रविवार, फ़रवरी 12, 2012

गन्धर्वसेन मन्दिर- चूहा करता है नाग की परिक्रमा

मध्य प्रदेश के देवास के नजदीक प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी है- गन्धर्वपुरी। गन्धर्वसेन की इस नगरी में एक मन्दिर है जिसे गन्धर्वसेन मन्दिर के नाम से जाना जाता है। इसका अपना अलग ही ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। इससे कई चमत्कार भी जुडे हुए हैं। मन्दिर के गुम्बद के नीचे एक ऐसा स्थान है, जिसके बीचोंबीच पीले रंग का एक इच्छाधारी नाग अपना स्थान ग्रहण करता है। इसके चारों ओर ढेर सारे चूहे परिक्रमा करते हैं। ऐसा क्यों होता है, इसका रहस्य आज तक कोई नहीं जान पाया। गांव के लोग इसे नागराज का चूहापाली स्थान कहते हैं। इस स्थान को हजारों वर्ष पुराना बताते हैं। लोगों का कहना है कि नाग और चूहे को एक साथ आज तक किसी ने नहीं देखा लेकिन परिक्रमा पथ पर चूहों के मल-मूत्र और और उसके बीचोंबीच नाग का मलमूत्र प्रायः देखा गया है। गांव वाले उस स्थान को कई बार साफ करते हैं लेकिन फिर से वहां मल-मूत्र दिख जाता है। 

प्राचीन मन्दिर में राजा गन्धर्वसेन की मूर्ति भी स्थापित है। वैसे तो राजा गन्धर्वसेन के बारे में कई किस्से-कहानियां प्रचलित हैं लेकिन इस स्थान से जुडी उनकी कहानी अजीब ही है। वहां के लोगों का कहना है कि यहां पर राजा गन्धर्वसेन का मन्दिर सात-आठ खण्डों में था। बीच में राजा की मूर्ति स्थापित थी लेकिन अब सारे खण्ड खत्म हो चुके हैं और सिर्फ राजा की मूर्ति वाला मन्दिर ही बचा है। यहां आसपास जंगल और नदी होने की वजह से कई नाग देखे गये हैं, पर इस मन्दिर में चूहों को किसी ने नहीं देखा। फिर भी वहां चूहों का मल-मूत्र प्रकट हो जाता है। वहां के बुजुर्गों के अनुसार, यहां हजारों वर्षों से एक इच्छाधारी पीला नाग रहता है जिसकी लम्बी-लम्बी मूछें हैं। वह बारह से पन्द्रह फीट लम्बा है। किस्मत वालों को ही नागराज दिखाई देता है। कहते हैं, मन्दिर की रक्षा यही इच्छाधारी नाग करता है। कभी कभी काफी सुबह मन्दिर से घण्टियों की आवाज सुनाई देती है। अमावस्या और पूर्णिमा के दिन अक्सर ऐसा होता है कि जब मन्दिर का ताला खोला जाता है तो पूजा-आरती के पहले ही मन्दिर अन्दर से साफ-सुथरा मिलता है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने अभी अभी पूजा की हो। 

जिस तरह से इस मन्दिर में चूहे नाग की परिक्रमा करते हैं, वैसे ही यहां की सोमवती नदी भी इस मन्दिर का गोल चक्कर लगाते हुए कालीसिंध में जा मिलती है। गन्धर्वसेन मन्दिर में आने वाले हर इंसान का दुख दूर होता है। जो भी यहां आता है, उसको शान्ति का अनुभव होता है। इसका गुम्बद परमार काल में बना है, लेकिन नींव और मन्दिर के स्तम्भ और दीवारें बौद्ध काल की मानी जाती हैं। 

कैसे पहुंचें 

इंदौर से बस या ट्रेन से देवास पहुंचें। देवास से बस द्वारा यहां पहुंचा जा सकता है। देवास की सोनकच्छ तहसील में गन्धर्वपुरी स्थित है। 

लेख: अनिता घोष (राष्ट्रीय सहारा में 20 नवम्बर 2011 को प्रकाशित)

शनिवार, फ़रवरी 11, 2012

सूर्य मन्दिर, कोणार्क

भारत में सूर्य की आराधना सदियों से होती रही है लेकिन यह अलग बात है कि कोणार्क का सूर्य मन्दिर भारत का इकलौता सूर्य मन्दिर है, जो पूरी दुनिया में अपनी भव्यता और बनावट के लिये जाना जाता है। यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। कोणार्क में बनी इस भव्य कृति को महज देखकर समझना कठिन है कि यह कैसे बनी होगी। इस मन्दिर के पत्थरों को इस प्रकार से तराशा गया है कि वे इस प्रकार से बैठें कि जोडों का पता न चले। 

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से 65 किलोमीटर दूर यह मन्दिर सूर्य देव के रथ के रूप में विद्यमान है। माना जाता है कि गंग वंश के राजा नृसिंहदेव ने इसका निर्माण 1236-1264 ई. पू. में किया था। बलुआ पत्थर और काले ग्रेनाइट पत्थर से बने इस भव्य मन्दिर स्थल को 12 जोडी चक्रों वाले, सात घोडों से खींचे जाते सूर्यदेव के रथ के रूप में बनाया गया है। हालांकि अब इनमें से सिर्फ एक घोडा ही बचा है। कहा जाता है कि इसके निर्माण में 1200 कुशल शिल्पियों ने 12 सालों तक लगातार काम किया था। मन्दिर अपनी कामुक मुद्राओं वाली शिल्पाकृतियों के लिये भी प्रसिद्ध है। मुख्य मन्दिर तीन मण्डपों में बना है, जिसमें से दो मण्डप ढह चुके हैं। तीसरे मण्डप में मूर्ति थी, जिसे अंग्रेजों ने रेत और पत्थर से भरवाकर सभी द्वारों को स्थायी रूप से बन्द करवा दिया था। 

मन्दिर के प्रवेश द्वार पर नट मन्दिर है। मूल मन्दिर में सूर्य भगवान की तीन प्रतिमाएं हैं- उदित सूर्य, मध्याह्न सूर्य और अस्त सूर्य। इसके प्रवेश द्वार पर दो सिंह हाथियों पर आक्रमण होते हुए रक्षा में तत्पर दिखाए गये है। दोनों हाथी एक-एक मानव की मूर्ति पर स्थापित हैं। ये प्रतिमाएं एक ही पत्थर की बनी हैं। मन्दिर के दक्षिण भाग में दो सुसज्जित घोडे बने हुए हैं। पूरे मन्दिर में जहां-तहां फूल-बेल और ज्यामितीय नमूनों की भी नक्काशी की गई है, वहीं इनके साथ ही मानव, देव, गंधर्व, किन्नर आदि की आकृतियां भी ऐंद्रिक मुद्राओं में दर्शाई गई हैं। 

माना जाता है कि वास्तु दोष होने के कारण यह मन्दिर 800 सालों में ही ध्वस्त हो गया। वास्तुशास्त्री के मुताबिक, मन्दिर का निर्माण रथ आकृति होने से पूर्व दिशा के साथ आग्नेय और ईशान कोण खण्डित हो गया। पूर्व से देखने पर पता लगता है कि ईशान एवं आग्नेय कोणों को काटकर यह वायव्य और नैऋत्य कोणों की ओर बढ गया है। प्रधान मन्दिर के पूर्वी द्वार के सामने नृत्य शाला है, जो पूर्वी द्वार अवरोधित होने के कारण अनुपयोगी सिद्ध होती है। नैऋत्य कोण में छायादेवी के मन्दिर की नींव प्रधानालय से अपेक्षाकृत नीची है। उससे नैऋत्य भाग में मायादेवी का मन्दिर और नीचा है। आग्नेय क्षेत्र में विशाल कुआं है। दक्षिण एवं पूर्व दिशाओं में विशाल द्वार हैं, जिस कारण मन्दिर का वैभव एवं ख्याति क्षीण हो गई है। 16वीं सदी के मध्य में मुगल आक्रमणकारी कालापहाड ने इसे काफी नुकसान पहुंचाया और कई मूर्तियों को खण्डित किया, जिसके कारण मन्दिर का परित्याग कर दिया गया। मुगलकाल में इस मन्दिर में पूजा-अर्चना बन्द हो गई। 

कोणार्क यात्रा का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च तक सर्दियों के दौरान है। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिये यहां कोणार्क नृत्य महोत्सव आयोजित किया जाता है। पुरी और भुवनेश्वर से कोणार्क आसानी से जाया जा सकता है और दोनों शहर वायुमार्ग और रेलवे द्वारा जुडे हुए हैं। 

लेख: विनीत (राष्ट्रीय सहारा में 30 अक्टूबर 2011 को प्रकाशित)

शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2012

मांडू- खुशियों का शहर

मांडू मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित खूबसूरत एवं ऐतिहासिक पर्यटन स्थल है। यह इंदौर से लगभग 100 किलोमीटर दूर है, जो विन्ध्य पहाडियों में 2000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह मूलतः मालवा के परमार राजाओं की राजधानी हुआ करता था। तेरहवीं सदी में मालवा के सुल्तानों ने इसका नाम शादियाबाद यानी ‘खुशियों का शहर’ रख दिया था। वास्तव में, यह नाम इस जगह को सार्थक करता है। यहां के दर्शनीय स्थलों में जहाज महल, हिंडोला महल, शाही हमाम और आकर्षक नक्काशीदार गुम्बद वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। परमार शासकों द्वारा निर्मित इस नगर में जहाज और हिंडोला महल खास हैं, जिनकी वास्तुकला देखने लायक है। मांडू की छोटी छोटी पहाडियों पर बने किलों को देखकर प्रतीत होता है जैसे जादुई विन्ध्य पर्वतमालाएं इनकी जादू की झप्पी ले रही है। मांडू का मनोहर नजारा सैलानियों के साथ साथ ऐतिहासिक धरोहरों व इमारतों को देखने, इन्हें नजदीक से देखने की इच्छा रखने वालों को भी खासा आकर्षित करता है। ऐसी जगह जहां के वातावरण में आनन्द, शान्ति व प्यार का आभास होने के साथ खूबसूरती के कई पहलुओं का मजा भी लिया जा सकता है। 

मांडू अपने भीतर इतिहास के कई राज समेटे हुए है। यहां की बडी बडी इमारतें जो अब खंडहर में तब्दील हो गई हैं, इन्हें देखने पर आज भी एहसास दिलाती हैं जैसे वृहद साम्राज्य आंखों के सामने दिखाई दे रहा हो। हरियाली की चादर ओढे छोटी छोटी पहाडियां, झरने, मवेशी व गहनों से सजे-धजे रंग-बिरंगे कपडे पहने धार के आदिवासी बरबस ही पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। यदि आप बस से यहां आयेंगे तो रास्तों के दोनों तरफ छोटी-बडी कई जर्जर इमारते नजर आयेंगी। इन इमारतों पर उगी घास व जर्जरता इन्हें और खूबसूरत बनाते हैं। इनमें से एक रानी रूपमति का महल पहाडी की ऊंचाई पर है। कहते हैं कि रानी रूपमति सुबह में यहां से नर्मदा नदी के दर्शन करती थीं। यहां की इमली, कमलगट्टे और सीताफल बहुत प्रसिद्ध हैं। स्वाद, आकार व बनावट में यह इमली काफी अलग सी होती है। 

आकर्षण 

दरवाजे: 45 किलोमीटर लम्बी दीवारों की मुंडेर मांडू को घेरे हुए है, मांडू में प्रवेश करने के लिये उसमें 12 दरवाजे हैं। मुख्य रास्ता दिल्ली दरवाजा कहलाता है। दूसरे दरवाजे में रामगोपाल, जहांगीर और तारापुर दरवाजा शामिल है। 
जहाज महल: सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित जहाज महल को दो मानवनिर्मित तालाबों के बीच बनाया गया है। देखने में यह जहाज के आकार का है, शायद इसीलिये इसका नाम जहाज महल पडा। यह दोमंजिला महल संगमरमर से बना है, जिसे देखकर प्रतीत होता है कि यह पानी के ऊपर तैर रहा है। 
हिंडोला महल: टेढी व एक तरफ झुकी हुई दीवारों के कारण इस महल को हिंडोला महल कहते हैं। इसका निर्माण 1425 में होशंगशाह के शासन के दौरान हुआ था। इसे दर्शक कक्ष के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। 
जामी मस्जिद: दमिश्क की बेहतरीन मस्जिद से प्रेरित यह मस्जिद अपनी विशालकाय संरचना, सादगी और वास्तुकला के लिये मशहूर है। इसमें मौजूद बडा सा आंगन और भव्य प्रवेश द्वार भी लोगों को लुभाता है। जामी मस्जिद की सीढियां उस समय की वास्तुशिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इसके अलावा होशंगशाह की मस्जिद, नहर झरोखा, बाज बहादुर महल, रानी रूपमति महल, रेवा कुण्ड और नीलकंठ महल भी देखने लायक जगहें हैं। यहां सितम्बर-अक्टूबर में गणेश चतुर्थी भी बडी धूमधाम से मनाई जाती है। 

कब जायें 

मांडू में सालभर उष्णकटिबंधीय जलवायु रहती है, इसलिये गर्मी हो या सर्दी, आप कभी भी यहां अपनी छुट्टियां बिता सकते हैं। सर्दियों में यहां का तापमान 22 डिग्री होता है। जुलाई से मार्च यहां जाना चाहिये। 

कैसे जायें 

सडक मार्ग: अलग-अलग शहरों से यहां आसानी से बस से पहुंच सकते हैं। मांडू और इंदौर के लिये धार से होते हुए, मांडू और रतलाम तथा मांडू और भोपाल से बसें चलती हैं। 
हवाई मार्ग: नजदीकी हवाई अड्डा इंदौर है। इंदौर हवाई अड्डे से मुम्बई, दिल्ली, ग्वालियर और भोपाल तक कई हवाई जहाज उडान भरते हैं। 
रेल मार्ग: दिल्ली-मुम्बई मुख्य लाइन पर रतलाम सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है। ट्रेन से इंदौर पहुंचकर मांडू की यात्रा टैक्सी या बस से कर सकते हैं। 

लेख: अंशुमाला (राष्ट्रीय सहारा में 20 नवम्बर 2011 को प्रकाशित)

गुरुवार, फ़रवरी 09, 2012

महाबलेश्वर

महाबलेश्वर अपनी प्राकृतिक खूबसूरती, आकर्षक नजारों और पहाडों के चलते मशहूर है। यहां से आप समुद्र की झलक भी पा सकते हैं। 

समुद्र तल से 1372 मीटर की ऊंचाई पर स्थित महाबलेश्वर महाराष्ट्र के सतारा जिले में सहयाद्रि पर्वतों के बीच स्थित है। इस जगह के नाम पर कई तथ्य प्रचलित हैं, जैसे शीर्षक ‘महाबलेश्वर’ भगवान महादेव के मन्दिर से उत्पन्न हुआ है और संस्कृत के तीन शब्द महा (बढिया), बल (शक्ति) और ईश्वर (भगवान) इसके नाम को बनाते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि महाबलेश्वर का अर्थ शक्तिशाली ईश्वर है, जो पौराणिक अतीत का भी सर्वेसर्वा है। मैदानी इलाके की गर्मी से बचने के लिये अक्सर मुम्बई के आसपास के इलाकों व अन्य राज्यों से भी लोग यहां वीकेंड पर आते हैं। यहां घूमने और मस्ती-मनोरंजन करने के लिये उम्दा स्थान हैं। 

महाबलेश्वर अपनी प्राकृतिक खूबसूरती, आकर्षक नजारों और सुन्दर दिखते पहाडों के लिये मशहूर है। यहां से आप समुद्र की झलक भी पा सकते हैं। महाबलेश्वर की गलियों में टट्टू की सवारी का मजा लेना रोमांचक अनुभव है। कई तरह के मन को लुभाते हिल रिसॉर्ट इन पहाडों में बनाये गये हैं, जिन्हें देखकर लगता है कि यह सभी कोलोनियल एरा से यहां मौजूद हों। महाबलेश्वर को महाराष्ट्र के छुट्टियों में घूमने लायक उम्दा व सबसे बेहतरीन माना गया है।, फिर चाहें मौसम, एडवेंचर, घूमने-फिरने के नजरिये से ही क्यों न हो। यहां देखने लायक प्रतापगढ किला काफी भव्य है। इसके अलावा यहां पर ट्रेकिंग, बोटिंग और हॉर्स राइडिंग भी कर सकते हैं। 

कब जायें 

सभी हिल स्टेशनों की तरह महाबलेश्वर भी मानसून (मध्य जून से मध्य सितम्बर) के समय बन्द रहता है। गर्मी के दिनों में यहां अधिक संख्या में पर्यटक आते हैं। अप्रैल से मई के बीच, क्रिसमस (दिसम्बर) और दिवाली (अक्टूबर से नवम्बर) पर आसपास के लोग त्यौहार को डिफरेंट तरीके से इंजॉय करने के लिये यहां आना पसन्द करते हैं। हालांकि अक्टूबर से दिसम्बर के बीच घूमना काफी रोमांचक अनुभव है। 

कैसे जायें 

सडक मार्ग: मुम्बई से होते हुए पुणे यहां की दूरी 290 किलोमीटर है और महाड से 247 किलोमीटर। मुम्बई-पुणे से महाबलेश्वर के बीच प्रतिदिन बसें चलती हैं। बारिश में बसें कम चलती हैं। 
रेल मार्ग: नजदीकी रेलवे स्टेशन वथार है, जो 62 किलोमीटर दूर है। 120 किलोमीटर दूर पुणे सबसे सुविधाजनक रेलवे मार्ग पर पडता है। 
हवाई मार्ग: नजदीकी हवाई अड्डा पुणे है।
कहां ठहरें: यहां कई अच्छे होलीडे रिसॉर्ट और मोटल हैं, जहां उचित दर पर ठहरने की व्यवस्था है। 

लेख: अंशुमाला (राष्ट्रीय सहारा में 30 अक्टूबर 2011 को प्रकाशित)

बुधवार, फ़रवरी 08, 2012

कटारमल- उत्तराखण्ड का सूर्य मन्दिर

सूर्य मन्दिर का नाम आते ही लोगों के जेहन में कोणार्क कौंध जाता है जबकि कोणार्क सूर्य मन्दिर के अलावा उत्तराखण्ड के अल्मोडा जिले में भी एक सूर्य मन्दिर है। यह सूर्य मन्दिर कटारमल गांव में है, इसलिये इसे कटारमल सूर्य मन्दिर भी कहा जाता है। 

बारहवीं सदी में बना यह मन्दिर उत्तराखण्ड के इतिहास का प्रमाण है और सूर्य के प्रति लोगों की आस्था का भी। अल्मोडा में बना यह मन्दिर अपनी खूबसूरती के लिये भी उतना ही प्रसिद्ध है। इसकी बनावट और चित्रकारी बेहद खूब है। दीवारों पर भी खूबसूरत प्रतिमाएं दिख जाती हैं। मन्दिर में भगवान सूर्य की प्रतिमा एक मीटर लम्बी और पौन मीटर चौडी है, जो भूरे रंग के पत्थर को काटकर बनाई प्रतीत होती है। यहां सूर्य भगवान पदमासन की मुद्रा में बैठे हुए हैं। लोगों की आस्था है कि प्रेम और श्रद्धा से यहां मांगी हर इच्छा पूरी होती है। इस मन्दिर के दर्शन से ही भक्तजनों की बीमारियां और दुख दूर हो जाते हैं। इस मन्दिर को बारादित्य भी कहा जाता है, जो कुमाऊं का सबसे ऊंचा मन्दिर है। 

कहा जाता है कि मन्दिर का निर्माण कत्यूरी वंश के राजा कटारमल ने करवाया था, एक इस वजह से इसे कटारमल सूर्य मन्दिर भी कहा जाता है। लोगों का मानना है कि राजा कटारमल ने इस मन्दिर का निर्माण एक रात में करवा लिया था। कोणार्क सूर्य मन्दिर की तरह ही यह भी कॉम्प्लेक्स के समान ही है यानी यहां 45 छोटे-छोटे मन्दिरों की श्रंखला है। मुख्य मन्दिर में सूर्य की प्रतिमा के अलावा विष्णु, शिव और गणेश की मूर्तियां भी हैं। अन्य देवी-देवता भी यहां विराजमान हैं। लोगों का यह भी मानना है कि सभी देवी-देवता यहां मिलकर भगवान सूर्य की पूजा करते हैं। यहां सूर्य की प्रतिमा कई मायनों में अलग है, भगवान सूर्य यहां बूट पहने दिखते हैं। मन्दिर की इस प्रमुख बूटधारी मूर्ति की पूजा विशेष तौर पर शक जाति करती है। 

कहा तो जाता है कि यह मन्दिर बारहवीं सदी में बना है, फिर भी इसकी स्थापना को लेकर लोगों में एक मत नहीं है। इतिहासकारों का मानना है कि अलग-अलग समय पर इसका जीर्णोद्धार होता रहा है। हां, वास्तुकला की दृष्टि से देखा जाये तो यह मन्दिर 12वीं सदी का प्रतीत होता है। मन्दिर की मुख्य प्रतिमा 12वीं सदी में निर्मित बताई जाती है। सूर्य के अलावा विष्णु-लक्ष्मी, शिव-पार्वती, कुबेर, महिषासुरमर्दिनी आदि की मूर्तियां भी गर्भ-गृह में रखी हुई हैं। मुख्य मन्दिर के द्वार पर एक पुरुष की धातु की प्रतिमा है, जिसके बारे में राहुल सांकृत्यायन ने कहा है कि यह मूर्ति कत्यूरी काल की है। इस ऐतिहासिक मन्दिर को सरकार ने पुरातत्व स्थल घोषित कर दिया है। अब यह राष्ट्रीय सम्पत्ति हो गई है। मन्दिर की अष्टधातु की प्राचीन मूर्तियां काफी पहले चुरा ली गई थीं लेकिन अब इन्हें राष्ट्रीय पुरातत्व संग्रहालय में रखा गया है। मन्दिर के लकडी के खूबसूरत दरवाजे भी यहीं रखे गये हैं। 

एक साल पहले तक इस मन्दिर के मुख्य प्रवेश द्वार का पता नहीं था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को मन्दिर की पूर्व दिशा में कुछ सीढियों के अवशेष मिले हैं। उडीसा के कोणार्क मन्दिर का भी प्रवेश द्वार पूर्व में है। वैदिक पुस्तकों के अनुसार भी सूर्य मन्दिरों का प्रवेश द्वार पूर्व में ही होता है लेकिन कटारमल मन्दिर का प्रवेश द्वार आश्चर्यजनक रूप से एक कोने में है, जो इस स्थापत्य से मेल नहीं खाता। इस मन्दिर समूह के सभी मन्दिरों का प्रवेश समूह के पीछे छोटे से प्रवेश द्वार से है, जो सूर्य मन्दिर को भी जोडता है। 

यह मन्दिर करीब 1554 मीटर की ऊंचाई पर है, जहां पहुंचने के लिये पैदल चलना पडता है। यहां पहुंचने के लिये पहले अल्मोडा आना होगा। अल्मोडा से रानीखेत के रास्ते 14 किलोमीटर के बाद 3 किलोमीटर पैदल चलना पडता है। वैसे अल्मोडा से कटारमल मन्दिर की दूरी करीब 20 किलोमीटर है। 

लेख: राष्ट्रीय सहारा में 26 जून 2011 को प्रकाशित

मंगलवार, फ़रवरी 07, 2012

पुदुचेरी

चेन्नई से 162 किलोमीटर दूर पांडिचेरी 1954 में भारत का हिस्सा बना। इसके तहत चार मध्यकालीन बस्तियां पांडिचेरी, कराईकल, माहे और यनम शामिल हैं। कोरोमण्डल तट पर स्थित इस नगर ने कई उतार-चढाव के साथ साथ अलग-अलग साम्राज्यों को भी देखा है। वहां कभी पल्लव वंश का तो कभी चोल वंश का शासन रहा। अंत में वहां फ्रांसीसियों की सरकार बनी। 492 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले इस नगर और यहां के लुभावने घर, बगीचे और फ्रांसीसी शैली में बने होटल इस बात के गवाह हैं कि फ्रांस की संस्कृति यहां कितनी रची बसी हुई है। यहां की खूबसूरत हवेलियों पर हाथीदांत के रंग की दीवारों पर झूलते बोगनवेलिया दिखाई देते हैं। यह ऐसा अदभुत नगर है जहां 55 भाषाएं बोली जाती हैं। यहां चर्च के साथ मन्दिर भी बडी संख्या में हैं। पांडिचेरी में अंतर्राष्ट्रीय योग उत्सव, पोंगल, मासिमगम, विलयानूर मन्दिर का कार उत्सव, वैस्टाइल डे, खाद्योत्सव आदि काफी धूमधाम से मनाये जाते हैं। फ्रांसीसी कालोनी होने के कारण यहां फ्रेंच भाषा प्रमुख तौर से बोली जाती है। यहां की खास साइकिल संस्कृति है जो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर पर्यटन तक अपनी खास जगह रखती है। अगर सही मायने में पांडिचेरी की रौनक और खूबसूरती का लुत्फ उठाना हो तो कार में बैठकर नहीं बल्कि एक बार साइकिल पर बैठकर देखिये। सभी मुख्य सडकों पर और खासकर अरबिंदो आश्रम के पास ऐसी कई दुकानें हैं जो किराये पर साइकिलें देती हैं। 

श्री अरबिंदो आश्रम: पांडिचेरी का मुख्य आकर्षण श्री अरबिंदो आश्रम है। 1910 से 1950 तक रहे अरबिंदो ने फ्रांसीसी महिला की सहायता से यहां आश्रम की स्थापना की थी। यहां श्री अरबिंदो और श्री मां की संगमरमर की समाधि बनी हुई है। फ्रांसीसी महिला द मदर ने पांडिचेरी के उत्तर में दस किलोमीटर दूर ओरोविल में 1968 में उषा नगरी नाम से विश्व नगरी बसाई, जो देखने योग्य है। इसे सिटी ऑफ डॉन (सूर्योदय का नगर) कहा जाता है। यहां की सैर का आनन्द लेने के लिये साइकिल सबसे अच्छी सवारी है। 

मातृमन्दिर: ओरोविल के मुख्य आकर्षण का केन्द्र मातृमन्दिर है। यह गोल गुम्बद के आकार का है। इसके अन्दर एक ध्यान कक्ष है जिसमें बडा सा क्रिस्टल बॉल रखा गया है। यह सूर्य की रोशनी में खूब चमकता है। 

फ्रेंच इंस्टीट्यूट: इस संस्थान की शोहरत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर है जो यहां के डूमास स्ट्रीट पर है। यहां विज्ञान, भारतीय संस्कृति आदि से सम्बन्धित कई पुस्तकें उपलब्ध हैं। 

संग्रहालय: बीच के सामने स्थित संग्रहालय में कई तरह के ऐतिहासिक सिक्के देखने को मिलते हैं। ड्यूप्ले द्वारा इस्तेमाल की गई पालकी और बिस्तर भी यहां प्रदर्शन के लिये रखे गये हैं। पांडिचेरी का सागरतट बहुत ही खूबसूरत है। महात्मा गांधी और यहां पांडिचेरी के पूर्व गवर्नर ड्यूप्ले की मूर्ति सहित वार मेमोरियल आकर्षण का मुख्य केन्द्र हैं। 

आयी मंडप: यहां का जाना-माना स्मारक है यह। इसे फ्रांस में नेपोलियन द्वितीय के शासनकाल के दौरान बनाया गया था। इसका नाम 16वीं शताब्दी की एक वेश्या ‘आयी’ के नाम पर पडा। 

आनंद आश्रम: आनंद आश्रम को अंतर्राष्ट्रीय योग शिक्षा एवं अनुसंधान केंद्र के नाम से जाना जाता है। पांडिचेरी सरकार हर वर्ष चार से सात जनवरी तक अंतर्राष्ट्रीय योग उत्सव मनाती है। 

बोट हाउस: चुन्नाम्बर पांडिचेरी से 8 किलोमीटर दूर चुन्नाम्बर नदी पर बोटिंग की सुविधा उपलब्ध है। कल-कल बहता पानी और नदी के दोनों छोरों पर बिखरी हरीतिमा के बीच जल में सैर करना अलग ही अनुभव देता है। बोट सप्ताह में किसी भी दिन किराये पर ली जा सकती है। 

इसके अलावा 27 मीटर ऊंचा लाइट हाउस जो 150 साल पुराना है, देखने योग्य है। साथ ही, पांडिचेरी में जॉन ऑफ आर्क की प्रतिमा, प्रथम विश्वयुद्ध का स्मारक, राजभवन उद्यान, वनस्पति उद्यान, भरतियार मन्दिर के अलावा कई गिरजाघर दर्शनीय हैं। 

राष्ट्रीय सहारा में 10 अक्टूबर 2010 को प्रकाशित

सोमवार, फ़रवरी 06, 2012

51 शक्तिपीठ

पुराणों में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है। देश-विदेश में स्थित इन शक्तिपीठों में वर्षभर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है लेकिन नवरात्रों के दौरान इन शक्तिपीठों की मान्यता और ज्यादा बढ जाती है। 51 शक्तिपीठों से सम्बन्धित प्रचलित कथा के अनुसार सती के पिता राजा प्रजापति दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया लेकिन सती और उनके पति भगवान शिव को इसमें शामिल होने के लिये निमंत्रण नहीं भेजा, जिससे बमभोले इस यज्ञ में शामिल नहीं हुए लेकिन सती जिद कर यज्ञ में शामिल होने चली गईं। वहां वह शिव का अपमान सहन न कर सकीं और यज्ञकुण्ड में कूद पडीं। इससे भगवान शिव ने सती के वियोग में उनका शव अपने शिर पर धारण कर लिया और सम्पूर्ण भूमण्डल का भ्रमण करने लगे। सती का शव लेकर शिव पृथ्वी पर विचरण करते हुए नृत्य भी करते रहे, जिससे पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो गई। इस पर विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खण्ड करने का विचार किया। जब जब शिव नृत्य मुद्रा में पैर पटकते, विष्णु अपने चक्र से शरीर का कोई अंग काटकर उसके टुकडे पृथ्वी पर गिराते जाते। इस प्रकार जहां जहां सती के अंग, वस्त्र और आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ का उदय हुआ। 1. 

1. किरीट कात्यायनी: पश्चिमी बंगाल में हुगली नदी के तट पर लालबाग कोट स्थित शक्तिपीठ, जहां सती का किरीट यानी मुकुट गिरा था। 
2. कात्यायनी वृंदावन: मथुरा के भूतेश्वर में स्थित है कात्यायनी वृंदावन शक्तिपीठ, जहां सती के केशपाश गिरे थे। 
3. नैनादेवी: पाकिस्तान के सक्खर स्टेशन के निकट शर्कररे और हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर स्थित नैनादेवी मन्दिर स्थलों पर सती के नेत्र गिरे थे। 
4. श्रीपर्वत शक्तिपीठ: इस शक्तिपीठ को लेकर लोगों में मतांतर है। कुछ लोग मानते हैं कि इस पीठ का मूल स्थल लद्दाख है, जबकि कुछ कहते हैं कि यह असम के सिलहट में है जहां माता सती की कनपटी गिरी थी। 
5. विशालाक्षी शक्तिपीठ: वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर स्थित इस शक्तिपीठ पर माता सती के दाहिने कान के मणि गिरे थे। 
6. गोदावरी तट शक्तिपीठ: आन्ध्र प्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित इस शक्तिपीठ में माता का गाल गिरा था। 
7. शुचीन्द्रम शक्तिपीठ: कन्याकुमारी के त्रिसागर संगम स्थल पर है शुचि शक्तिपीठ, जहां सती के दांत गिरे थे।  
8. पंच सागर शक्तिपीठ: इस शक्तिपीठ का कोई तय स्थान ज्ञात नहीं है। यहां माता के नीचे के दांत गिरे थे। 
9. ज्वालादेवी शक्तिपीठ: हिमाचल प्रदेश के कांगडा स्थित शक्तिपीठ, जिह्वा गिरी थी। 
10. भैरव पर्वत शक्तिपीठ: मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित इस शक्तिपीठ में माता का ऊपर का होंठ गिरा था। 
11. अट्टहास शक्तिपीठ: यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है। यहां माता का निचला होंठ गिरा था। 
12. जनस्थान शक्तिपीठ: महाराष्ट्र में नासिक स्थित पंचवटी के इस शक्तिपीठ में माता की ठुड्डी गिरी थी।
13. कश्मीर शक्तिपीठ: जम्मू कश्मीर के अमरनाथ स्थित इस शक्तिपीठ में माता का कंठ गिरा था। 
14. नन्दीपुर शक्तिपीठ: पश्चिम बंगाल के सैन्थया स्थित इस पीठ में देवी की देह का कंठहार गिरा था। 
15. श्रीशैल शक्तिपीठ: आन्ध्र प्रदेश के कुर्नूल के पास है श्रीशैल शक्तिपीठ, जहां माता का गाल गिरा था। 
16. नलहरी शक्तिपीठ: पश्चिम बंगाल के बोलपुर में माता की उदरनली गिरी थी। 
17. मिथिला शक्तिपीठ: भारत और नेपाल सीमा पर जनकपुर रेलवे स्टेशन के पास बने इस शक्तिपीठ में माता का वाम स्कंध गिरा था। 
18. रावली शक्तिपीठ: चेन्नई में कहीं स्थित है रावली शक्तिपीठ, जहां माता का दक्षिण स्कंध गिरने का जिक्र आता है। 
19. अम्बाजी शक्तिपीठ: गुजरात जूनागढ के गिरनार पर्वत के प्रथत शिखर पर देवी अम्बिका का विशाल मन्दिर है, जहां माता का उदर गिरा था। 
20. जालंधर शक्तिपीठ: पंजाब के जालंधर में स्थित है माता का जालंधर शक्तिपीठ। यहां माता का बायां स्तन गिरा था। 
21. रामागिरि शक्तिपीठ: कुछ लोग इसे चित्रकूट तो कुछ मध्य प्रदेश के मैहर में मानते हैं, जहां माता का दाहिना स्तन गिरा था। 
22. बैद्यनाथ हार्द शक्तिपीठ: झारखण्ड के देवघर स्थित शक्तिपीठ में माता का हृदय गिरा था। मान्यता है कि यहीं पर सती का दाह-संस्कार भी हुआ था। 
23. बक्रेश्वर: बीरभूम, पश्चिम बंगाल के पापहर नदी से सात किलोमीटर दूर स्थित इस शक्तिपीठ में सती का भ्रूमध्य गिरा था। 
24. कण्यकाश्रम: तमिलनाडु के कन्याकुमारी के तीन सागरों- हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाडी के संगम पर स्थित है कण्यकाश्रम शक्तिपीठ, जहां माता की पीठ गिरी थी।
25. बहुला शक्तिपीठ: पश्चिम बंगाल के कटवा जंक्शन के निकट केतुग्राम में स्थित है बहुला शक्तिपीठ, जहां माता की बायीं भुजा गिरी थी। 
26. उज्जयिनी शक्तिपीठ: उज्जैन की पावन क्षिप्रा के दोनों तटों पर स्थित है उज्जयिनी शक्तिपीठ, जहां माता की कुहनी गिरी थी।
27. मणिवेदिका शक्तिपीठ: राजस्थान के पुष्कर में स्थित है यह शक्तिपीठ, इसे गायत्री मन्दिर के नाम से जाना जाता है। यहां माता की कलाईयां गिरी थीं। 
28. ललितादेवी शक्तिपीठ: प्रयाग (इलाहाबाद) स्थित ललितादेवी शक्तिपीठ में माता के हाथ की अंगुलियां गिरी थीं। 
29. उत्कल पीठ: उडीसा के पुरी में है, जहां माता की नाभि गिरी थी। 
30. कांची शक्तिपीठ: तमिलनाडु के कांचीवरम में माता का कंकाल गिरा था। 
31. कमलाधव: अमरकंटक, मध्य प्रदेश के सोन तट पर बायां नितम्ब गिरा था।
32. शोण शक्तिपीठ: मध्य प्रदेश के अमरकंटक का नर्मदा मन्दिर ही शोण शक्तिपीठ है। यहां माता का दक्षिण नितम्ब गिरा था। 
33. कामरूप कामाख्या: असम, गुवाहाटी के कामगिरि पर योनि गिरी थी। 
34. जयंती शक्तिपीठ: मेघालय के जयंतिया पर वाम जंघा गिरा था। 
35. मगध शक्तिपीठ: पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है। यहां माता का दाहिना जंघा गिरा था। 
36. त्रिस्तोता शक्तिपीठ: पश्चिम बंगाल के जलपाईगुडी के शालवाडी गांव में तीस्ता नदी पर माता का वाम पाद गिरा था। 
37. त्रिपुरा सुन्दरी शक्तिपीठ- त्रिपुरा पीठ: त्रिपुरा के राधकिशोर गांव में स्थित है त्रिपुरा सुन्दरी शक्तिपीठ, जहां माता का दक्षिण पाद गिरा था। 
38. विभाष शक्तिपीठ: पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के ताम्रलुक गांव में स्थित है विभाष शक्तिपीठ, जहां माता का वाम टखना गिरा था। 
39. देवीकूप पीठ कुरुक्षेत्र: हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन के निकट द्वैपायन सरोवर के पास स्थित है यह शक्तिपीठ। इसे श्रीदेवीकूप (भद्रकाली पीठ) भी कहा जाता है। यहां माता का दाहिना चरण गिरा था। 
40. युगाद्या शक्तिपीठ (क्षीरग्राम शक्तिपीठ): पश्चिम बंगाल के बर्दमान में क्षीरग्राम स्थित शक्तिपीठ, जहां सती के दाहिने चरण का अंगूठा गिरा था। 
41. विराट का अम्बिका शक्तिपीठ: जयपुर के वैराट ग्राम में स्थित है विराट शक्तिपीठ, जहां माता की बायें पैर की अंगुलियां गिरी थीं। 
42. काली शक्तिपीठ: कोलकाता के कालीघाट नाम से यह शक्तिपीठ, जहां माता के दायें पांव का अंगूठा छोडकर चार अन्य अंगुलियां गिरी थीं। 
43. मानस शक्तिपीठ: तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता की दाहिनी हथेली गिरी थी। 
44. लंका शक्तिपीठ: लंका शक्तिपीठ, जहां माता की पायल गिरी थी। 
45. गंडकी शक्तिपीठ: नेपाल में गंडक नदी के किनारे कपोल गिरा था। 
46. गुहेश्वरी शक्तिपीठ: नेपाल के काठमांडू में पशुपतिनाथ मन्दिर के पास ही स्थित है गुहेश्वरी शक्तिपीठ, जहां माता सती के दोनों घुटने गिरे थे। 
47. हिंगलाज शक्तिपीठ: पाकिस्तान के बलूचिस्तान में माता का सिर गिरा था। 
48. सुगंध शक्तिपीठ: बांग्लादेश के खुलना में नासिका गिरी थी। 
49. करतोयतत शक्तिपीठ: बांग्लादेश भवानीपुर के बेगडा में करतोयतत के तट पर माता की बायीं पायल गिरी थी। 
50. चट्टल शक्तिपीठ: बांग्लादेश के चटगांव में स्थित है चट्टल का भवानी शक्तिपीठ, जहां माता की दाहिनी भुजा गिरी थी। 
51. यशोरेवरी शक्तिपीठ: बांग्लादेश के जैसोर खुलना में स्थित है माता का प्रसिद्ध यशोरेवरी शक्तिपीठ, जहां माता की बायीं हथेली गिरी थी। 

राष्ट्रीय सहारा में 10 अक्टूबर 2010 को प्रकाशित

गुरुवार, जनवरी 26, 2012

मनमोहक डलहौजी

चिलचिलाती गर्मी से दूर किसी ठण्डे स्थान पर जाने का मन किसका नहीं करेगा, जहां चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड व हरी-भरी वादियों का विहंगम नजारा देखने को मिले। यदि आप टूर डेस्टिनेशन अभी तक तय नहीं कर पाये हैं, तो हिल स्टेशन डलहौजी जायें। चीड के पेडों से घिरे ढलाननुमा पहाडों पर विभाजित रास्तों से पर्यटक पैदल यात्रा कर डलहौजी की खूबसूरत वादियों का नजारा ले सकते हैं। ‘गेटवे ऑफ चम्बा वैली’ से मशहूर इस कोलोनियल टाउन की स्थापना 1854 में ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी ने की थी। पहाडों से बहती मंद-मंद हवा और विहंगम दृश्य रोमांच से भर देने के लिये काफी हैं। यहां की नैसर्गिक खूबसूरती पर्यटकों को अपने आगोश में समाने के लिये हमेशा तैयार प्रतीत होती है। डलहौजी का प्राकृतिक महत्व के साथ ऐतिहासिक महत्व भी है। यहां की खूबसूरती से अंग्रेज इतने प्रभावित हुए थे कि 18वीं शताब्दी में यहां के राजा से कुछ पहाडियों को लॉर्ड डलहौजी ने खरीद लिया था। 

आकर्षण 

जंध्री घाट: सुभाष बावली से लगभग आधा किलोमीटर दूर स्थित जंध्री घाट में मनोहर पैलेस ऊंचे-ऊंचे चीड के पेडों के बीच स्थित है। लॉर्ड डलहौजी के आने से पहले यहां चम्बा के पूर्व शासक का शासन था। पैलेस के अलावा यहां आप चाहें तो चीड के पेड से होकर निकलती सुगंधित मंद-मंद हवा में बैठकर पिकनिक का भी मजा ले सकते हैं। डलहौजी से पांच किलोमीटर दूर बकरोटा हिल्स से भी बर्फ से ढकी पहाड की चोटियों का नजारा मिलता है। 
सतधारा: पंजपुला के रास्ते में 2036 मीटर ऊंचाई पर स्थित सात झरनों वाली सतधारा है, जिसका उपचारात्मक महत्व भी है। पानी में मौजूद मिका मेडिसिनल प्रॉपर्टी के लिये मशहूर है। 
सुभाष बावली: यहां से भी आप बर्फ से ढके ऊंचे पर्वतों का विहंगम नजारा देख सकते हैं। यहां स्थित झरने की ऊंचाई 2085 मीटर है। 
कैथोलिक चर्च: डलहौजी अपने अनगिनत पुराने चर्चों के लिये भी मशहूर है। यहां स्थित सेंट फ्रांसिस के कैथोलिक चर्च का निर्माण 1894 में हुआ था। 

आसपास 

बडा पत्थर: कालाटोप के रास्ते में पडने वाले अहला गांव में घने जंगलों के बीच भुलवानी माता का छोटा सा मन्दिर स्थित है। यहां जुलाई में माता के आदर सत्कार व पूजा-अर्चना के लिये मेले का भी आयोजन किया जाता है। यह डलहौजी से चार किलोमीटर दूर है। 
डैनकुण्ड: डलहौजी से दस किलोमीटर दूर 2745 मीटर की ऊंचाई पर स्थित डैनकुण्ड से पहाडियों, घाटियों और नदी व्यास, रावी, चेनाब की कलकल लहरें देख सकते हैं। 
पंजपुला: डलहौजी से सिर्फ दो किलोमीटर दूर पांच पुल ‘फाइव ब्रिजेज’ को भारत के फ्रीडम फाइटर अजित सिंह की याद में बनवाया गया है। यहां स्थित प्राकृतिक टैंक और प्रतिष्ठित लोगों की मूर्ति इस स्थान को और भी शान्ति का आभास दिलाती है। इन छोटे छोटे पांच पुलों के नीचे से बहता पानी काफी आकर्षक लगता है। मान्यता है कि इसके पानी से कई तरह की बीमारियां ठीक होती हैं। 
साथ ही डलहौजी से ढाई किलोमीटर दूर खजियार झील है, जिसका आकार तश्तरीनुमा है। 

कैसे जायें 

हवाई मार्ग: नजदीकी हवाई अड्डा गग्गल (कांगडा) है, जो डलहौजी से 140 किलोमीटर दूर है। 
रेल मार्ग: नजदीकी रेलवे स्टेशन पठानकोट है, जो अमृतसर, जम्मू, दिल्ली और जालंधर से रेल मार्ग से जुडा हुआ है। 
सडक मार्ग: पठानकोट से डलहौजी बस या टैक्सी से जा सकते हैं। पंजाब और हिमाचल रोडवेज भी बस सेवा उपलब्ध कराती हैं। 

कहां ठहरें 

आप फाइव स्टार होटल में नहीं रहना चाहते, तो स्मॉल बजट होटल के साथ टूरिस्ट लॉज भी हैं, जहां उचित कीमत पर कमरा मिल जाता है। 

मौसम:
गर्मी में यहां का अधिकतम तापमान 30 और सर्दियों में 0 डिग्री से नीचे चला जाता है। 

लेख: अंशुमाला (राष्ट्रीय सहारा में 29 मई 2011 को प्रकाशित)

बुधवार, जनवरी 25, 2012

पलनी- भगवान कार्तिकेय की भूमि

महापुराणों में से स्कंद पुराण भगवान कार्तिकेय को समर्पित है। कार्तिकेय दक्षिण भारत में आकर क्यों बसे? इसका भी वर्णन स्कंद पुराण में मिलता है। मान्यता है कि कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर से मिलने देवर्षि नारद पधारे। मिलने के बाद नारद जी ने उन्हें ज्ञानफल दिया। ज्ञानफल को प्राप्त करने के लिये गणेश जी और कार्तिकेय जी दोनों लालायित हो उठे। तब, भगवान शिव ने अपने दोनों पुत्रों को ब्रह्माण्ड की परिक्रमा लगाकर आने को कहा। कार्तिकेय बिना विलम्ब किये अपने वाहन मयूर पर बैठकर ब्रह्माण्ड परिक्रमा के लिये निकल गये, जबकि गणेश अपने वाहन मूषक पर बैठकर अपने माता-पिता अर्थात पार्वती जी और शिवजी की परिक्रमा यह कहते हुए करने लगे कि आपसे ही ब्रह्माण्ड है, तो आपकी परिक्रमा करना ब्रह्माण्ड की परिक्रमा है। इस पर प्रसन्न होकर शिवजी ने देवर्षि नारद द्वारा प्रदत्त ज्ञानफल गणेश जी को प्रदान कर दिया। जब, ब्रह्माण्ड परिक्रमा कर कार्तिकेय जी पहुंचे तो इस घटना से नाराज होकर कैलाश पर्वत त्याग कर दक्षिण दिशा की ओर चल दिये। वहां पहुंचकर कार्तिकेय जी ने शिवगिरि पर्वत को अपना निवास बनाया। यहां पर कार्तिकेय ने वर्षों तक तपस्या की। 

मान्यता है कि कार्तिकेय को ब्रह्माण्ड के रहस्यों को बतलाने तथा उनकी अपनी क्षमता से परिचित कराने के लिये भगवान शिव आये और उन्हें ‘पलनी’ कहा। इसका अर्थ हुआ- तुम तो स्वयं ज्ञानफल हो। इस प्रकार कार्तिकेय का एक नाम पलनी हो गया। तब इनके नाम और महिमा की चर्चा पूरे दक्षिण भारत में फैल गई और यह स्थान महान तीर्थ बन गया। इनके पलनी नाम पर पूरी पर्वतमाला पलनी पर्वतमाला कहलाने लगी और शिवगिरि पहाडी के आसपास बसा नगर भी पलनी नाम से विख्यात हो गया। वर्तमान में, पलनी शैवभक्तों के लिये महत्वपूर्ण तीर्थ-स्थल है। लोग शिवगिरि पहाडी को पवित्र पहाडी के रूप में पूजते हैं। 

माना जाता है कि शिवगिरि पहाडी कभी कैलाश पर्वत के निकट स्थित थी। एक समय अगस्त मुनि को भगवान शिव एवं देवी उमा ने शिवगिरि एवं शक्तिगिरि पर्वत पर बैठे हुए रूप में दर्शन दिया था। बाद में, अगस्त मुनि ने भगवान शिव से इन पहाडियों को दक्षिण में अपने निवास तक ले जाने की आज्ञा मांगी। आज्ञा मिल जाने पर अगस्त मुनि ने अपने शिष्य असुर इंदुम्बन को उन पहाडियों को दक्षिण में लाने की आज्ञा दी। इंदुम्बन अपने गुरू की आज्ञा मानकर शहतीर में सर्प की मदद से कांवर का रूप देकर उन पहाडों को लेकर चल दिया। भगवान के आशीर्वाद से जब वह कांवर को उठाता तो पहाडियों का वजन काफी हल्का हो जाता और वह बडे आराम से चलता। रास्ते में इंदुम्बन कई स्थानों पर रुककर विश्राम करता हुआ, आगे की ओर बढता जा रहा था। इसी क्रम में एक दिन जब इंदुम्बन अपनी दिनभर की यात्रा के बाद रात्रि में विश्राम कर रहा था तभी आकाश में विचर रहे कार्तिकेय जी का ध्यान इन दोनों सुन्दर पहाडियों पर गया। कार्तिकेय इस पर इतना मोहित हो गये कि इसे अपना निवास स्थान बना लिया। उधर, जब इंदुम्बन विश्राम कर आगे की यात्रा के लिये कांवर उठाने लगा, तो कांवर काफी भारी हो गया और उससे हिला भी नहीं। वह परेशान हो इधर-उधर ऊपर नीचे देखने लगा। तभी बैठे कार्तिकेय पर उसकी नजर पडी। उस वक्त कार्तिकेय जी ने युवा सन्यासी का रूप धारण कर लिया था। जब इंदुम्बन ने अपनी यात्रा का प्रयोजन बताते हुए, उन्हें पहाडी के ऊपर से हटने को कहा, तब उन्होंने कहा, अब यह हमारा निवास स्थल बन गया है। इस पर इंदुम्बन क्रोधित होकर उन्हें युद्ध के लिये ललकारने लगा। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। इंदुम्बन हार गया। बाद में अगस्त मुनि वहां पहुंचकर इंदुम्बन से बोले कि यह कोई और नहीं, शिवजी के दूसरे पुत्र कार्तिकेय हैं। इंदुम्बन ने इतना सुनते ही उन्हें दण्डवत प्रणाम किया। उन्होंने इंदुम्बन को आशीर्वाद दिया और कहा कि जो भी व्यक्ति इस स्थान पर कांवर लेकर आयेगा, उसे सभी मनोकामनाओं की प्राप्ति होगी। 

वर्तमान में, पलनी दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य तमिलनाडु का पवित्र धार्मिक शहर है। यहां सुब्रमण्यम स्वामी अर्थात कार्तिकेय जी का भव्य और बहुत ही खूबसूरत मन्दिर है। यह समुद्र तल से डेढ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मन्दिर का स्थापत्य पांड्य शैली का है। इसका निर्माण 11वीं शताब्दी में शिवभक्त चेरमल पेरुमल ने करवाया था। मन्दिर की चारों दिशाओं में एक-एक द्वार हैं। इन द्वारों पर छोटे-छोटे गोपुरम बने हुए हैं। मन्दिर के मुख्य द्वार का नाम राजा गोपुरम है। मन्दिर का सुन्दर विमान सोने से मढा हुआ है। गर्भगृह में भगवान स्कंद अर्थात कार्तिकेय की अत्यन्त सौम्य प्रतिमा विराजमान है। यहां कार्तिकेय सन्यासी रूप में हैं। इनके हाथ में दंड है। मान्यता है कि स्कंद पुराण में इन्होंने अत्याचारी सूरपदम का अंत किया था। दण्ड धारण करने के कारण इन्हें ‘दण्डायुधपाणि’ भी कहते हैं। भगवान कार्तिकेय का नाम मुरुगन भी है। इसका तात्पर्य सुन्दरता, सौम्यता, मधुरता, सुगंध एवं यौवन से भी है। यहां विराजमान विग्रह में ये सभी गुण दिखलाये गये हैं। दिव्य ज्ञान के रूप में पूजनीय भगवान कार्तिकेय के दर्शनार्थी यहां सालभर पधारते रहते हैं। यहां स्थापित मूल प्रतिमा नौ धातुओं के मिश्रण से बनी हुई है। इसकी अदभुत विशेषता है। इसका अभिषेक दुग्ध एवं पंचामृत से किया जाता है। मान्यता है कि जिस दुग्ध एवं पंचामृत से इनका अभिषेक किया जाता है, उसमें औषधीय गुण आ जाता है। यहीं पंचामृत आने वाले भक्तों को प्रसाद रूप में प्रदान किया जाता है। प्रतिमा के श्रंगार से पूर्व बारह बार अभिषेक किया जाता है। विभिन्न अलंकरणों से सुशोभित यह पावन प्रतिमा अत्यंत मनमोहक है। यहां दिनभर में छह बार भगवान का अभिषेक किया जाता है। छह दैवीय गुणों की स्तुति का यह प्रतीक है। 

यहां फाल्गुनी उथिरम अग्नि नक्षत्रम, कण्डाषष्ठि, और थाइपूसम प्रमुखता के साथ मनाया जाने वाला पर्व है। थाइपूसम पर्व को लेकर मान्यता है कि इस दिन माता पार्वती ने कार्तिकेय जी को सूरपदम जैसी आसुरी ताकतों से लडने की शक्ति प्रदान की थी। यह उत्सव दस दिनों तक चलता है। इस दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड उमडती है। इस अवसर पर भक्तों द्वारा कांवर लाने की परम्परा है। पीत वस्त्र धारण कर कंधे पर कांवर रखकर लम्बी पदयात्रा कर लोग यहां पहुंचते हैं। भक्तजन जो सामग्री भगवान को अर्पित करना चाहते हैं, उसे कांवर में रखकर लाते हैं। मन्नत पूरी होने पर यहां केश अर्पण अर्थात सिर मुडाने एवं कर्ण (कान) छेदन कराने की भी परम्परा है। पलनी मन्दिर में दर्शन से पूर्व तीर्थयात्री माता पार्वती को समर्पित मन्दिर पेरियानाथकी अम्मन मन्दिर के दर्शन और विनायक जी मन्दिर में नारियल चढाते हैं। पहाडी पर पहुंचने के लिये 697 सीढियां चढनी पडती हैं। यहां रज्जु मार्ग (रोप व ट्रॉली) की भी व्यवस्था है। मन्दिर से पलनी शहर का विहंगम दृश्य दिखलाई पडता है। यहीं से शक्तिगिरि पहाडी भी दिखाई पडती है। यहां इंदुम्बन का भी मन्दिर बना हुआ है। सुब्रमण्यम स्वामी के द्वारपालक के रूप में इंदुम्बन की पूजा अर्चना की जाती है। 

मदुरै से पलनी की दूरी 115 किलोमीटर है। पर्यटन स्थल कोडैकनाल से यहां की दूरी 64 किलोमीटर है। यहां पलनी देवस्थानम बोर्ड द्वारा भक्तों को ठहराने की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। बोर्ड द्वारा प्रसाद के रूप में पंचामृत तथा विभूति की बिक्री की जाती है, जिसे अपने परिजनों एवं बंधु-बांधवों के लिये लोग श्रद्धा स्वरूप ले जाते हैं। 

लेख: दीपक कुमार सिन्हा (राष्ट्रीय सहारा में 29 मई 2011 को प्रकाशित)

मंगलवार, जनवरी 24, 2012

कामाख्या मन्दिर में ‘अंबुबाची’ मेला

तंत्र- मंत्र साधना के लिये चर्चित कामरूप कामाख्या में शक्ति की देवी कामाख्या का मन्दिर है, जहां हर साल आषाढ महीने में होने वाले ‘अंबुबाची’ मेले को कामरूप का कुम्भ माना जाता है। देश भर के तमाम साधु और तांत्रिक इस समय यहां पहुंचते हैं। ये साधक नीलांचल पर्वत की विभिन्न गुफाओं में बैठकर साधना करते हैं। ‘अंबुबाची’ मेले के दौरान यहां तरह तरह के हठयोगी पहुंचते हैं। कोई अपनी दस-बारह फीट लम्बी जटाओं के कारण देखने लायक होता है, कोई पानी में बैठकर साधना करता है तो कोई एक पैर पर खडे होकर। चार दिनों तक चलने वाले अंबुबाची मेले में करीब चार-पांच लाख श्रद्धालु जुटते हैं। 

धार्मिक मान्यता 

पूरी धार्मिक श्रद्धा के साथ लोग यहां जुटते हैं। जून-जुलाई (आषाढ) माह के अंत में पृथ्वी के मासिक चक्र की समाप्ति पर अंबुबाची मेला आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर मन्दिर चार दिन के लिये बंद कर दिया जाता है। कहते हैं, इस समय माता रजस्वला रहती हैं। हिन्दू समाज में रजोवृत्ति के दौरान शुभ कार्य नहीं होते, इसलिये इन दिनों असम में कोई शुभ कार्य नहीं होता। विधवाएं, साधु-संत आदि अग्नि को नहीं छूते और आग में पका भोजन नहीं करते। साधु और तांत्रिक मन्दिर के आस पास वीरान जगहों और कंदराओं में तप में लीन हो जाते हैं। चार दिन बाद मन्दिर के कपाट खुलने पर पूजा-अर्चना के बाद ही लौटते हैं। इस पर्व में देवी माता के रजस्वला होने से पूर्व गर्भ-गृह में स्थित महामुद्रा पर सफेद वस्त्र चढाये जाते हैं। कहते हैं कि बाद में ये लाल रंग के हो जाते हैं। बाद में मन्दिर के कपाट खुलने पर पुजारियों द्वारा प्रसाद स्वरूप दिये गये लाल वस्त्र के टुकडे पाकर श्रद्धालु धन्य हो जाते हैं। मान्यता है, इस वस्त्र का अंशमात्र मिल जाने पर भी सारे विघ्न दूर हो जाते हैं। कामाख्या मन्दिर में लोग लाल चुनरी और दूसरे वस्त्र चढाते हैं। यहां कन्या पूजन की भी परम्परा है। 

इस मन्दिर को कामनाओं की पूर्ति वाला मन्दिर भी कहते हैं। कहते हैं, माता के दरबार से कोई निराश नहीं लौटता। यहां पर माता की महिमा ही ऐसी है कि जो भक्त मां का द्वार खटखटाता है, मां उसे खाली हाथ नहीं लौटातीं। हिन्दू धर्म में 51 शक्तिपीठों में कामाख्या या कामाक्षा कामरूप शक्तिपीठ का काफी महत्व है। मन्दिर भारत के असम राज्य में गुवाहाटी से दो मील दूर पश्चिम में नीलगिरि पर्वत पर स्थित है। इस स्थल को ‘कामरूप’ इसलिये कहते हैं क्योंकि माना जाता है कि यहां देवी की कृपा से कामदेव को अपना मूल रूप प्राप्त हुआ था। अपने देश में जितने भी पीठ हैं, उनमें से कामाख्या पीठ महापीठ कहलाती है। मन्दिर में 12 स्तम्भों के बीच देवी मां की विशाल मूर्ति है। मन्दिर गुफा में स्थित है। यहां आने का रास्ता बहुत पथरीला है, जिसे ‘नरकासुर पथ’ कहते हैं। मन्दिर के पास ही कुण्ड है, जिसे ‘सौभाग्य कुण्ड’ कहते हैं। इस स्थल को ‘योनि पीठ’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि सती की योनि यहीं गिरी थी। इसलिये मन्दिर में मां की योनि की पूजा होती है। यहां देवी का रूप शक्ति स्वरूप है और भैरव का रूप उमानाथ या उमानंद। उमानंद को भक्त का रक्षक माना जाता है। माना जाता है कि उमानाथ मन्दिर में विराजमान शिव ही कामाख्या माता के भैरव हैं, इसलिये जो देवी मन्दिर में आता है उसे उमानाथ के भी दर्शन करने होते हैं। 

पर्वत पर स्थित मन्दिर के सामने ही तालाब है। वैसे पूरे पर्वत पर मन्दिर ही मन्दिर दिखते हैं। नीलांचल की चोटी पर भुवनेश्वर देवी का मन्दिर है, जहां से पूरे गुवाहाटी शहर को देखा जा सकता है। मन्दिर परिसर तक बस सेवा मिलती है। अलग से पैदल मार्ग भी बना है। अन्य कई तीर्थस्थलों की तुलना में यहां के पंडित या पंडे बहुत सरल और सीधे हैं। ये लोग दान-दक्षिणा के लिये किसी पर दबाव नहीं डालते। 

लेख: अनिता घोष (राष्ट्रीय सहारा में 19 जून 2011 को प्रकाशित)

शुक्रवार, जनवरी 20, 2012

डल लेक इन नड्डी

हिमाचल प्रदेश के मशहूर पर्यटन स्थल मैक्लोडगंज से लगभग तीन किलोमीटर दूरी पर स्थित है- नड्डी गांव। अगर किसी ने डल झील न देखी हो तो नड्डी गांव आकर इस झील का लुत्फ उठा सकता है। यह जगह कश्मीर नहीं, पर इस गांव में डल झील जरूर है। नड्डी गांव समुद्र तल से 1830 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर है। इसी वजह से यहां ज्यादातर कोहरा और बरसात जैसा मौसम बना रहता है। गर्मियों में यहां दूर-दूर से पर्यटक आते हैं। यह जगह शहरों की उमस, शोरगुल और दमघोंटू माहौल से दूर मंद मंद ठण्डी हवा के झोंको वाली है जो पर्यटकों के दिलोदिमाग को सुकून देती है। यहां की सुरमई शाम और चिडियों की चहचहाहट सुबह आने वाले पर्यटकों को लुभाती है। नड्डी गांव आने के लिये मार्च से जुलाई तक का समय ज्यादा अच्छा माना जाता है। 

गर्मी के मौसम में भी ये पहाडियां सफेद नजर आती हैं। गर्मी की छुट्टियों में लोग यहां आना इसलिये पसन्द करते हैं क्योंकि यहां गर्मी में सर्दी का एहसास होता है। सफेद पर्वतों से घिरा यह गांव ऐसा लगता है मानों प्रकृति ने इसे अपनी गोद में बिठा रखा हो। दिसम्बर-जनवरी के महीने से ही यहां का मौसम सुहाना होने लगता है। ऐसा लगता है कि हिमालय की चोटियों पर प्रकृति ने बर्फ की सफेद चादर बिछा दी हो। चारों तरफ बर्फ ही बर्फ नजर आती है। यह गांव इस ओर का सबसे ऊंचा और अंतिम पडाव भी है। 

क्या देखें 

यहां बडी लाइब्रेरी है, जिसमें तिब्बती सभ्यता के बारे में जानने को बहुत कुछ मिलेगा। करीब 10-12 किलोमीटर दूर प्रसिद्ध भागसूनाग मन्दिर है। मन्दिर के पास का झरना पर्यटकों को लुभाता है। यहां आने के लिये तीन-चार दिन की छुट्टी चाहिये तभी हरी-भरी वादियों का पूरा मजा ले पायेंगे। 

नड्डी गांव: हरे-भरे खेतों, छोटे बडे देवदार के पेडों के बीच ऊंची-नीची मिट्टी पर उगी हरी घास, पतले और घुमावदार रास्ते और जहां तक नजर जाये, वहां तक बस पहाड ही दिखता है। इसके अलावा दर्शनीय हैं- मैक्लोडगंज, सेंट जोसेफ चर्च, धर्मकोट, त्रिउंड, वार मेमोरियल, कुनाल पथरी और करेरी। 

कैसे जायें 

बस से: दिल्ली से 12-14 घण्टे, चण्डीगढ से 8-9 घण्टे, पठानकोट से 4-5 घण्टे। 
सडक मार्ग: चण्डीगढ से 239 किलोमीटर, दिल्ली से 514 किलोमीटर, नांगल से 145 किलोमीटर, जालंधर से 166 किलोमीटर, होशियारपुर से 128 किलोमीटर, मण्डी से 147 किलोमीटर, ज्वालामुखी से 55 किलोमीटर, कुल्लू से 214 किलोमीटर, मनाली से 252 किलोमीटर, चम्बा से 192 किलोमीटर और शिमला से 322 किलोमीटर। 
रेल मार्ग: रेलमार्ग से जाना चाहते हैं तो पठानकोट उतरना होगा। वहां से बस या टैक्सी द्वारा धर्मशाला या सीधे नड्डी गांव तक पहुंचा जा सकता है। 
हवाई मार्ग: गग्गल एयरपोर्ट 15 किलोमीटर की दूरी पर है। यह कांगडा में पडता है। यहां ठहरने की भी कोई समस्या नहीं। हर किसी के बजट में होटल और गेस्ट हाउस मौजूद हैं। 

लेख: अनिता घोष (राष्ट्रीय सहारा में 15 मई 2011 को प्रकाशित)

गुरुवार, जनवरी 19, 2012

निर्वाण स्थली बोधगया

गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति जिस बोधि वृक्ष के नीचे हुई, वह जगह आज ‘बोध गया’ नाम से पहचानी जाती है। विश्व में बौद्ध गया को बौद्धों के महत्वपूर्ण धार्मिक और पवित्र स्थल के तौर पर जाना जाता है। 2002 में यूनेस्को द्वारा वर्ल्ड हेरीटेज घोषित की जा चुकी यह जगह बिहार की राजधानी पटना से करीब 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मौर्य सम्राट अशोक ने इस क्षेत्र को विकसित किया। यहां के बौद्धमठ को अशोक ने बौद्ध भिक्षुओं के लिये बनाया। यहां अशोक स्तंभ भी स्थित है। मुख्य आकर्षण महाबोधि मन्दिर और बोधि वृक्ष के अलावा यहां श्रीलंका, म्यांमार और चीन के भी मन्दिर हैं। इस जगह को मन्दिरों का शहर भी कहा जाता है। यहीं पर भारत की सबसे ऊंची बुद्ध मूर्ति भी है, जो छह फीट ऊंचे कमल के फूल पर प्रतिष्ठापित है। माना जाता है कि मुख्य मन्दिर में भगवान बुद्ध की जो मूर्ति है, उसे स्वयं उन्होंने ही बनाया है। 

महाबोधि मन्दिर 

यह मन्दिर बोधि वृक्ष के पूर्व में स्थित है। इसका आर्किटेक्चर गजब का भव्य है। इस मन्दिर की कुल ऊंचाई 170 फीट है और इसके भीतरी चबूतरे पर छत्र बने हुए हैं, जो धर्म की प्रधानता के प्रतीक हैं। इस मन्दिर की बनावट सम्राट अशोक द्वारा स्थापित स्तूप सदृश्य है। मन्दिर के मुख्य हिस्से में बुद्ध की बहुत बडी मूर्ति पदमासन अवस्था (बैठे हुए है, जो दाहिने हाथ से धरती को छू रहे हैं) में हैं। माना जाता है कि बुद्ध को इसी अवस्था में ज्ञान प्राप्त हुआ था। यह मूर्ति काले पत्थर की है। मन्दिर परिसर में स्तूप बने हुए हैं, जो हर आकार के हैं। माना जाता है कि ये 2500 साल पहले के अवशेष हैं। मन्दिर को घेरे हुए रेलिंग पत्थर की नक्काशीदार हैं, कहा जाता है कि ये ही बोधगया के सबसे पुराने अवशेष हैं। इस मन्दिर में सात स्थानों को चिह्नित किया गया है, जिनके बारे में माना जाता है कि बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद सात सप्ताह यहीं व्यतीत किये। मुख्य मन्दिर के पीछे बुद्ध की सात फीट ऊंची विराजमान मुद्रा में प्रतिमा है। यह प्रतिमा लाल बलुए पत्थर की है। माना जाता है कि सम्राट अशोक ने यहीं पर हीरे का राजसिंहासन लगवाया था और इसे धरती का नाभि-केंद्र कहा था। इस प्रतिमा के आगे बुद्ध के बडे बडे पदचिह्न भी बने हुए हैं। 

रत्नागढ 

मन्दिर के उत्तर पश्चिम भाग में छतविहीन भग्नावशेष हैं, जिसे रत्नागढ कहा जाता है। यहां बुद्ध ने चौथा सप्ताह व्यतीत किया था। मान्यता है कि जब बुद्ध ध्यान में मग्न थे तो उनके शरीर से पांच रंग की किरणें निकलीं। इन्हीं रंगों का प्रयोग विभिन्न देशों ने यहां लाई अपनी पताकाओं में किया है। बुद्ध ने मुख्य मन्दिर से थोडी दूर स्थित अजपाला-निग्रोधा पेड के नीचे पांचवां सप्ताह और छठा सप्ताह मूचालिंडा झील के पास बिताया था। इस झील के बीचोंबीच बुद्ध की मूर्ति है, जिसमें एक सांप उनकी रक्षा कर रहा है। इसके बारे में कथा यह है कि बुद्ध तपस्या में इतने लीन थे कि वे बारिश में फंस से गये। तब सांपों के राजा मूचालिंडा ने उनकी रक्षा की। पास में राजयातना पेड के नीचे बुद्ध ने सातवां सप्ताह बिताया। यहां बर्मा के दो निवासियों ने बुद्ध से आश्रय मांगा था। यहीं उन्होंने प्रार्थना के रूप में ‘बुद्धमं शरणं गच्छामि’ का जाप किया था। 

मठ 

तिब्बती मठ बोधगया का सबसे पुराना मठ है। बर्मी विहार में भगवान बुद्ध की विशाल प्रतिमा के अलावा दो प्रार्थना कक्ष भी हैं। यहां थाई मठ भी है, जिसकी स्थापना थाईलैण्ड के राजपरिवार ने की थी। इसे गोल्डन मठ भी कहा जाता है। दरअसल इसकी भीतरी छत को सोने के पानी से रंगा गया है। इंडोसन-निप्पन-जापानी मन्दिर को लकडी के प्राचीन जापानी मन्दिरों के आधार पर बनाया गया है। यहां बुद्ध के जीवन को तस्वीरों के माध्यम से दिखाया गया है। चीनी मन्दिर में बुद्ध की प्रतिमा सोने की है। भूटानी मठ की दीवारों पर नक्काशी का काम है। नवीनतम मन्दिर वियतनाम का है। यहां बुद्ध के अवतार अवलोकितेश्वर की मूर्ति स्थापित है। 

चंक्रमना 

मुख्य मन्दिर के उत्तरी भाग को चंक्रमना कहा जाता है। माना जाता है कि ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध ने तीसरा सप्ताह यहीं बिताया था। यह भी माना जाता है कि जहां जहां बुद्ध ने अपने पैर रखे, उस जगह पर कमल के फूल खुद ही खिल गये। यहां काले पत्थर का कमल का फूल भी है। 

महाबोधि वृक्ष 

माना जाता है कि वर्तमान का बोधि वृक्ष असल में बोधि पेड की पांचवीं पीढी है, जिसके नीचे बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था। यहां वज्रासन भी है यानी स्थिरता की जगह। यह पत्थर का प्लेटफॉर्म है, जिसके बारे में मान्यता है कि बुद्ध बैठकर पूर्व की ओर देखते हुए ध्यान लगाते थे। 

लेख: स्पर्धा (राष्ट्रीय सहारा में 15 मई 2011 को प्रकाशित)

बुधवार, जनवरी 18, 2012

लद्दाख- खेल, पर्यटन और अपनेपन का पर्याय

प्रकृति की मनमोहक छटाओं से प्रेम करने वाले जितेन्द्र बाजवा की खेलों में गहरी दिलचस्पी है। उन्होंने वाटर स्पोर्ट्स, शूटिंग और मोटर स्पोर्ट्स में अपनी अलग पहचान बनाई है। तीन बार हिमालयन कार रैली ’रेड डी हिमालया’ के विजेता रहे बाजवा ने ’डेजर्ट स्टॉर्म’ में भी कई बार शिरकत की है। निशानेबाजी के शौक को अपनी बहुमुखी प्रतिभा के साथ जोडते हुए पाकिस्तान में आयोजित ’सैफ खेलों’ में शूटिंग स्पर्धा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। दुनिया के सबसे हसीन इलाके लद्दाख की खूबसूरती को बयां करता उनका यह आलेख... 

लद्दाख भारत के जम्मू कश्मीर प्रान्त का सबसे बडा पूर्ववर्ती जनपद है। समुद्र की सतह से 12000 फीट की गौरवमयी ऊंचाई लिये सिन्धु नदी की ऊपरी घाटी को चूमता यह क्षेत्र सच में भारत का ताज है। यह अपनी अलग ही सांस्कृतिक व भौगोलिक पहचान लिये हुए है। उन चकरा देने वाली ऊंचाईयों में अगर गगन चूमते पर्वत हैं, तो उसी ऊंचाई पर हजारों वर्ग मील में फैले हैं वहां के ठण्डे रेगिस्तान। यहां का रहन-सहन, वेश-भूषा, धार्मिक सोच तिब्बत से इतना मिलता है कि इसे ‘भारत का तिब्बत’ कहना गलत नहीं होगा। यहां के दसवीं शताब्दी के ‘आल्ची’ व ‘लामायुरू’ मठ पूरे विश्व से बौद्ध धर्मावलम्बियों को ही नहीं, बल्कि पर्यटकों को भी आकर्षित करते हैं। यहां प्रकृति ने अपने भण्डार खोल कर अपना सौन्दर्य दोनों हाथों से लुटाया है। इस क्षेत्र में बहने वाली नदियां सिन्धु जिसे यहां सेंग्गे खब्बाब भी कहते हैं और श्योक जिन घाटियों से बहती हैं, उनके पहरेदार हैं कराकोरम पर्वतमाला, लद्दाख पर्वतमाला और जांस्कार पर्वतमाला। इन पर्वतमालाओं के चरण पखारती इन नदियों के सौन्दर्य को प्रतिद्वंदिता देती हैं इस क्षेत्र की झीलें, जिन्हें ‘त्सो’ कहते हैं। पेंगोंग त्सो इस क्षेत्र की ही नहीं बल्कि एशिया की सबसे बडी झील है। मोरीरी त्सो भी एक निर्मल जल की अत्यन्त सुन्दर झील है। 

1995 में यहां ‘लद्दाख ऑटोनोमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल’ के सूत्रपात के बाद से जब उत्तरी भारत कडाके की सर्दी से ग्रस्त होता है और ठिठुरन हड्डियों को कंपाती है, तो ‘गुरगुर’ चाय का आनन्द उठाते हुए लद्दाखी जुट जाते हैं शीत खेलों के आयोजन की तैयारी में। कई सौ किलोमीटर में फैला लद्दाख का ‘ठण्डा मरुस्थल’ आयोजन स्थल होता है वहां के स्थानीय खेलों का। पोलो से मिलते जुलते एक खेल में प्रयोग होता है वहां के छोटे कद के जंगली घोडे ‘क्यांग’ का। उस क्षेत्र के लिये अति उपयुक्त ये तंदुरुस्त घोडे इस खेल की स्पर्धा को और भी रोचक बना देते हैं। लद्दाख में ‘लद्दाख शीत खेल क्लब’ के गठन के बाद से वहां शीतकालीन खेलों का नियमित रूप से वार्षिक आयोजन होने लगा है। इस क्लब के अथक प्रयासों ने लद्दाख को अब भारत के शीतकालीन खेलों के मानचित्र पर एक अलग ही स्थान प्रदान किया है। लद्दाख, जो किसी समय तक केवल अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ साथ आत्मिक व धार्मिक वातावरण के लिये जाना जाता था, अब केवल पर्वत व मठों का प्रदेश न होकर अपने शीतकालीन खेलों से भी पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है। 

वहां के स्थानीय खेलों के अलावा अब आइस हॉकी और आइस स्केटिंग सरीखे खेल भी नियमित रूप से आयोजित किये जाते हैं, जो कि भारत के ही नहीं, बल्कि विश्व भर से पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। आइस हॉकी की लद्दाख में बढती लोकप्रियता इस खेल ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण लद्दाख क्षेत्र के लिये ही एक वरदान प्रतीत हो रही है। कनाडा के इस राष्ट्रीय खेल को लोकप्रिय करने में लद्दाख शीत खेल क्लब को सहयोग मिल रहा है कनाडा के भारत स्थित उच्चायुक्त निकेल से। निकेल का कहना है कि अब इस खेल के प्रति रुचि केवल संगठनीय टीमों में ही नहीं, यहां के स्थानीय निवासियों में भी बढती जा रही है। उनकी अपनी टीम ‘न्यू देलही सेक्रेड बुल्स’, जो अब तक की सबसे लोकप्रिय टीम रही है और हर वर्ष लद्दाख शीतकालीन खेलों में आइस हॉकी टूर्नामेंट जीतती आ रही है, अब वहां की स्थानीय टीम से कडा मुकाबला पाती है। 

12000 फीट की ऊंचाई पर ठोस बर्फ में बदल जाती झीलें इन खेलों का आयोजन स्थल रहती हैं। ग्रीष्म ऋतु में जब लद्दाख की नदियां अपने हिम आवरण से बाहर निकलकर निर्मल जल की अविरल धाराएं बन जाती हैं, तब यहां व्हाइट वाटर राफ्टिंग में रुचि रखने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों का जमावडा देखते ही बनता है। यही वह समय भी होता है, जब लद्दाख का वातावरण बहुत लुभावना हो जाता है और ट्रेकिंग के शौकीनों को चुनौतियां स्वीकार करने का आमंत्रण देता है। यहां के दुर्गमताओं से परिपूर्ण ट्रेकिंग के रास्ते, अनछुई ऊंची पर्वत चोटियां उत्साहित करती हैं मनुष्य को अदम्य साहस का परिचय देने के लिये। 

आज कोई तो लद्दाख जाता है इन चुनौतियों का सामना करने, कोई आकर्षित होता है वहां की अद्वितीय मनोरम दृश्यावलियों से, तो कोई देखना चाहता है विश्व के इस ऊंचे अनूठे आश्चर्य को। कोई बौद्ध कलाकृतियों से आकर्षित है, तो कोई वहां की हिम-आच्छादित पर्वत चोटियों से, जहां से गुजरते हैं विश्व के कुछ अत्यंत जटिल, ऊंचे, जोखिम भरे रास्ते, जिनमें अब हिमालयन कार रैलियां (रेड डी हिमालया) अपना रास्ता चुनती हैं। बहरहाल, आज लद्दाख प्रगति के पथ पर अग्रसर होते हुए अपने स्वर्णिम भविष्य की ओर चल पडा है और वहां के लोग अपना आतिथ्य लिये, बाहें फैलाये हमेशा तैयार हैं सभी को अपना बनाने के आत्मीय जज्बे के साथ। 

बने हैं अटूट रिश्ते 

इन खेलों ने लद्दाख को नया आकर्षण दिया है तो पर्यटन भी बढाया, स्थानीय निवासियों को आजीविका दी, साथ ही कनाडा और भारत के रिश्तों को नया आयाम दिया। इन खेलों ने लद्दाख और कनाडा के लोगों के अटूट रिश्तों को जन्म दिया है। 2011 में लद्दाख शीत खेल क्लब ने विंटर टूरिज्म प्रमोशन कप का आयोजन किया, जिसमें लगभग 70 कनेडियाई खिलाडियों ने शिरकत की। इस क्लब द्वारा कई स्थानीय खिलाडियों को संरक्षण मिला और उन्हें फिनलैंड, चीन, अमेरिका व पोलैंड आइस हॉकी और आइस स्केटिंग प्रतिस्पर्धाओं में भेजा गया। 

टूटकर भी नहीं बिखरा 

भारत के बंटवारे के बाद पाकिस्तान व चीन ने वृहद लद्दाख का क्रमशः 78114 वर्ग किमी और 37555 वर्ग किमी क्षेत्र गैर-कानूनी तरीके से कब्जा लिया। बाकी करीब 45110 वर्ग किमी क्षेत्र भारत से जुडा रहा। जो आज अपनी अनुपन छटा के लिये पूरी दुनिया में जाना जाता है। यह दुर्गम व दूरस्थ क्षेत्र भी भारत की अनोखी पहचान ‘अनेकता में एकता’ दर्शाने में पीछे नहीं है। यहां तिब्बती भाषा बोलने वाले बहुसंख्यक लद्दाखी हैं, लेकिन यहां पर मुस्लिम और ईसाई भी बसते हैं। 

दैनिक जनवाणी में 3 अप्रैल 2011 को प्रकाशित

मंगलवार, जनवरी 17, 2012

अप्रतिम येलागिरी

यदि भागदौड भरी जिन्दगी से इतर अपनी लाइफ में ठहराव, सुकून व शान्ति भरा पल बिताना चाहते हैं, तो येलागिरि की सैर कर आइये। येलागिरि तमिलनाडु के मशहूर हिल स्टेशनों में से एक है, जो चार पर्वत श्रंखलाओं के बीच बसा है। इसकी ऊंचाई समुद्र तल से 920 मीटर है। यहां का स्वास्थ्यवर्द्धक मौसम एवं वातावरण वर्षभर सुहाना बना रहता है। इसलिये जब भी तमिलनाडु का ट्रिप प्लान करें, यहां जरूर जायें। हालांकि यह छोटा हिल स्टेशन है, पर वीकएण्ड मनाने के लिये बेहतर हिल स्टेशनों में से एक माना गया है। येलागिरि में 14 छोटे गांव हैं, जहां आदिवासी रहते हैं। यहां की शान्त व रिलैक्स्ड जीवन-शैली इसे पर्यटकों के बीच और भी खास बनाती है। व्यापक-अदभुत नजारा, ऊंची ऊंची ढलाननुमा पर्वत श्रंखलाएं, हरी-भरी वादियां इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती हैं। यहां के स्थानीय आदिवासी खेती (एग्रीकल्चर), बागवानी (हॉर्टिकल्चर) और वानिकी (फॉरेस्ट्री) पर ही निर्भर हैं। इनके रीति-रिवाज, घर की बनावट इतनी यूनीक है कि पर्यटक इसे देखने के लिये खिंचे चले आते हैं। 

दर्शनीय स्थल 

पुंगनूर लेक: यह आर्टीफिशियल लेक है, जो येलागिरि पहाडियों के मध्य करीब 570 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। इस लेक में बोटिंग का भी मजा ले सकते हैं। साथ ही, यहां खूबसूरत पार्क भी है, जिसकी देखभाल येलागिरि हिल डेवलपमेंट एंड टूरिज्म प्रमोशन सोसाइटी करता है। लेक के बीचोंबीच बना फव्वारा (फाउंटेन) झील की खूबसूरती को बढाता है। पार्क में बच्चों के खेलने के लिये कई चीजें भी लगाई गई हैं। 

हर्बल फार्म: झील के नजदीक ही हर्बल फार्म है, जिसकी देखभाल वन विभाग करता है। यहां कुछ ऐसे दुर्लभ व असाधारण हर्बल मिल जायेंगे, जिनका इस्तेमाल आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट में किया जाता है। 

परन टेलीस्कोप: घाट रोड में प्रवेश करते ही टेलीस्कोप लगा दिख जायेगा, जिससे आप डीप स्लोप, ग्रीन वैली आदि का नजारा देख सकते हैं। 

वेलावन टेम्पल: इस मन्दिर में देव मुरुगन की मूर्ति है, जो येलागिरि के सबसे ऊंचे पहाड की चोटी पर स्थित है। यहां से पूरे येलागिरि का विहंगम नजारा देखने को मिलता है। मन्दिर के सामने ही कडोथकजन की खडी आकृति भी पर्यटकों को आकर्षित करती है। जुलाई महीने में यहां हर साल धूमधाम व भव्य तरीके से त्यौहार आयोजित किये जाते हैं, जिनमें स्थानीय निवासी व श्रद्धालु भी जुटते हैं। 

जलगमपरई वाटर फॉल: अट्टारु नदी येलागिरि पहाडियों से गुजरकर जदयानुर में 30 मीटर की ऊंचाई से नीचे गिरती है, जिसे नाम दिया गया है जलगमपरई वाटर फॉल। कहा जाता है कि इस वाटर फॉल में स्नान करने से कई बीमारियां ठीक हो जाती हैं, क्योंकि यह पहाडियों में उगे तरह-तरह के हर्बल प्लांट्स से होकर गुजरती है। आप निलवर से इस वाटर फॉल तक ट्रेकिंग के जरिये भी पहुंच सकते हैं। 

समर फेस्टिवल: मई से जून में यहां प्रत्येक वर्ष समर फेस्टिवल सेलिब्रेट किया जाता है, जिसका मुख्य आकर्षण ट्राइबल फोक डांस, म्यूजिक, रीति-रिवाज, सांस्कृतिक और परम्परागत कार्यक्रमों का आयोजन होता है। 

ट्रेकिंग: हालांकि यह हिल स्टेशन छोटा है, पर कहते हैं न, छोटा पैकेज-बडा धमाल। ठीक उसी तरह येलागिरि में आकर्षक स्थलों को देखने के अलावा यहां की पहाडियों में ट्रेकिंग और माउंटेनियरिंग का भी मजा ले सकते हैं। ट्रेकिंग के जरिये घने जंगलों, वाटरफॉल्स, पीक प्वाइंट्स और वैली व्यू प्वाइंट्स को भी देख सकते हैं। 

ध्यान रखने योग्य बातें: येलागिरि में न तो कोई पेट्रोल पम्प है और न ही रिपेयरिंग की दुकान। इसलिये पहले से ही रिपेयर कराने के साथ उसमें पेट्रोल भी भरा लेना सही होगा। इसके अलावा, फर्स्ट-एड किट और रेग्यूलर इस्तेमाल में आने वाली दवाइयां भी रखें क्योंकि यहां आपको एक भी हेल्थ सेंटर नहीं मिलेगा। 

ट्रेकिंग के रूट्स: पुंगनूर से निलवर जलगमपराई (14 किलोमीटर), पुंगनूर- स्वामीमलाई हिल (6 किलोमीटर), मंगलम से स्वामीमलाई (2 किलोमीटर), इंफॉर्मेशन सेंटर से कूसी कुट्टई (1.5 किलोमीटर), पुथुर से पेरुमडु वाटरफॉल (3 किलोमीटर), बोट हाउस से पुलिचा कुट्टई (3 किलोमीटर)। 

कैसे पहुंचें 

पोन्नेरी से येलागिरि 14 किलोमीटर दूर है और तिरुओथर से इसकी दूरी 27 किलोमीटर है, जहां आप बस व टैक्सी से जा सकते हैं। 
रेल मार्ग: येलागिरि का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन जोलरपेट्टाई है, जो 21 किलोमीटर दूर है। 
हवाई मार्ग: नजदीकी हवाई अड्डा चेन्नई (233 किलोमीटर) व बेंगलूरू (145 किलोमीटर) है। 

राष्ट्रीय सहारा में 6 फरवरी 2011 को प्रकाशित

सोमवार, जनवरी 16, 2012

श्रद्धा का केन्द्र- राजगीर

बिहार में नालन्दा से 13 किलोमीटर की दूरी पर बौद्धों की श्रद्धा का केन्द्र राजगीर नामक स्थान है। राजगीर को प्राचीन काल में राजगृह के नाम से जाना जाता था। राजगीर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व बहुत अहम है। यह कभी मगध साम्राज्य की राजधानी थी। इसी जगह से महान मौर्य साम्राज्य का उदय हुआ था। कहते हैं कि राजगीर भगवान ब्रह्मा की पवित्र यज्ञ भूमि, भगवान बुद्ध और जैन तीर्थंकर भगवान महावीर की साधना भूमि रहा है। जरासंध ने यहीं भगवान श्रीकृष्ण को हराकर उन्हें मथुरा से द्वारका जाने को मजबूर किया था। 

मकर और मलमास का मेला 

राजगीर का मकर और मलमास का मेला बहुत प्रसिद्ध है। शास्त्रों के अनुसार मलमास को 13वें महीने के रूप में बताया गया है, इसलिये इसे अपवित्र महीना माना गया है। इस महीने में कोई धार्मिक कार्य भी नहीं किया जाता। कहते हैं कि इस समय सभी देवी-देवता राजगीर में निवास करते हैं तथा यहां भगवान ब्रह्मा द्वारा प्रकट किये गये ब्रह्म कुण्ड में स्नान करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। 

राजगीर से बौद्ध धर्म का बहुत नजदीकी सम्बन्ध रहा है। भगवान बुद्ध ने यहां कई वर्षों तक निवास किया था तथा यहां कई बार उपदेश भी दिये थे। भगवान बुद्ध के निर्वाण के बाद यहीं प्रसिद्ध ’ह्यसप्तपर्णी गुफा’ में पहला बौद्ध सम्मेलन आयोजित किया गया था। यहीं पर भगवान बुद्ध के उपदेशों को लिपिबद्ध भी किया गया था। यहां जापान के बौद्ध संघ द्वारा निर्मित ’ह्यविश्व शान्ति स्तूप’ बहुत सुन्दर है। यह स्तूप गिरिधरकूट पहाडी पर बना है। बताया जाता है कि इस पर्वत पर भगवान बुद्ध ने कई उपदेश दिये थे। इस स्तूप के चारों कोनों पर भगवान बुद्ध की चार दिव्य प्रतिमाएं स्थापित हैं। यहां से कुछ दूरी पर प्रसिद्ध जैन तीर्थ स्थल ’पावापुरी’ स्थित है। यहां पर भगवान महावीर का एक भव्य मन्दिर भी है। यहां पर जरासंध का अखाडा, लक्ष्मीनारायण मन्दिर, सप्तपर्णी गुफा, पिपली गुफा, स्वर्ण भण्डार आदि प्रमुख दर्शनीय स्थल भी देखने योग्य हैं। 

कैसे पहुंचे राजगीर 

गया से सीधे जुडे हुए राजगीर के रेलवे स्टेशन पर देश के लगभग हर कोने से ट्रेनें आती हैं। सडक मार्ग द्वारा जाना हो तो पटना से राजगीर की दूरी 103 किलोमीटर है। राजगीर नालन्दा से 12 और गया से 34 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हवाई मार्ग से आने के लिये आपको गया या पटना तक आना पडेगा। इसके बाद सडक या रेल मार्ग दोनों से राजगीर पहुंचा जा सकता है। 

दैनिक जनवाणी में 6 मार्च 2011 को प्रकाशित

रविवार, जनवरी 15, 2012

पचमढी- सतपुडा की रानी

गर्मी ने अपनी दस्तक दे दी है, तो जाहिर है कि पेड की छांव, नदी या झरनों की लहरों की कलकल, शीतल मंद समीर यानी पुरसुकून फिजा की याद बरबस ही आ जाती होगी। मन करता होगा कि ऐसी कोई जगह हो जहां बन्द कमरों से निकलकर कुछ पल के लिये कुदरती शीतलता का एहसास कर सकें। तो आइये, ले चलते हैं इस बार आपको ऐसी ही जगह जहां देता है हर मौसम आपको आमंत्रण...

सतपुडा के घने जंगल, नींद में डूबे हुए से ऊंघते अनमने जंगल।’ भवानी प्रसाद मिश्र की यह कविता तो आपने सुनी ही होगी। पर यकीन मानिये ये जंगल बिल्कुल भी ऊंघते हुए या अनमने नहीं हैं। यहां है कुदरत की वह जीवंतता, जो हर मौसम के साथ इठलाती है, उल्लास भरी अंगडाईयां लेती है और आमंत्रण देती है आपको अपनी मनोरम दृश्यावली से सजी हुई गलियों में विचरने का। जीवंतता से भरे हुए इन विशाल जंगलों के बीच ही है सतपुडा की रानी यानी पचमढी। 1857 में एक ब्रिटिश आर्मी कप्तान द्वारा जंगलों के बीच खोजी गई पचमढी को प्राकृतिक सुन्दरता और झरनों के उन्मुक्त प्रवाह के कारण नाम दिया गया प्रकृति की अल्हड संतान का। कहते हैं कि सतपुडा के जंगल और पहाडी वादियां हिमालयी क्षेत्रों से भी 15 करोड साल पुरानी हैं और उसकी लाक्षणिकता से बिल्कुल अलग भी। 

डर नहीं पैदा करते ये जंगल 

सतपुडा के जंगल पूरी दुनिया में बाघों का सबसे बडा घर भी है और पचमढी वह जगह है जहां से आप सतपुडा नेशनल पार्क और बोरी सेंचुरी जैसे इन घरों तक आसानी से पहुंच सकते हैं। कान्हा और पेंच जैसे राष्ट्रीय उद्यान भी यहां से ज्यादा दूर नहीं हैं। पचमढी पूरी तरह से जंगल की आभा से घिरी हुई जगह है, लेकिन ये जंगल किसी भी तरह का डर पैदा नहीं करते, बल्कि कई तरह के फूल-पत्तों से सजी सुन्दरता से आपको सुकून ही पहुंचाते हैं। हर साल की गर्मियों में लाखों सैलानी मध्य प्रदेश के इस छोटे से लेकिन विलक्षण सुन्दरता से भरे पर्यटन केंद्र की ओर इसी सुन्दरता के कारण खिंचे चले आते हैं। 

अनूठी अल्हडता 

प्रकृति की इस अल्हड संतान की अपनी भी खासियतें हैं। महादेव गुफा इसके आकर्षण का बडा केंद्र है, जहां पत्थरों पर की गई अनूठी चित्रकारी बरबस ही आपका ध्यान आकर्षित करती है। कहते हैं कि यह चित्रकारी 5 से 8वीं शताब्दी के बीच की गई थी। कुछ चित्र तो इससे भी दस हजार साल पुराने बताये जाते हैं। जमुना प्रपात, रजत प्रपात और जलावतरण प्रपात तो जैसे पचमढी की अल्हडता के गीतों का सामुहिक गान हैं। जमुना प्रपात में जहां आप झरने के किनारे बैठने से लेकर नहाने तक का लुत्फ उठा सकते हैं, वहीं हांडी खोह के पेड-पौधे तो आपको किसी और ही दुनिया का आभास करायेंगे। भगवान शिव से जुडे हजारों साल पुराने मन्दिरों जटाशंकर गुफा, महादेव और छोटा महादेव मन्दिर की प्राकृतिक मनोहारी छटा जहां धार्मिक लोगों को आकर्षित करती है, वहीं प्रकृति प्रेमियों को भी। पुरातनकालीन पांडव गुफा भी आकर्षण का बडा केंद्र है। कहते हैं कि वनवास के दौरान पांडवों ने यहीं पर अपना अज्ञातवास बिताया था। इसके साथ ही धूपगढ की ऊंची पहाडी से सांझ के डूबते सूरज की लालिमा को निहारने का दृश्य शायद ही कभी भूल सकें आप। 

तो आओ 

चलें प्रकृति की इस मनोरम छटा तक पहुंचना भी मुश्किल नहीं है। सबसे नजदीकी एयरपोर्ट भोपाल है, जो कि 195 किलोमीटर की दूरी पर है, लेकिन यदि आप रेलमार्ग से पहुंचना चाहते हैं तो पहुंचिये पिपरिया, जिसकी पचमढी से दूरी महज 47 किलोमीटर है। पिपरिया के लिये भोपाल, जबलपुर, इटारसी, होशंगाबाद सबसे नजदीकी रेलवे जंक्शन हैं। इन्हीं जगहों से सीधे पचमढी के लिये बस सेवा भी है। पचमढी में ठहरने के लिये सरकारी अमलतास काम्पलेक्स और सतपुडा रिट्रीट, ग्लेन व्यू जैसे होटलों के अलावा कई और छोटे-मझोले होटल भी मौजूद हैं। 

दैनिक जनवाणी में 13 मार्च 2011 को प्रकाशित

शनिवार, जनवरी 14, 2012

कुमाराकोम- ईश्वर का देश

प्राकृतिक सौन्दर्य की बात हो और भारत के दक्षिणी अंचल की बात न हो, ये भला कैसे हो सकता है। भारत के दक्षिणी राज्यों में केरल की खूबसूरती सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। केरल के ही कोट्टायम शहर से मात्र 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है वह जगह, जिसके बारे में अपनी ही तरह के एकमात्र मशहूर गायक पॉल मैककार्टनी ने कहा था ’वाकई, यह ईश्वर का अपना घर है।’ यह जगह है कुमाराकोम। 

प्रकृति की दुर्लभ संतान 

केरल की सबसे लम्बी ताजे पानी की झील वेबनद पर बसे कुमाराकोम में दुनिया की सबसे दुर्लभ और खूबसूरत पेड-पौधों, फूलों और पक्षियों की प्रजातियां हैं। यही इसकी खास पहचान भी है। कुमाराकोम बर्ड सेंचुरी दुनिया की उन जगहों में से एक है, जहां 14 एकड के विशाल दायरे में प्रवासी पक्षियों की तमाम प्रजातियां एक साथ देखने का मौका मिलता है और वेबनद झील तो वैसे श्रिंप और प्रॉन मछलियों के लिये स्वर्ग ही है। दुनिया के तमाम हिस्सों से सैलानियों की भीड का खास केंद्र होती हैं ये दोनों ही जगहें। 

आत्मा का सुकून 

चारों ओर से हरियाली से आच्छादित इस साफ पानी की लम्बी झील में जब सैलानी नौकाओं में बैठकर प्रकृति का आनन्द उठाने निकलते हैं, तो दिल को बाग-बाग कर देने वाली मनोरम छटाओं के साथ-साथ पानी की कल-कल मन और आत्मा को वह सुकून देती है कि हर सैलानी मैककार्टनी का जुमला ही दोहराता है। भले ही शब्द अलग हों। वहीं फिशिंग के शौकीन भी इस झील में उतरते ही अपना शौक पूरा करने से नहीं चूकते। 

कुछ अलग है यह गांव 

वैसे शायद आपको पता न हो कि अरुंधती राय के उपन्यास ’द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ का गांव अयमानम भी यहीं है। यह कुमाराकोम से बिल्कुल सटा हुआ गांव है। और उपन्यास में जो ’हिस्ट्री हाउस’ है, वह है ताज गार्डन रिट्रीट होटल, जिसे ब्रिटिश पीरियड में अल्फ्रेड जॉर्ज बेकर ने बनवाया था। अपने स्थापत्य के लिये यह होटल भी यहां के दर्शनीय स्थलों में शुमार किया जाता है। 

सबसे दूर का आकर्षण 

केरल सरकार द्वारा विशिष्ट पर्यटन स्थल का दर्जा हासिल कर चुके कुमाराकोम को पर्यटन पत्रिका कोंदे नास्त ट्रेवलर ने दुनिया के सबसे दूरस्थ और आकर्षक स्थान के रूप में चिन्हित किया है। हालांकि यहां अब होटलों की भरमार है, लेकिन इसके प्राकृतिक सौन्दर्य में बनावटीपन अब तक शामिल नहीं हुआ है। पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इस जगह का उल्लेख करते हुए लिखा है कि यहां की खामोश प्राकृतिक सुन्दरता ध्यान और चिन्तन के लिये सर्वोत्तम माहौल प्रदान करती है। 

तो आओ चलें 

यदि आप इस खामोश प्राकृतिक सौन्दर्य की गोद में ईश्वर के देश का आनन्द उठाना चाहते हैं, तो पहुंच जायें कोच्चि, जो सिर्फ 85 किलोमीटर दूर है और कुमाराकोम का सबसे नजदीकी एयरपोर्ट है। रेलयात्रा करना चाहते हैं तो नजदीकी रेलवे स्टेशन है कोट्टायम। दोनों ही जगहों से आप सडक मार्ग से कुमाराकोम पहुंच सकते हैं। रहने के लिये ताज गार्डन कुछ लोगों को थोडा महंगा लग सकता है, लेकिन चिन्ता न करें, यहां आपको सस्ते और अच्छे टूरिस्ट रिजॉर्ट्स भी उपलब्ध होंगे। चाहें तो हाउसबोट में भी रह सकते हैं। 

दैनिक जनवाणी में 10 अप्रैल 2011 को प्रकाशित

शुक्रवार, जनवरी 13, 2012

कुम्भलगढ- इतिहास और प्रकृति का अनूठा संगम

यूं तो पूरे भारत में पर्यटन के लिहाज से कई स्थान हैं और सबकी अपनी ही अलग छटा है। लेकिन जिन्हें इतिहास, स्थापत्य और विरासत को जानने की ललक है उनके लिये पुराने रजवाडों, किलों और ऐतिहासिक धरोहरों की पर्याय बन चुकी जगहों में खास दिलचस्पी होती है। ऐसी ही जगहों में से एक है भारत का राज्य राजस्थान। अलग-सी सांस्कृतिक छटा लिये यह राज्य इतिहास से जुडी उन धरोहरों की पूरी की पूरी दास्तान अपने में समेटे हुए है। चाहे वह हल्दीघाटी के मैदान की गौरव गाथा हो या फिर ढोला-मारू की कोने-कोने में गाई जाने वाली अनूठी प्रेमकथा। राजस्थान के ऐसे ही स्थानों में से एक है कुम्भलगढ, जो सिर्फ महाराणा कुम्भा, महाराणा प्रताप की जन्मस्थली ही नहीं है, बल्कि इतिहास, प्रकृति, संस्कृति और रेगिस्तान के बीच जन्नत कहे जा सकने वाले सौन्दर्य की जीती-जागती मिसाल भी है। 

स्थापत्य 

कई सदियों पुराने इस किले में तरह-तरह की पुरातात्विक महत्व की चीजें भी हैं, जो महाराणा प्रताप के समय से सुने हुए कई किस्सों की याद को ताजा करती हैं। इस किले का स्थापत्य अदभुत की श्रेणी में ही रखा जा सकता है। इसमें कई दरवाजे हैं, जिसकी शुरूआत आरेठ पोल से होती है, उसके बाद हल्ला पोल, हनुमान पोल, विजय पोल, भैरव पोल, नीबू पोल, चैगान पोल, पागडा पोल, गणेश पोल और विजय पोल हैं। विजय पोल से प्रारम्भ होकर असीमित ऊंचाई तक फैली पहाडी की एक चोटी पर किले का सबसे ऊंचा भाग बना हुआ है, जिसे कहारगढ भी कहा जाता है। हिन्दू और जैन समुदाय के कई मन्दिर विजय पोल के पास की समतल भूमि पर बने हैं। इन्हीं में मौजूद नीलकण्ठ महादेव मन्दिर अपने ऊंचे-ऊंचे सुन्दर स्तम्भों वाले बरामदे की अपनी विशिष्ट बनावट के लिये खास मुकाम रखता है। शिल्प शास्त्र के ज्ञाता महाराणा कुम्भा ने यज्ञादि के उद्देश्य से शास्त्रोक्त रीति से वेदी बनवाई थी। राजपूताने में प्राचीन काल के यज्ञ स्थानों का यहीं एक स्मारक शेष रह गया है। कहते हैं कि इसी वेदी पर कुम्भलगढ की प्रतिष्ठा का यज्ञ भी हुआ था। किले के सबसे ऊंचे भाग पर भव्य महल बने हुए हैं और नीचे भाली वान (बावडी) और मामादेव का कुण्ड है। 

महाराणा कुम्भा इसी कुण्ड पर बैठे अपने ज्येष्ठ पुत्र उदयसिंह (ऊदा) के हाथों मारे गये थे। इसी कुण्ड के पास मामावट नामक स्थान पर कुभ स्वामी मन्दिर अपनी टूटी-फूटी अवस्था के बावजूद दर्शनीय है। यहीं मौजूद पांच शिलाओं पर मेवाड के राजाओं की वंशावली, उनमें से कुछ का संक्षिप्त परिचय तथा भिन्न-भिन्न विजयों का विस्तृत विवरण भी इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों के लिये आकर्षण का मुख्य केन्द्र है। गणेश पोल के सामने वाली समतल भूमि पर गुम्बदाकार महल तथा देवी का स्थान है। महाराणा उदयसिंह की रानी झाली का महल यहां से कुछ सीढियां और चढने पर था जिसे झाली का मलिया कहा जाता है। 

गणेश पोल के सामने बना हुआ महल ऊंचाई पर बने होने के कारण यहां गर्मियों के दिनों में काफी ठण्डक बनी रहती है, गर्मियों में तपते रेगिस्तान के बीच जिसकी अपनी यह खास विशेषता है। कुम्भलगढ का पर्यटन अपनी वाइल्डलाइफ सेंचुरी के लिये मुख्य रूप से जाना जाता है। यहां की सुन्दरता, वातावरण, घने वनों की वजह की सुन्दरता के कारण ही इसे रेगिस्तान में जन्नत कहा जा सकता है। कुम्भलगढ वाइल्डलाइफ सेंचुरी में दुनिया के सबसे दुर्लभ और खूबसूरत पेड-पौधे, फूल और जानवरों की प्रजातियां हैं। 

हजारों वर्ग किलोमीटर में फैले रेगिस्तान के बीच मौजूद कुम्भलगढ वाइल्डलाइफ सेंचुरी इसे सम्पूर्ण पर्यटक स्थल बनाती है। कुम्भलगढ की हरी-भरी घाटी राजस्थान के राजसमन्द जिले में पूर्ण रूप से फैली हुई है। साथ ही यह उदयपुर और पाली के आस-पास फैले जिलों की सीमा में भी प्रवेश करती है। कुम्भलगढ के जंगलों में बारहसिंहा, हिरण, लोमडी आदि तो देखने को मिलते ही हैं, नदियां और इनमें पाये जाने वाले मगरमच्छ यहां के आकर्षण के केन्द्र हैं। 586 स्क्वायर किलोमीटर में फैली इस सेंचुरी में जंगलों के बीच सुन्दर मन्दिर, बहुत पुराने घर व कई छोटी-छोटी गुफाएं भी हैं, जो देखने में बहुत ही आकर्षक लगती हैं। यह जगह एक विशेष फल के लिये बहुत प्रसिद्ध है, जिसे आम भाषा में सीताफल कहते हैं। 

इसी के बीच में स्थित है 17वीं शताब्दी में निर्मित राजसमन्द झील, जिसकी खुद की खूबसूरती तो अपने आप में अदभुत है ही, यह इस सेंचुरी को भी अभूतपूर्व सौन्दर्य प्रदान करती है। चारों ओर से रेगिस्तान से घिरा कुम्भलगढ और बीच में प्राकृतिक सौन्दर्य से ढका इसका पूरा क्षेत्र अपने आप में ही एक खूबसूरत कहानी बयां करता है। वैसे इतिहास की यादों और प्रकृति के सौन्दर्य का यह तालमेल सिर्फ कुम्भलगढ तक ही सीमित नहीं है, इसके आसपास के क्षेत्रों जैसे रणकपुर, उदयपुर आदि में भी आपको कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिलेगा। 

कुम्भलगढ का इतिहास 

कुम्भलगढ राजस्थान ही नहीं भारत के सभी दुर्गों में विशिष्ट स्थान रखता है। उदयपुर से 70 किलोमीटर दूर समुद्र तल से 1087 मीटर ऊंचा और 30 किलोमीटर व्यास में फैला यह दुर्ग मेवाड के महाराणा कुम्भा की सूझबूझ और प्रतिभा का स्मारक है। इस किले का निर्माण सम्राट अशोक के दूसरे पुत्र संप्रति के बनाये किले के अवशेषों पर 1443 से शुरू होकर 15 वर्षों बाद 1458 में पूरा हुआ था। इस किले का निर्माण कार्य पूरा होने पर महाराणा कुम्भा ने सिक्के ढलवाये जिनपर दुर्ग और उसका नाम अंकित था। वास्तुशास्त्र के नियमानुसार बने इस किले में प्रवेश द्वार, प्राचीर, जलाशय, बाहर जाने के लिये संकटकालीन द्वार,महल, मन्दिर, आवासीय इमारतें, यज्ञ वेदी, स्तम्भ, छत्रियां आदि बने हैं। 

तो आओ चलें... 

कुम्भलगढ जाने का मार्ग उदयपुर से होकर गुजरता है। हवाई यात्रा या ट्रेन द्वारा उदयपुर पहुंचा जा सकता है, जिसके बाद यहां से प्राइवेट टैक्सी या सार्वजनिक वाहनों से कुम्भलगढ का रास्ता तय करते हुए आप बीच-बीच में प्रकृति की हरियाली और रेगिस्तानी सौन्दर्य का लुत्फ भी उठा सकते हैं। उदयपुर से कुम्भलगढ की दूरी 70 किलोमीटर है। जब आप कुम्भलगढ पहुंच जायें तो वहां ठहरने और पारम्परिक भोजन का जायका चखने के लिये कई प्राइवेट और सरकारी होटल उपलब्ध हैं। कुम्भलगढ में ओडी होटल, रणकपुर में फ्रेंच बाग होटल और महारानी बाग जैसे रेस्टॉरेंट अपनी खास पहचान रखते हैं।

 दैनिक जनवाणी में 8 मई 2011 को प्रकाशित

बुधवार, जनवरी 11, 2012

चार धाम- बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम, जगन्नाथ पुरी

श्रद्धा के चार धाम पुरी, रामेश्वरम, द्वारका और बद्रीनाथ, हिन्दू धर्म के प्राचीनतम धाम हैं। शंकराचार्य ने पूरे देश की यात्रा करने के बाद इन स्थानों को हिन्दू धर्म के चार धामों के रूप में मान्यता दी। ये चार धाम भगवान विष्णु के अवतार से जुडे हुए हैं। चार धाम की यात्रा बहुत लम्बी है और हर किसी के लिये सम्भव भी नहीं। इसीलिये कई बार लोग हिमालय की सुरम्य वादियों में स्थित गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के रूप में ‘छोटा चार धाम’ की यात्रा भी करते हैं। इसके बावजूद हर व्यक्ति अपने जीवन में एक बार ‘चार धाम’ की यात्रा जरूर करना चाहता है। ऐसी मान्यता है कि चारधाम की यात्रा करने वाले व्यक्ति को न सिर्फ स्वर्ग की प्राप्ति होती है, वरन उसका अगला जन्म भी सफल हो जाता है। 

बद्रीनाथ 

हिमालय के शिखर पर स्थित बद्रीनाथ मन्दिर हिन्दुओं की आस्था का बहुत बडा केन्द्र है। यह चार धामों में से एक है। बद्रीनाथ मन्दिर उत्तराखण्ड राज्य में अलकनन्दा नदी के किनारे है। यह मन्दिर भगवान विष्णु के रूप में बद्रीनाथ को समर्पित है। बद्रीनाथ मन्दिर को आदिकाल से स्थापित और सतयुग का पावन धाम माना जाता है। इसकी स्थापना मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने की थी। सतयुग में भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन से यह पावन धाम मुक्तिप्रदा के नाम से विख्यात हुआ। त्रेता में इसे योगी सिद्धा नाम से जाना गया, द्वापर में विशाला नाम से जाना गया। कलियुग में यह धाम बद्रिकाश्रम (बद्रीनाथ) कहलाया। बद्रीनाथ मन्दिर की पुनर्स्थापना आदि शंकराचार्य ने करवाई थी। इस मन्दिर की महिमा का वर्णन स्कंद पुराण, केदारखण्ड, श्रीमदभागवत आदि में भी आता है। बद्रीनाथ के दर्शन से पूर्व केदारनाथ के दर्शनों का भी महात्म्य माना जाता है। 
बद्रीनाथ मन्दिर के कपाट अप्रैल के अंत या मई के प्रथम पखवाडे में दर्शन के लिये खोल दिये जाते हैं। लगभग छह महीने तक पूजा अर्चना चलने के बाद नवम्बर के दूसरे सप्ताह में मन्दिर के कपाट बन्द कर दिये जाते हैं। यहां भगवान श्री की दिव्य मूर्ति हरित वर्ण की पाषाण शिला में निर्मित है, जिसकी ऊंचाई लगभग डेढ फीट है। भगवान श्री पदमासन में योग मुद्रा में विराजमान है। यहां भगवान श्री का दर्शन साधक को गम्भीरता प्रदान करता है। भगवान बद्रीनाथ की बायीं तरफ देवर्षि नारद की मूर्ति है। बद्रीनाथ के बारे में कहा जाता है कि यहां द्वापर में भगवान नारायण के सखा उद्धव पधारे थे। इस कारण शीतकाल में देवपूजा के समय उद्धव जी की पूजा होती है। 

द्वारका 

द्वारका धाम समुद्र के किनारे स्थित है। इसे हजारों वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण ने बसाया था। यहीं बैठकर उन्होंने पाण्डवों को सहारा दिया और धर्म की जीत कराई। शिशुपाल और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। चारों धामों में से एक द्वारका की सुन्दरता देखते बनती है। समुद्र की उठती लहरें श्रद्धालुओं का मन मोह लेती हैं। द्वारका के दक्षिण में एक लम्बा ताल है। इसे गोमती तालाब कहते हैं। इसके नाम पर ही द्वारका को गोमती द्वारका कहते हैं। गोमती तालाब के ऊपर नौ घाट हैं। इनमें सरकारी घाट के पास एक कुण्ड है, जिसका नाम निष्पाप कुण्ड है। इसमें गोमती का पानी भरा रहता है। आस्था की इस बडी नगरी में पहुंचे श्रद्धालु इस निष्पाप कुण्ड में नहाने के बाद ही पूजा-अर्चना करने के लिये आगे बढते हैं। लोग यहां अपने पुरखों के नाम पर पिण्ड-दान करने के लिये भी आते हैं। 

जगन्नाथ पुरी 

पुरी का श्री जगन्नाथ मन्दिर भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। जगन्नाथ शब्द का अर्थ जगत का स्वामी होता है। इनकी नगरी ही जगन्नाथ पुरी या पुरी कहलाती है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मन्दिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। मन्दिर उडीसा के पुरी शहर में है। उडिया स्थापत्य कला और शिल्प का आश्चर्यजनक प्रयोग इस मन्दिर में हुआ है। यह देश के भव्यतम मन्दिरों में से एक है। मन्दिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने एक भव्य सोलह किनारों वाला एकाश्म स्तम्भ है। मन्दिर के भीतर आन्तरिक गर्भगृह में मुख्य देवताओं की मूर्तियां हैं। इसके अलावा मन्दिर के शिखर पर विष्णु का श्रीचक्र है। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु का है। 
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा, इस मन्दिर के मुख्य देवी देवता हैं। इनकी मूर्तियां एक रत्न मण्डित पाषाण चबूतरे पर गर्भ गृह में स्थापित हैं। पुरी का सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है रथ यात्रा। यह आषाढ शुक्ल की द्वितीया को आयोजित होता है। उत्सव के दौरान तीनों मूर्तियों को भव्य तरीके से सजाकर विशाल रथों में यात्रा पर निकालते हैं। जगन्नाथ मन्दिर की रसोई भी काफी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि यह भारत की सबसे बडी रसोई है। इस रसोई में भगवान को चढाया जाने वाला महाप्रसाद तैयार किया जाता है। 

रामेश्वरम 

रामेश्वरम तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित है। यहां स्थापित शिवलिंग बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। चेन्नई से लगभग सवा चार सौ मील दक्षिण पूर्व में रामेश्वरम हिंद महासागर और बंगाल की खाडी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुन्दर द्वीप है। यहां भगवान राम ने लंका पर चढाई करने से पूर्व पत्थरों के सेतु का निर्माण करवाया था, जिस पर चढकर वानर सेना लंका पहुंची थी। आज भी सेतु के अवशेष सागर में दिखाई देने की बात कही जाती है। यहां के मन्दिर का गलियारा विश्व का सबसे लम्बा गलियारा है। मन्दिर में विशालाक्षी जी के गर्भगृह के निकट ही नौ ज्योतिर्लिंग हैं, जो लंकापति विभीषण द्वारा स्थापित बताया गया है। रामेश्वरम का मन्दिर भारतीय निर्माण-कला और शिल्पकला का एक सुन्दर नमूना है। इसका प्रवेश द्वार चालीस फीट ऊंचा है। मन्दिर के अन्दर सैकडों विशाल खम्भे हैं, जो देखने में एक जैसे लगते हैं। हर खम्भे पर बेल-बूटे की अलग-अलग कारीगरी है। खम्भों पर की गई कारीगरी देखकर विदेशी भी दंग रह जाते हैं। 
रामनाथ जी के मन्दिर के भीतरी भाग में एक तरह का चिकना काला पत्थर लगा है। कहा जाता है कि मन्दिर निर्माण के लिये पत्थर लंका से आया था। रामनाथपुरम के राजभवन में एक पुराना काला पत्थर रखा है। ऐसी मान्यता है कि यह पत्थर राम ने केवटराज को राजतिलक के समय उसके चिह्न के रूप में दिया था। रामेश्वरम की यात्रा करने वाले लोग इस काले पत्थर को देखने के लिये रामनाथपुरम जाते हैं। रामेश्वरम शहर से करीब डेढ मील उत्तर-पूर्व में गंधमादन पर्वत नाम की एक छोटी सी पहाडी है। हनुमानजी ने इसी पर्वत से समुद्र को लांघने के लिये छलांग मारी थी। बाद में राम ने लंका पर चढाई करने के लिये यहीं पर विशाल सेना संगठित की थी। इस पर्वत पर एक सुन्दर मन्दिर बना हुआ है, जहां श्रीराम के चरण-चिह्नों की पूजा की जाती है। इसे पादुका मन्दिर कहते हैं। रामेश्वरम में रामनाथजी के मन्दिर के पूर्वी द्वार के सामने सीताकुण्ड है। कहा जाता है कि यही वह स्थान है, जहां सीताजी ने अपना सतीत्व सिद्ध करने के लिये आग में प्रवेश किया था। सीताजी के ऐसा करते ही आग बुझ गई और अग्निकुण्ड से जल उमड आया। इसी स्थान को सीताकुण्ड कहते हैं। यहां पर समुद्र का किनारा आधा गोलाकार है। यहां पर बिना किसी खतरे के स्नान किया जा सकता है। यहीं हनुमान कुण्ड में तैरते हुए पत्थर भी दिखाई देते हैं। 

जनवाणी में 25 अप्रैल 2011 को प्रकाशित

सोमवार, जनवरी 09, 2012

बासर का सरस्वती मन्दिर

बसन्त पंचमी आने वाली है। इसी माह विद्या की देवी सरस्वती की पूजा होती है। विद्यार्थी खासतौर पर सरस्वती मां की पूजा करते हैं। कई लोग तो इसी दिन अपने बच्चे को पहली बार कलम पकडवाते हैं। हम में से कम ही लोगों को पता होगा कि सरस्वती देवी का मन्दिर कहां स्थित है। सरस्वती मां का विशेष मन्दिर आन्ध्र प्रदेश के अदिलाबाद जिले के बासर गांव में गोदावरी नदी के तट पर है। विद्या की देवी के दो मन्दिर ही हैं, एक आन्ध्र प्रदेश में और दूसरा लेह में। 

इस मन्दिर के यहां बनने की कहानी है। वह यह कि महाभारत के रचयिता वेद व्यास, उनके शिष्य और ऋषि शुकदेव कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद शान्ति की तलाश में तीर्थ यात्रा पर निकले तो यहां भी पहुंचे। इस जगह की खूबसूरती को देखकर यहां रुक गये। उन्होंने यहां गोदावरी नदी में स्नान किया और मां शारदा की प्रार्थना की। वह रोजाना तीन मुट्ठी रेत को तीन जगह पर विधि-विधान के साथ स्थापित करके श्री सरस्वती, श्री महाकाली और श्री महालक्ष्मी का पूजन करते। इस तरह से मां शारदा यहां अवस्थित हो गईं। चूंकि वेद व्यास ने यहां काफी समय प्रार्थना में ही बिताया तो इसे वसरा कहा जाने लगा। बाद में मराठी में इसका नाम बासर पड गया। हालांकि ब्रह्मानन्द पुराण के अनुसार, वाल्मिकी ऋषि ने यहां मां शारदा की स्थापना की और बाद में रामायण की रचना की। यहां उनकी संगमरमर की मूर्ति स्थापित है और मन्दिर के समीप समाधि भी। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाये तो कर्नाटक के राजा बिजालाडू ने इस मन्दिर का निर्माण करवाया। 

इस मन्दिर में मां शारदा की प्रतिमा पदमासन मुद्रा में चार फीट ऊंची है। उनके चेहरे पर हल्दी लगी हुई है। कहा जाता है कि इस हल्दी को चख लेने भर से ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। कई भक्तजन यहां अपने बच्चों का ‘अक्षर अभ्यासम’ समारोह करवाते हैं। ज्ञान की देवी को वे किताबें, कलम, पेंसिल आदि चढाते हैं। मन्दिर में पूजा सुबह चार बजे अभिषेकम से शुरू होती है, जो एक घण्टे तक चलती है। पांच बजे पुजारी अलंकरण शुरू करते हैं, जिसमें मां सरस्वती को नई साडी पहनाई जाती है। सुबह छह बजे सूरज की पहली किरण के साथ आरती शुरू हो जाती है, जिसके बाद भक्तजनों को प्रसाद वितरित किया जाता है। यहां ग्रेनाइट का स्तम्भ भी है, जिसमें अलग-अलग स्थान से संगीत के सातों स्वर सुने जा सकते हैं। मन्दिर के प्रांगण में लगे वृक्ष पर दत्तात्रेय जी की खडाऊं हैं। कहा जाता है कि मात्र इसके स्पर्श से बांझ स्त्री को पुत्र प्राप्ति हो जाती है। 

महाशिवरात्रि और बसन्त पंचमी से 15 दिन पहले से शुरू विशेष पूजा तीन दिन बाद तक चलती रहती है। यहां महाकाली और महालक्ष्मी की प्रतिमा भी हैं। नजदीक की पहाडी पर मां सरस्वती की एक और प्रतिमा है। सरस्वती, लक्ष्मी और काली की प्रतिमा यहां स्थित होने से बासर को धार्मिक लोगों के बीच विशेष स्थान प्राप्त है। मन्दिर के समीप ही एक पहाडी है, जिस पर एक गुफा बनी हुई है। इसे नरहरी गुफा कहा जाता है। इसका महत्व भी कम नहीं है। यहीं नाथ पंथ के घुंडीसूत नरहरी मालुका की समाधि बनी हुई है। कहा जाता है कि वे यहीं तप करते थे। यहां कई मन्दिर श्रंखलाएं हैं, जिनमें हनुमान मन्दिर, गणेश मन्दिर, पातालेश्वर मन्दिर, दत्त मन्दिर, एकवीर मन्दिर मुख्य हैं। मन्दिर की पूर्व दिशा में पापहरणी नामक झील है, जिसके आठ दिशाओं में तीर्थ हैं। यही वजह है कि इसे अष्टतीर्थ झील भी कहा जाता है। सूर्य तीर्थ, इंद्र तीर्थ, सरस्वती तीर्थ, व्यास तीर्थ, विष्णु तीर्थ, वाल्मिकी तीर्थ प्रसिद्ध हैं। 

सरस्वती तीर्थ झील के बीच में है, यहीं से गोदावरी नदी का जल आता है। कहा जाता है कि दत्त मन्दिर से शारदा मन्दिर तक पापहरेश्वर मन्दिर के रास्ते गोदावरी नदी तक काफी पहले एक सुरंग थी, उसी रास्ते पहले के महाराजा मन्दिर में पूजन के लिये आया करते थे। यहां पूजा के लिये मां को फल-मेवा आदि चढाया जाता है। मन्दिर की दीवारों पर दर्शनार्थी सिक्का चिपकाते हैं। मान्यता है कि यदि सिक्का चिपक गया तो मां प्रसन्न होती है और मनोकामना पूरी करती है। कहा तो यह भी जाता है कि मन्दिर परिसर में रात में रुकने पर मां प्रसन्न होती हैं और अपना आशीर्वाद देती हैं। मन्दिर का द्वार तो पूजा के बाद रात को बन्द कर दिया जाता है लेकिन मन्दिर परिसर खुला रहता है। केवल ग्रहण के समय मन्दिर परिसर भी बन्द कर दिया जाता है। इस जगह के बारे में कहा जाता है कि पहले यहां भयानक जंगल था। आम जंगलों की तरह ही यहां शेर, भालू, चीता जैसे जानवर खुले घूमते थे। इस मन्दिर की देखभाल श्री ज्ञान सरस्वती देवस्थानम संस्था द्वारा की जाती है। इसका जिम्मा अवकाश प्राप्त आईएएस अधिकारी या उसके समकक्ष किसी अधिकारी का है, जिसका सीधा नियन्त्रण आन्ध्र प्रदेश सरकार करती है। 

 लेख: प्रियंका सिंह (राष्ट्रीय सहारा, सण्डे उमंग में 6 फरवरी 2011 को प्रकाशित)