटर की दूरी पर पम्पा है और वहीं से चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर पश्चिम घाट से सह्यपर्वत शृंखलाओं के घने जंगलों के बीच, समुद्र की सतह से लगभग 1000 मीटर की ऊंचाई पर शबरिमला मन्दिर है। ‘मला’ मलयालम में पहाड को कहते हैं। उत्तर दिशा से आने वाले यात्री एर्णाकुलम से होकर कोट्टायम या चेंगन्नूर रेलवे स्टेशन से उतरकर वहां से क्रमशः 116 किलोमीटर और 93 किलोमीटर तक किसी न किसी जरिये से पम्पा पहुंच सकते हैं। पम्पा से पैदल चार-पांच किलोमीटर वन मार्ग से पहाडियां चढकर ही शबरिमला मन्दिर में अय्यप्पन के दर्शन का लाभ उठाया जा सकता है।

दूसरे मन्दिरों की अपेक्षा शबरिमला मन्दिर के रस्म-रिवाज बिल्कुल ही अलग होते हैं। यहां जाति, धर्म, वर्ण या भाषा के आधार पर किसी भी भक्त पर कोई रोक नहीं है। यहां कोई भी भक्त अय्यप्पा मुद्रा में अर्थात तुलसी या रुद्राक्ष की माला पहनकर, व्रत रखकर, सिर पर इरुमुटि अर्थात दो गठरियां धारण कर मन्दिर में प्रवेश कर सकता है। माला धारण करने पर भक्त ‘स्वामी’ कहा जाता है और यहां भक्त व भगवान का भेद मिट जाता है। भक्त भी आपस में ‘स्वामी’ कहकर ही सम्बोधित करते हैं। शबरिमला मन्दिर का संदेश ही ‘तत्वमसि’ है। ‘तत’ माने ‘वह’, जिसका मतलब ईश्वर है और ‘त्वं’ माने ‘तू’ जिसका मतलब जीव से है। ‘असि’ दोनों के मेल या दोनों के अभेद को व्यक्त करता है। ‘तत्वमसि’ से तात्पर्य है कि वह तू ही है। जीवात्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं, दोनों अभेद हैं। यही शबरिमला मन्दिर का सार-तत्व है, संदेश भी है।

पुराने समय में शबरिमला जाने वाले भक्त समूह में तीन-चार दिनों में पैदल यात्रा करके ही मन्दिर पहुंचते थे। रास्ते में भोजन वे खुद पकाते थे और इसके लिये जरूरी बर्तन, चावल वगैरह इरुमुटि में बांध लेते थे। दो गठरियों में, पहली गठरी में भगवान की पूजा की सामग्री, नैवेद्य चढाने का सामान और दूसरी गठरी में अपने पाथेय के लिये सामग्री रखी जाती थी। विशेष तैयारियों और रस्म-रिवाज के साथ, अपने ही घर पर या मन्दिर में, गुरुस्वामी के नेतृत्व में इरुमुटि बांधकर ‘स्वामिये अय्यपो’, ‘स्वामी शरणं’ के शरण मंत्रों का जोर-जोर से रट लगाकर भक्त शबरिमला तीर्थाटन के लिये रवाना होते हैं।

श्री धर्मशास्ता और श्री अय्यप्पन

क्षीर सागर मंथन के अवसर पर मोहिनी वेषधारी विष्णु पर मोहित शिव के दांपत्य से जन्मे शिशु ‘शास्ता’ का उल्लेख कंपरामायण के बालकांड, महाभागवत के अष्टम स्कंध और स्कंधपुराण के असुर कांड में मिलता है। श्री अय्यप्पन को धर्म की रक्षा करने वाले इसी धर्मशास्ता का अवतार माना जाता है। अय्यप्पन के संबंध में केरल में प्रचलित कथा यही है कि संतानहीन पंतलम राजा को शिकार के दौरान, पम्पा नदी के किनारे एक दिव्य, तेजस्वी, कंठ में मणिधारी शिशु मिला जिसे उन्होंने पाला-पोसा और बडा किया। मणिधारी वही शिशु मणिकंठन या अय्यप्पन कहलाये जो अपने जीवन का दौत्य पूरा करके पंतलम राजा द्वारा निर्मित शबरिमला मन्दिर में अय्यप्पन के रूप में विराजते हैं।

जो भी हो धर्मशास्ता या अय्यप्पन की परिकल्पना को इसी पृष्ठभूमि में सार्थक माना जाता है कि सात-आठ सौ साल पहले दक्षिण में शिव और वैष्णवों के बीच घोर मतभेद थे, जिसमें हिंदू धर्म के उत्कर्ष में बाधा पडती थी। ऐसे हालात में दोनों में समन्वय जरूरी था। विष्णु और शिव के पुत्र, हरिहर-पुत्र धर्मशास्ता के द्वारा ही यह संभव हो सकता था।

शबरिमला में अय्यप्पन की मुख्य मूर्ति के अलावा, मालिकापुरत्त अम्मा, श्री गणेश, नागराजा जैसे उपदेवता भी प्रतिष्ठित हैं। मालिकापुरत्त अम्मा के बारे में कहा जाता है कि देवताओं और मनुष्यों को त्रस्त करने वाली महिषी का अय्यप्पन ने वध करके उसे मोक्ष प्रदान किया। मोक्ष प्राप्ति पर महिषी ने अपने पूर्व जन्म का रूप (पूर्व जन्म में वह लीला नामक युवती थी) धारण किया और मणिकंठन से विवाह का अनुरोध किया। नित्य ब्रह्मचारी मणिकंठन विवाह नहीं कर सकता था। लेकिन उन्होंने यह शर्त रखी कि जिस साल कोई कन्नि (कन्या) अय्यप्पन (पहली बार दर्शन के लिये आने वाला अय्यप्पन) नहीं आयेगा, उस समय वे उनसे शादी करेंगे। हर साल वह प्रतीक्षा करती रहती है, लेकिन प्रतिवर्ष हजारों की तादाद में नये भक्त आते ही रहते हैं और मालिकापुरत्त अम्मा की मनोकामना अधूरी ही रह जाती है। अय्यप्पन के मन्दिर के प्रांगण में ही अय्यप्पन के सहचर मुसलमान फकीर वावर के लिये भी जगह दी गई है।

एरुमेलि

भक्तों का पुराना पारम्परिक रास्ता है एरुमेलि होकर शबरिमला पहुंचना जो अधिक दुर्गम, चढाइयों और ढलानों वाला है। एरुमेलि में अय्यप्पन के घनिष्ठ मित्र वावर के नाम पर एक मस्जिद है। अय्यप्पा भक्त इस मस्जिद में प्रार्थना करके और दक्षिणा वगैरह अर्पित करके ही अय्यप्पा दर्शन के लिये आगे बढते हैं। यह मस्जिद हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक मानी जाती है। एरुमेलि की एक रस्म है ‘पेट्टा तुल्लल’। भक्त यहां कालिख, कुंकुम और कई तरह के रंग आदि पोतकर नाचते हैं। यह पेट्टा तुल्लल वावर की सहायता से अय्यप्पन द्वारा उदयनन नामक डाकू के मारे जाने पर उनके अनुचरों द्वारा नाचकूदकर विजय की खुशियां मनाने की याद में किया जाता है। एरुमेलि के परम्परागत मार्ग से जाने वाले भक्तों को 18 दुर्गम पहाडों को पैदल ही पार करना पडता है। यहां जंगली जानवरों के आतंक का खतरा भी है।

मन्दिर के परिसर में पहुंचने पर भक्त 18 सीढियां चढकर प्रांगण में प्रवेश करते हैं। ये अष्टदश सोपान प्रतीकात्मक माने जाते हैं। ये पावन अष्टदश सोपान पंचभूतों, अष्टरागों, त्रिगुणों और विद्या व अविद्या के प्रतीक माने जाते हैं।

शबरिमला मन्दिर में पूजा महोत्सव के लिये मण्डल 16 नवम्बर से 27 दिसम्बर तक द्वार खुला रहता है। मण्डल पूजा के लिये आने वाले लोगों को 41 दिन तक कडे नियमों में रहना होता है और मांसाहारी वस्तुओं के सेवन व भोग-विलास से दूर रहना होता है। मकरविलक्क (मकरज्योति) के लिये दिसम्बर 30 से जनवरी 20 तक खुला रहता है। (मकरज्योति दर्शन 14 जनवरी को पडता है) मार्च महीने की 12 तारीख को ध्वजारोहण के साथ 10 दिनों का उत्सव शुरू होता है जो अवभृथ स्नान (मूर्ति को नदी या सागर में स्नान कराना) के साथ 21 को समाप्त होता है। विषु पूजा के लिये अप्रैल महीने में 10 से 18 तक मन्दिर खुला रहता है। इन अवसरों को छोडकर मलयाल के शुरू में 6 दिन ही मासिक पूजा के लिये मन्दिर खुला रहता है, अन्य अवसरों पर नहीं।

मकर संक्रांति व उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र के संयोग के दिन, पंचमी तिथि और वृश्चिक लग्न के संयोग के समय ही श्री अय्यप्पन का जन्म हुआ और यही कारण है कि मकर संक्रांति के दिन शबरिगिरीशन के दर्शनार्थ हजारों-लाखों की तादाद में भक्त शबरिमला आते हैं और आरती के समय श्री अय्यप्पन के दर्शन लाभ के साथ ही पूर्व दिशा में कांतिमला की चोटी पर मकर ज्योति का भी दर्शन कर सायूज्य लाभ करते हैं।

खास बातें

श्री अय्यप्पन को घी का अभिषेक सबसे प्रिय है और ‘अरावणा’ (चावल, गुड और घी से तैयार खीर) ही मुख्य प्रसाद माना है।

चूंकि अय्यप्पन नित्य ब्रह्मचारी हैं, इसलिये 10 और 60 वर्ष के बीच की आयु की औरतों के लिये मन्दिर में प्रवेश मना है।

यह अंदाज लगाया जाता है कि गत वर्ष (2007) शबरिमला में पांच करोड से अधिक भक्त दर्शनार्थ आये और सरकारी आंकडों के मुताबिक मन्दिर की गतवर्ष (2007) की आय 100 करोड रुपये के करीब है।

आप भी अपने यात्रा वृत्तान्त और पत्र-पत्रिकाओं से यात्रा लेख भेज सकते हैं। भेजने के लिये neerajjaatji@gmail.com का इस्तेमाल करें। नियम व शर्तों के लिये यहां क्लिक करें

शुक्रवार, अप्रैल 08, 2011

केरल- प्रकृति का नायाब तोहफा

यह लेख 25 फरवरी 2007 को दैनिक जागरण के यात्रा परिशिष्ट में छपा था।

केरल की समृद्ध संस्कृति, आयुर्वेद उपचार और पर्यावरण के लिये प्रतिबद्धता, ऐसी कई बातें हैं जो दक्षिण भारत के इस राज्य को अनुपम करार देती है। यहां की खूबसूरती तो ऐसी है ही कि इसे ईश्वर का अपना देश कहा जाता है। प्रकृति की इस अनमोल भेंट का विवरण दे रही हैं रचना गुप्ता:

रोजमर्रा की दौडभाग वाली जिंदगी की थकान मिटानी है या फिर शादी के बंधन में बंधने के बाद भविष्य के सपने सजाने हैं, तो केरल आइये। जन्नत सरीखी इस जगह के अनुभव किसी को भी ताउम्र याद रहेंगे। समंदर का जो रूप केरल में है वह शायद हिंदुस्तान के किसी हिस्से में ना हो। हरियाली ऐसी कि पहाडों को भी मात दे जाये। यहां के लोग भले ही हिंदी-अंग्रेजी कम समझें पर उनकी मेहमाननवाजी यह अहसास नहीं होने देगी कि आप घर से बाहर हैं। बस, सिर्फ थोडी योजना पहले बना लें, फिर देखिये विदेशों की सैर का अनुभव भी इन यादगार लम्हों के सामने फीका पड जायेगा।

भारत के आखिरी सिरे पर केरल में यूं तो बहुत कुछ है परन्तु तीन चीजें आपकी यात्रा को यादगार बनाएंगी। पहला कोवलम बीच, दूसरा बैकवाटर्स और तीसरी आयुर्वेद स्वास्थ्य पद्धति से तरोताजा किये जाने की कला।

कोवलम

केरल भ्रमण की शुरूआत करें राजधानी तिरुवनंतपुरम (त्रिवेंद्रम) से महज 16 किलोमीटर दूर स्थित कोवलम बीच से। कोवलम को भारत के सबसे सुंदर बीचों में से एक माना जाता है। लाइट हाउस बीच, इवनिंग बीच और समुद्र बीच, साथ-साथ हैं। चूंकि इन बीच पर गहराई एकदम नहीं है लिहाजा गार्ड की निगरानी में पानी के अंदर अठखेलियां करने की यह बेहतरीन जगह है।

कोवलम के यह बीच देश के सबसे अच्छे बीच में गिने जाते हैं। यहां आराम करने के लिये छतरी व चारपाई लेते हुए मोलभाव जरूर कर लें। कोवलम में पांच सितारा होटलों से लेकर सामान्य श्रेणी के अच्छे होटल हैं। इसलिये यात्रा का कार्यक्रम बनाने से पहले केरल पर्यटन की वेबसाइट पर अपने बजट के मुताबिक पहले से ही बुकिंग जरूर करा लें। कोवलम में रहते हुए ही आप त्रिवेंद्रम या तिरुवनंतपुरम शहर को घूमने जा सकते हैं।

आयुर्वेद मसाज

कोवलम की दिलचस्प फिजाओं में स्वास्थ्य लाभ भी। यानी एक पंथ दो काज। कोवलम में आयुर्वेद पद्धति से मसाज काफी प्रसिद्ध है। लेकिन मसाज के लिये केवल उन्हीं सेंटर पर जाना चाहिये जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हैं। दरअसल यहां पर नारियल के तेल में विभिन्न जडी-बूटियों को मिलाकर शरीर की मालिश की जाती है। खासकर हड्डियों से सम्बन्धित रोगों के लिये यह बढिया उपचार है। मसाज के लिये दवाओं के हिसाब से कीमतें तय हैं, जिनमें 300 रुपये से शुरू होकर पांच हजार रुपये प्रति घंटा तक लिया जाता है।

बैकवाटर्स

केरल में बैकवाटर्स (यानी समुद्र का वह पानी जो लौटकर जमीन की तरफ आ जाता है) देखने लायक है। हरे-भरे धान के खेतों के बीच ऊंचे नारियल के पेड और साथ में बैकवाटर्स। यहां कुल मिलाकर करीब 900 किलोमीटर का बैकवाटर्स का नेटवर्क है। अल्लपुषा (एलेप्पी), कोट्टायम व कोच्ची बैकवाटर्स के प्रमुख केंद्र हैं। एलेप्पी तो सबसे खास है। मीलों लम्बे फैले बैकवाटर्स में एक से एक बढिया हाउसबोट हैं जिनमें पांच सितारा होटलों की सी सुविधाएं हैं। बांस से बनी इन हाउसबोट्स में परिवार सहित एक रात गुजारी जा सकती है। करीब सात हजार से लेकर चौदह हजार रुपये में दो कमरों वाली अच्छी हाउसबोट आपको पानी के भीतर धीमे-धीमे घुमाती रहेगी। वहीं दो वक्त खाना और सुबह का नाश्ता इसी में दिया जायेगा। लेकिन रात को ना रहना हो तो एक घंटे के 300 रुपये से लेकर एक ‘फेरी’ भी की जा सकती है।

कोच्चि

अरब सागर के तट पर कोच्चि (एर्णाकुलम) बसा है। यह केरल का सबसे बडा व्यावसायिक केंद्र है और विश्व का सबसे बडा प्राकृतिक हार्बर भी यही है। कोच्चि के लिये एलेप्पी से कार के द्वारा जाया जा सकता है। बाकी देश से भी यह जगह रेल व हवाई सेवा से सीधे जुडी है। हाउसबोट का आप मजा ले चुके हों तो यहां मोटरबोट पर जरूर जायें। पुर्तगालियों ने ‘फोर्ट कोच्चि’ गांव को बसाया था। हार्बर हाउस और कई अन्य जगहों को आप मोटरबोट से ही देख सकते हैं। डॉल्फिन को आपकी बोट में आपके साथ रेस लगाते देख चौंकियेगा नहीं। डॉल्फिन यहां घूमती रहती है। ‘डच पैलेस’ देखने लायक है जिसे पुर्तगालियों ने 1557 में बनाकर केरल के राजा को सौंपा था।

क्यों है खास केरल

केरल हिंदुस्तान का सबसे साफ सुथरा राज्य है। (इसका अहसास आपको रेलवे स्टेशनों से भी हो जायेगा) यहां सौ प्रतिशत साक्षरता दर है। बेहतरीन कानून व्यवस्था और विश्व की सबसे बढिया चिकित्सा सुविधाओं में से एक यहां है। यहां सबसे कम मृत्यु दर है। हिंदु, ईसाई व मुस्लिम सभी धर्म यहां बसते हैं। यहां समुद्र तल से निचली सतह पर खेती की जाती है। है ना खास बात!

खाने-ले जाने को बहुत कुछ

शापिंग: केरल में सिर्फ खानपान ही सस्ता नहीं है बल्कि यहां से बढिया खरीदारी भी की जा सकती है। यहां से आप काजू ले ही जा सकते हैं। काजू का आकार इसकी कीमत तय करता है। लेकिन सबसे बढिया काजू 350 रुपये किलो से महंगा नहीं। केरल मसालों का भी सबसे बढिया केंद्र है। दालचीनी व इलायची काफी सस्ती व उत्तम किस्म की है। बाकी मसालें भी ले जाना न भूलें। साडियों की तो यहां भरमार है। बजट के हिसाब से सिल्क व कॉटन की हर वैरायटी मिलेगी। इन साडियों की कीमत उत्तरी भारत के बाजारों से काफी कम है।

खाना: यदि आप शाकाहारी हैं तो भी केरल में दिक्कत नहीं और मांसाहारी हैं तो भी वाह-वाह। सी फूड के शौकीन अपनी पसंद का हर किस्म का पकवान ले सकते हैं। मछलियों से लेकर प्रॉन और अन्य किस्म का समुद्री स्वाद यहां मिलेगा जबकि शाकाहारी को साउथ इंडियन थाली में हर सब्जी मिलेगी मगर नारियल वाली। डोसा, इडली और उत्तपम का तो स्वाद ही निराला है। केला भी यहां विभिन्न किस्मों का मिलेगा। इनके स्वाद भी अलग-अलग हैं और एक से बढकर एक गुणकारी, खासकर यहां का लाल केला जिसका स्वाद आपको उत्तर भारत में कहीं नहीं मिलेगा। पीने के लिये नारियल पानी की बात ही अलग है।

कब व कैसे: यूं तो पूरे साल केरल जाया जा सकता है। यहां तापमान में थोडा सा ही फेरबदल है। गर्मियों में यहां तापमान 24-33 डिग्री सेल्शियस के बीच रहता है। बस उमस थोडा ज्यादा होती है। सर्दियों में 22-32 डिग्री सेल्शियस और वर्षा ऋतु में 22-28 डिग्री सेल्शियस तक तापमान होता है। पहनावा सूती ही रखना बेहतर होगा। सर पर टोपी और धूप का चश्मा और सन स्क्रीन लोशन के साथ घूमने जायें तो आरामदायक रहेगा। त्रिवेंद्रम के लिये देश के हर प्रमुख शहर से रेल सेवा है। पूर्व योजना हो तो हवाई जहाज से भी जाना ज्यादा खर्चीला नहीं।

गुरुवार, अप्रैल 07, 2011

केरल- भीगे मौसम का मजा

यह लेख 30 जुलाई 2006 को दैनिक जागरण के यात्रा परिशिष्ट में छपा था।

जब मानसून के बरसते दिनों में लोग घरों में दुबकना पसन्द करते हैं तब केरल में सांस्कृतिक व प्राकृतिक छटा पूरे यौवन पर होती है। औरों से अलग अगर छुट्टियां बितानी हों तो केरल के खूबसूरत सफर पर जाने की सलाह दे रहे हैं पी. के. आर्य:


वर्षा ऋतु में सैर-सपाटा? तौबा-तौबा! दिन बारिश के हों तो घर में बैठकर चाय-पकौडे खाना सबसे ज्यादा सुहाता है। लेकिन नहीं जनाब। घूमने वाले कहते हैं कि बारिश में पर्यटन का भी अपना मजा है और बात अगर केरल की हो तो फिर कहना ही क्या। वास्तव में केरल की खूबसूरती का सबसे ज्यादा आनन्द मानसून के दौरान ही उठाया जा सकता है। यह बात यहां इन दिनों आने वाले देशी-विदेशी सैलानियों की संख्या को देखकर साबित भी होती है। शानदार सघन वन, नयनाभिराम पर्वत शिखर, वेगवती नदियां, विशाल समुद्री झीलें और ताल-तलैया, दुग्ध धवल झरनें और सुरम्य सागरतट। चारों ओर जबरदस्त हरियाली। बस यूं समझ लीजिये कि प्रकृति के उपहारों का भरपूर वरदान है- केरल।


तभी तो इसे ‘गॉड्स ऑन कंट्री’ अर्थात ‘ईश्वर की अपनी भूमि’ कहा गया है। भारत भर में भ्रमण करने के पश्चात केरल आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक यहां की प्राकृतिक छटा को देखकर मंत्रमुग्ध हो उठते हैं।


एलप्पी (अल्पुज्जा) से कोल्लम तक के बैकवाटर्स का स्वप्निल सौन्दर्य, बेहद खूबसूरत कोवलम बीच, कायाकल्प कर देने वाली आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति और समृद्ध कला-संस्कृति के कारण भी केरल विश्व पर्यटन मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बना रहा है। केरल के पर्वतीय भूभाग में चाय, कॉफी, रबर, इलायची, सन्तरा और काली मिर्च आदि के विशाल बाग-बगीचे हैं, जबकि निचले हिस्से में चावल, तिल, नारियल, कटहल, आम, सुपारी, इमली, केला और काजू सहित विभिन्न प्रकार के मसालों व गिरीदार फलों के पेड-पौधे सर्वत्र अंतहीन हरियाली के हस्ताक्षर हैं। किंवदंतियां, पौराणिक आख्यान और पुरातात्विक जानकारियां केरल के प्रारम्भिक जीवन की दिलचस्प कडी हैं। सर्वमान्य जनश्रुति है कि केरल समुद्र की गहराई से निकला है। केरल के लिपिबद्ध इतिहास पर नजर डालें तो उसकी जडें भी प्राचीन उद्धरणों से होती हुई ईसा पूर्व तीसरी सदी तक जाती हैं। सम्राट अशोक के स्तम्भ इस इतिहास के प्रमुख प्रमाण हैं।


ईसा पूर्व 1200 में केरल के साथ समुद्री व्यापार के अगुवा फिनीशिया (सीरिया) के लोग थे। वे बन्दर, मोर, हाथीदांत और चन्दन की लकडी के व्यापार के सिलसिले में यहां पहुंचे थे। केरल के मसालों की ख्याति ईस्वीं 30 में रोमनों को यहां लाई, उनके पीछे-पीछे ग्रीक लोग भी यहां आये। मसालों के लिये 1498 में वास्को-डि-गामा भी कोझीकोड आया। उसके आने से यूरोपीय देशों के साथ केरल के व्यापार का एक नया अध्याय शुरू हुआ। मलय प्रायद्वीप, फिलीपीन, जावा और सुमात्रा के व्यापारी भी केरल बन्दरगाहों पर व्यापार के लिये पहुंचते रहे। इन देशों द्वारा सोने का व्यापार होता था और पश्चिम के देश चन्दन की लकडी, मसालों और हाथीदांत का व्यापार करते थे। केरल के शासकों और कोझीकोड के जामेरिनों ने इन व्यापारियों को तमाम सुविधाएं और केरल में बसने की इजाजत दी। सन 1516 में पुर्तगालियों को और उसके बाद डच व्यापारियों को यहां व्यापार का अधिकार मिला। सन 1663 में पुर्तगालियों को यहां से बलपूर्वक निकाल दिया गया। 1795 में डचों को भी बाहर जाना पडा, क्योंकि तब तक ब्रिटिश व्यापारी भारत में सबसे ताकतवर हो चुके थे और उनका ही प्रभुत्व फैल रहा था। आधुनिक केरल का जन्म 1956 में तब हुआ, जब दक्षिण भारत के मलयालम भाषी हिस्सों को जोडकर इस नये राज्य का गठन किया गया।


केरल की राजधानी तिरुअनन्तपुरम है। यह शहर तटों, पर्वतों, वन्य जीव अभ्यारण्यों और द्वीपों के एक सुन्दर संसार में प्रवेश के लिये द्वार खोलता है। सात पहाडियों पर बसे इस शहर का नाम सौ मुखों वाले पवित्र सर्प ‘अनन्त’ के नाम पर है।


तिरुअनन्तपुरम से 9 किलोमीटर की दूरी पर वेली टूरिस्ट विलेज एक सुन्दर झील है। मानसूनी पर्यटकों के लिये यह स्थान स्वर्ग सरीखा है। समुद्र के किनारे स्थित इस झील के मध्य में एक बांध बनाया गया है। समीप ही स्थित सुन्दर बागों की श्रंखला इस स्थान को और भी अधिक रमणीय बनाती है। वेडिंग पुल, तैरता हुआ ब्रिज और रेस्तरां यहां के सौन्दर्य में चार चांद लगाते हैं। जल क्रीडा के लिये यह एक बेहतरीन स्थान है। चप्पुओं और पेडल वाली नावों पर नौका विहार, वाटर स्कूटरों और हॉवर क्राफ्ट की सुविधाएं यहां उपलब्ध हैं। यहां से थोडी ही दूरी पर आम्कुलम झील है, जहां केरल का सबसे बडा बाल उद्यान है। वेली से यहां नौकाओं द्वारा पहुंचा जा सकता है।


तिरुअनन्तपुरम से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कोवलम भारत के सबसे सुन्दर समुद्र तटों में से एक है। डिस्कवरी चैनल द्वारा इसकी गणना दुनिया के सुन्दरतम समुद्र तटों में की गई है। यह अपूर्व प्राकृतिक सौन्दर्य से भरा पूरा सुरक्षित ठहरने का स्थल है। यहां सुरक्षित स्नान, योग और आयुर्वेदिक उपचार और मालिश की सुविधाओं के साथ पानी के खेलों का भी इंतजाम है। कोवलम के तट के किनारे ठहरने की विभिन्न सुविधाएं हैं। केरल के कीलोन से एलप्पी के बीच बैकवाटर्स में तैरते असंख्य हाउसबोट, मानसूनी पर्यटन को और अधिक रोमांचक बनाते हैं। उत्तर भारत की गर्मी में जो नवयुगल वैवाहिक जीवन में प्रवेश करते हैं, वर्षा ऋतु में यह स्थान उनके लिये आकर्षक हनीमून स्थल के रूप में भी विकसित हो रहा है।


कुछ समय पहले तक नारियल और बांस के घने जंगलों के मध्य जल-क्रीडा करते हुए बीच पानी में केटुवेलन नाव से सवारी करना अपने आप में एक सुखद अनुभव था। लेकिन जो लोग इसका लुत्फ उठा चुके हैं अगर अब वे केरल आते हैं तो वो देखकर चौंक जायेंगे कि पर्यटन एजेंसियों ने इन पारम्परिक नावों को हाउसबोट में परिवर्तित करके समूचे क्षेत्र को अविस्मरणीय बना दिया है। आने वाले पर्यटक यहां न सिर्फ जल क्रीडा व शान्त जंगलों के बीच अपनी छुट्टियां बिता सकते हैं बल्कि इस अनुभव को यादगार स्वरूप भी प्रदान कर सकते हैं। तिरुअनन्तपुरम से उत्तर में लगभग 50 किलोमीटर दूर वरकाला में अति सुन्दर समुद्री तट वरकाला बीच और जनार्दन स्वामी का प्रसिद्ध मन्दिर है, यह प्राचीन मन्दिर 2000 वर्ष पूर्व बनाया गया था। जनार्दन मन्दिर के तीन किलोमीटर पूर्व में पहाडी पर स्थित शिवगिरी मठ हिंदू धर्मावलम्बियों का पवित्र स्थल है। इसे प्रसिद्ध हिंदू सुधारक नारायण गुरू ने 1904 में बनवाया था। वरकाला समुद्र किनारे का एक सुन्दर स्थल भी है, जहां खनिज जल के झरने हैं। यह समुद्र तट ‘पापनाशय’ के नाम से जाना जाता है और मलयालम के कारकिदकम महीने की पूर्णिमा को यहां सैंकडों हिंदुभक्त ‘बाबुबली’ का विधिपूर्वक पालन करते हैं। वरकाला बीच एक बहुत ही खूबसूरत सैरगाह है। यहां से दूर-दूर तक फैले समुद्री तट पर नारियल और काजू के घने कुंज नजर आते हैं। यहां धातु मिश्रित जल के कई झरने भी हैं।


वरकाला से 37 किलोमीटर दूर अष्टमुडी झील के किनारे बसे कोल्लम शहर का पुराने समय से ही व्यापारिक महत्व रहा है। अति प्राचीन काल में कोल्लम के बन्दरगाह यूरोप, मिस्र, एशिया माइनर व चीन आदि देशों के जहाज व्यापार करने आते थे। कोल्लम केरल के सुप्रसिद्ध बैकवाटर्स का प्रवेश द्वार कहलाता है। कोल्लम व एलेप्पी के बीच की झीलें और जलमार्ग ऐसे हैं, जिन पर नौका विहार का आनन्द कभी भुलाया नहीं जा सकता। कोल्लम से एलेप्पी के बीच लगभग आठ घण्टे की आनन्ददायी यात्रा के दौरान पूरे जलमार्ग के दोनों ओर लहलहाते असंख्य नारियल के वृक्ष मानों आगंतुकों का स्वागत कर रहे हों।


कला और संस्कृति की दृष्टि से भी केरल अत्यन्त समृद्ध है। प्राचीनकाल से ही यह प्रदेश कलाओं की लीलास्थली रहा है। केरल का कत्थकली नृत्य तो देश-विदेश में प्रसिद्ध है। कुल मिलाकर मानसूनी पर्यटन के लिये केरल एक ऐसा आदर्श स्थल है, जहां व्यक्ति एक बार आने पर बार-बार आना चाहता है।


सर्प नौका रेस


जुलाई से सितम्बर के दौरान यह केरल के बैकवाटर्स का सबसे बडा आकर्षण होता है। यह आयोजन ओणम के पर्व से जुडे होते हैं। इसे केरल की संस्कृति की सबसे शानदार तस्वीर भी कहा जा सकता है। सजे-धजे हाथी और वाटर परेड से इसकी रंगत कुछ और ही हो जाती है। खेलों के नजरिये से देखें तो यह दुनिया में सबसे बडी भागीदारी टीम स्पर्धा है। एक सर्प नौका में एक मुख्य नाविक, 25 गायक और सौ से सवा सौ खेवैये होते हैं। इन रेसों में सबसे पुरानी अम्बलापुज्जा के श्रीकृष्ण मन्दिर की चंपाकुलम मूलम बोटरेस, दो दिन की अर्णामुला बोटरेस, अल्पुज्जा से 35 किलोमीटर दूर पय्यीपड झील में तीन दिन का जलोत्सवम, नेहरू ट्रॉफी बोटरेस व और भी न जाने कितनी रेस शामिल हैं। अब तो इन रेसों में अंतर्राष्ट्रीय टीमें भी आने लगी हैं। इन नौका दौडों के पीछे सबकी अपनी एक कहानी है।


कैसे और कहां


केरल भारत के दक्षिण सिरे पर है और देश के सभी भागों से रेल, सडक व वायु मार्ग से भली-भांति जुडा है। मानसून इस समय जोरों पर है और सितम्बर तक इसका भरपूर आनन्द वहां उठाया जा सकता है। ठहरने के लिये ज्यादातर शहरों में हर किस्म के होटल हैं लेकिन बैकवाटर्स के इलाके में किसी हाउसबोट पर ठहरने का अनुभव यादगार रहेगा। यह खास महंगा भी नहीं है। कई होटलों की ऑनलाइन बुकिंग सुविधा उपलब्ध है और अलग-अलग अवधि के पैकेज टूर भी ट्रैवल ऑपरेटर आयोजित करते हैं।