गुरुवार, दिसंबर 15, 2011

नारकंडा- प्रकृति से साक्षात्कार

नारकंडा समुद्र तल से लगभग नौ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां की गगनचुम्बी पर्वत चोटियों की सुन्दरता एवं शीतल, शान्त वातावरण पर्यटकों को हमेशा मन्त्रमुग्ध किये रहता है। गत कुछ वर्षों से गर्मी व सर्दी के मौसम में देशभर के सैलानियों का जो भारी सैलाब शिमला में जमा हो रहा है, वह कुफरी, फागू, नालदेहरा व मशोबरा जैसे सुन्दर पर्यटक स्थलों को देखने के अलावा नारकंडा की प्राकृतिक छटा को निहारने के लिये भी बेताब रहता है।

कुदरत की रंगीन फिजाओं में बसा यह छोटा सा उपनगर आकाश को चूमती तथा पाताल तक गहरी पहाडियों के बीच घिरा हुआ है। ऊंचे रई, कैल व तोश के पेडों की ठण्डी हवा यहां के शान्त वातावरण में रस घोलती रहती है।

यह शान्त तथा प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर पर्यटन स्थल मुख्य तौर पर स्कीइंग के लिये प्रसिद्ध है। स्थानीय बाजार से दो किलोमीटर दूर धमडी नामक स्थल पर स्कीइंग केन्द्र स्थित है। इस केन्द्र में प्रतिवर्ष जनवरी से मार्च महीने तक स्कीइंग के प्रशिक्षण शिविर लगाये जाते हैं।

नारकंडा छोटा सा पर्यटन केन्द्र है। फिर भी बाहर से आने वाले सैलानियों के रात्रि ठहराव हेतु यहां पर लोकनिर्माण विभाग तथा राज्य पर्यटन विभाग का गेस्ट हाउस व होटल हैं। यूं तो शिमला से नारकंडा को सवेरे जाकर शाम को आसानी से लौटा भी जा सकता है। शिमला से नारकंडा का तीन घण्टे का सफर बडा ही मजेदार व जोखिमभरा है। सांप जैसी बलखाती तंग सडक के दोनों तरफ कहीं गहरी खाईयां तो कहीं आकाश को छूती चोटियां हैं, जिनको देखकर एक बार तो दिल सहम जाता है। आजकल इस मार्ग को चौडा करने का कार्य चल रहा है।

नारकंडा नगर के बीच से गुजरते उच्च मार्ग के दोनों तरफ बने छोटे से बाजार में खरीद-फरोख्त तथा काम-धन्धा करने आये ग्रामीणों का अक्सर जमघट लगा रहता है। बाजार के मध्य में स्थित काली मन्दिर के आसपास रंग बिरंगे वस्त्र पहने गांवों की महिलाएं अपने-अपने गंतव्य जाने के लिये आमतौर पर बसों का इंतजार करती हुई नजर आती हैं। काली मन्दिर के ठीक पीछे छोटी पहाडी पर कुछ तिब्बती परिवार भी रहते हैं जो कि यहां पर दुकानदारी तथा अन्य धन्धों में लगे हुए हैं। स्थानीय सडकों के किनारे आते-जाते छोटे-छोटे बच्चों के कन्धों पर लटके बस्ते तथा हाथ में लहराती लकडी की तख्तियां उनके विद्यार्थी होने का आभास कराती हैं। यह भोले-भाले बच्चे बाहर से आने वाले सैलानियों को यूं निहारते रहते हैं मानों उनके चेहरों पर छाई मासूमियत सदैव उनका अभिनन्दन करती रहती हो।

जहां इस शान्त वादी की सुन्दरता पर्यटकों को यहां ठहरने पर मजबूर करती है वहीं यह जगह उन्हें अपनी रंगीनियों की मोहताज भी बना लेती है।

लेख: हेमन्त चौहान (हिन्दुस्तान रविवासरीय, नई दिल्ली, 18 मई 1997)

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

बुधवार, दिसंबर 14, 2011

जूनागढ- नवाबों की हवेलियों का शहर

अरब सागर के मुहाने पर बसा गुजरात का जूनागढ क्षेत्र बब्बर शेरों के लिये प्रसिद्ध है। गिर के जंगलों की तलहटी में बसे जूनागढ शहर को नवाबों के लिये भी जाना जाता है।

इस क्षेत्र की दूसरी विशेषता यहां की हरियाली है। हरे-भरे घने जंगल और मीठे पानी के प्राकृतिक स्त्रोतों की वजह से यह जगह वन्य पशुओं के लिये मुफीद रहती है। भारत में यही एकमात्र ऐसा जंगल है जहां बब्बर शेर बचे रह गये हैं।

गिर के प्रख्यात जंगल में खुलेआम घूम रहे शेरों को देखने के लिये विशेष जालीदार गाडियों की व्यवस्था है। इन गाडियों के द्वारा आप पूरे जंगल की सैर कर शेरों को उनके प्राकृतिक स्वरूप में देखने का सुन्दर मौका पाते हैं।

जूनागढ चूंकि नवाबों का शहर रहा है इसलिये इस शहर का अन्य मुख्य आकर्षण नवाबों की हवेलियां हैं। अरबी और फारसी शैली के अलावा इनके निर्माण में गुजरात की पारम्परिक शैली का सम्मिश्रण इन्हें अदभुत छवि प्रदान करता है।

कम लोगों को ही ज्ञात होगा कि यहां जुल्फिकार अली भुट्टो का भी एक महल है। पाकिस्तान के इस पूर्व प्रधानमन्त्री का महल आजकल संग्रहालय कम सरकारी गेस्ट हाउस ज्यादा है। यहां रखे शीशे और लकडी के फर्नीचर अपनी अच्छी कारीगरी और नक्काशी के कारण आज भी अच्छे लगते हैं। यहां पहुंचने के लिये सूरत, मुम्बई या अहमदाबाद से आसानी से जाया जा सकता है।

यहां के बाजारों में स्थानीय कलाकृतियों की लकडी और प्लास्टिक की अनुकृतियां आप दोस्तों को स्मृति चिह्न के रूप में भेंट कर सकते हैं। गुजराती चलन के कपडे भी यहां से खरीदे जा सकते हैं।

जूनागढ पहुंचने के लिये लगभग सभी प्रमुख शहरों से रेल सम्पर्क है। वैसे अहमदाबाद पहुंचकर वहां से रेल या बस से जूनागढ पहुंचना ज्यादा सुविधाजनक रहता है।

जूनागढ आयें तो समुद्र तट पर स्थित पोरबन्दर भी जरूर जायें। यह शहर अपने सुन्दर समुद्र तट और महात्मा गांधी का जन्मस्थान होने के कारण विश्व विख्यात है।

महात्मा गांधी का जिस जगह जन्म हुआ था, उस जगह को आज एक अत्यन्त अच्छे संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। गांधी जी, कस्तूरबा गांधी और अन्य राष्ट्रीय नेताओं से जुडी चीजों को यहां एक अच्छे स्मारक के रूप में रखा गया है।

जूनागढ से सिर्फ 5-7 किलोमीटर की दूरी पर गिरनार महत्वपूर्ण जैन तीर्थ है। यहां ऊंची पहाडियों पर स्थित जैन मन्दिरों और गुफाओं को देखना आकर्षक है।

लेख: निशा (हिन्दुस्तान रविवासरीय, नई दिल्ली, 18 मई 1997)

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

मंगलवार, दिसंबर 13, 2011

कोडैकनाल- सुरम्य स्थल

प्रकृति की गोद में बसा कोडाई अथवा कोडैकनाल तमिलनाडु की पालनी पहाडियों पर स्थित एक सुरम्य स्थल है। 19वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में ईसाई मिशनरियों ने बच्चों के लिये आवासीय स्कूल स्थापित करने के लिये इस निर्जन स्थान को चुना था।

यहां की सूर्य की किरणें भारत के किसी भी पर्वतीय स्थल से अधिक चमकदार दिखाई देती हैं। यहां पेड-पौधे, पशु-पक्षी, आकर्षक वनों की खूबसूरत ढलानें, झरने पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। पक्षी जगत यहां बहुतायत में है। 1861 में मेजर डगलस हेमिल्टन ने 144 प्रजाति के पक्षियों का पता लगाया था।

क्या देखें?

तारे के आकार की सुरम्य झील पर्वतों के मध्य में बहुत खूबसूरत लगती है। झील में नौका विहार का आनन्द लिया जा सकता है। झील के पूर्व की ओर ब्रायंट पार्क रंग-बिरंगे फूलों के लिये मशहूर है।

सौर भौतिक प्रयोगशाला यहां के सबसे ऊंचे बिन्दु पर स्थित है। झील से करीब तीन किलोमीटर दूर इस वेधशाला की स्थापना 1898 में हुई थी। यहां तारों की गति को देखा जा सकता है।

इसके अलावा बियर शोला प्रताप, पिलर रॉक्स, कुरुंजी मन्दिर आदि अन्य मनमोहक व दर्शनीय स्थल हैं।

कैसे पहुंचें?

कोडैकनाल सडक मार्ग से तो भली-भांति जुडा हुआ है, किन्तु निकटतम हवाई अड्डा मदुरै है जो 120 किलोमीटर दूर स्थित है। कोयम्बटूर हवाई अड्डा 135 किलोमीटर दूर है।

रेल द्वारा कोडाई रोड रेलवे स्टेशन (80 किलोमीटर) तथा पालनी रेलवे स्टेशन (64 किलोमीटर) पहुंचा जा सकता है। कोडैकनाल से नियमित बस सेवा मदुरै, पालनी, कोडैकनाल रोड, थेनी, डिंडीगुल, तिरुचिरापल्ली, इरोड, बैंगलुरु व कोयम्बटूर के लिये उपलब्ध है। तमिलनाडु पर्यटन विकास निगम एकदिवसीय भ्रमण का आयोजन करता है।

कहां ठहरें?

भारतीय व पाश्चात्य शैली के होटल यहां उपलब्ध हैं। साथ ही यूथ हास्टल भी यहां हैं।

खरीदारी

खादी इम्पोरियम, हैंडलूम कोऑपरेटिव स्टोर्स आदि से कलात्मक वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं। यहां पर बैंक, अस्पताल, पोस्ट ऑफिस आदि की सुविधा उपलब्ध है।

लेख: दिनेश (हिन्दुस्तान रविवासरीय, नई दिल्ली, 18 मई, 1997)

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

सोमवार, दिसंबर 12, 2011

हिमाचल में भी है ‘जुरैसिक पार्क’

‘जुरैसिक पार्क’ फिल्म का निर्माण जिस स्थान को चयनित करके इस फिल्म के निर्माता स्टीवेन स्पीलबर्ग ने हॉलीवुड में किया है, यदि हम ध्यान से उन पहाडियों और उन पर उगे पेड-पौधों को देखें तो एक पल के लिये भ्रम होता है कि यह स्थान नाहन से 14 किलोमीटर दूर दक्षिणी उपत्यका में स्थित शिवालिक पहाडियों के अंचल में निर्मित ‘फॉसिल पार्क’ का तो नहीं? हालांकि यह एक विभ्रम भी हो सकता है लेकिन जुरैसिक युग और शिवालिक फॉसिल पार्क में उपलब्ध इस युगीन जीवाश्मों को देखकर अनेकों प्रश्न मन में उत्पन्न हो जाते हैं। वैज्ञानिकों और विज्ञान छात्रों के लिये तो यह विषय जैसे नई खोज का हो गया लगता है। जिस किसी ने भी इस दृष्टि से इस फिल्म को देखा है, जो विज्ञान पर आधारित है, वह अवश्य एक बार हिमाचल के इस दुर्लभ शिवालिक जीवाश्म पार्क को देखना चाहता है या फिर देख भी आया होगा। उसके मन में यह विचार भी घर कर गया होगा कि यदि जुरैसिक पार्क जैसी कोई फिल्म भारत में बनती है तो शिवालिक पहाडियों का अंचल उसके लिये उपयुक्त स्थान ही नहीं बल्कि इसका एक जुरैसिक युगीन आधार भी हो सकता है।

नाहन जिला सिरमौर का मुख्यालय है। पहले यह रियासत कालीन राजधानी थी। इस नगर को सन 1621 ई में राजा कर्ण प्रकाश ने बसाया था। नाहन से शिवालिक फासिल पार्क के लिये उतराई वाला रास्ता है। लगभग 7-8 किलोमीटर नीचे उतरकर एक गांव है जिसके बायीं ओर से एक पैदल मार्ग भी इस पार्क को चला जाता है। लेकिन काला अम्ब जो नाहन से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर है, से यहां के लिये 4 किलोमीटर का कच्चा लिंक मार्ग है। यही रास्ता वाहनों से सुकेती पहुंचाता है यानी जिस स्थान पर यह पार्क निर्मित हुआ है, उसका नाम सुकेती है। इसके नीचे बायें किनारे मारकण्डा नदी बहती है।

इस जीवाश्म पार्क को भारत सरकार के भूगर्भीय सर्वेक्षण विभाग के प्रयत्नों से विकसित किया गया है जो एशिया में पहला अपनी तरह का अनोखा पार्क है। यह मानव और प्राकृतिक वातावरण को करीब से समझने, जानने और अध्ययन करने का अनूठा और चुनौतीपूर्ण स्थान है। इस पार्क की विशेष महत्ता इस बात से है कि यह उसी जगह विकसित/ स्थापित किया गया है जहां लाखों वर्ष पूर्व पाये जाने वाले जीवों के जीवाश्म मिले हैं।

इस पार्क का निर्माण वर्ष 1974 में किया गया था। इसका विकास दो चरणों में किया गया। पहले चरण का कार्य तब शुरू हुआ था जब हिमाचल प्रदेश सरकार ने सौ एकड भूमि भारत सरकार के भू-विज्ञान सर्वेक्षण विभाग को इस कार्य हेतु सौंपी थी। यह भूमि वर्ष 1972 में दी गई। तत्कालीन राज्यपाल, हिमाचल प्रदेश श्री एस. चक्रवर्ती द्वारा काला अम्ब के स्थान पर एक क्षेत्रीय संग्रहालय का उदघाटन दिसम्बर 1972 में किया गया था। क्योंकि पार्क स्थल के लिये उस समय कोई भी वाहन योग्य मार्ग नहीं था, इसलिये जुरैसिक युगीन जीवों के कुछ दुर्लभ जीवाश्म प्रतिरूप सडक के किनारे रखे गये जिनमें तलवार रूपी घुमावदार दांतों वाले चीतों, छह उत्कीर्ण विलुप्त दांत वाले दरियायी घोडों और कवची कछुओं के मुख्य मॉडल थे। पार्क के लिये लिंक मार्ग का उदघाटन फरवरी 1974 में तत्कालीन मुख्यमन्त्री हिमाचल निर्माता डॉ. यशवन्त सिंह परमार द्वारा किया गया और तभी से लेकर यह पार्क देश-विदेश के अनुसंधानकर्त्ताओं, विद्यार्थियों, वैज्ञानिकों और पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहा है।

जीवाश्म पार्क के विकास का द्वितीय चरण दिसम्बर 1975 में प्रारम्भ हुआ और कई महत्वपूर्ण कार्य पूर्ण किये गये। पार्क स्थल को सुन्दर ढंग से चारों ओर से सुरक्षित कर लिया गया और जो जीवाश्म यहां प्राप्त हुए, उनके विशाल फाइबर ग्लास के प्रतिरूप पार्क के मध्य झाडियों में विभिन्न स्थानों पर स्थापित किये गये जिससे इस पार्क का आकर्षण और बढ गया और यहां आने वालों के लिये यह समझना आसान हो गया कि लाखों वर्ष पहले ऐसे भीमकाय और भयंकर जीव भी इस धरती पर रहा करते थे- विशेषकर शिवालिक पहाडियों की उपत्यकाओं में। इन प्रतिरूपों में जिन जीवों के प्रतिरूप यहां स्थापित हैं उनमें प्रागैतिहासिक भीमकाय हाथी (मां और बच्चे के रूप में) जिसके तीन मीटर लम्बे दांत दर्शाये गये हैं, जो तलवारनुमा घुमावदार हैं, भीमकाय आकार का विचित्र जिराफ के प्रतिरूप मुख्य थे।

इसके अतिरिक्त पार्क में जीवाश्म संग्रहालय भी निर्मित किया गया जिसमें बहुत सी नई विचित्र वस्तुएं रखी गईं। इसमें नई आकृतियां, जीवाश्म, पत्थर शिल्पाकृतियां जो इस स्थान पर उपलब्ध हुई हैं, इस संग्रहालय में शामिल की गईं। इसी दौरान एक कृत्रिम जलाशय का निर्माण भी पार्क के अतिरिक्त सौन्दर्य की दृष्टि से हुआ और लगभग बीस हजार छोटे-बडे आकार के पौधे भी लगाये गये।

शिवालिक पहाडियां हिमालय की बाहरी पर्वत श्रेणियां हैं। ये मानव विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। यह माना जाता है कि लाखों वर्ष पूर्व इन्हीं पहाडियों के अंचल में मानव-पूर्वजों का प्रारम्भ और विकास हुआ। शिवालिक पहाडियों से जो सर्वप्रथम जीवाश्म मिला है, वह इस बात का प्रमाण माना जाता है कि मानव-परिवार का पहला जीव है और वह निर्जन मैदानी भाग में रहा करता था। मानव विज्ञानियों के अनुसार ये प्रमाण विकासीय स्थिति और समय अनुक्रम में इतने विविध हैं कि सम्भवतः सामान्य पूर्वज से मानव और बिना पूंछ के बन्दर ने शिवालिक में एक साथ स्थान ग्रहण किया। इसी क्रम को आगे बढाते हुए एक शोध छात्र ने भी माना है कि पहला मानव चण्डीगढ क्षेत्र में 15 मिलियन वर्ष पूर्व रहा करता था। यह बात शिवालिक पहाडियों के निचले भागों में खोजे गये कुछ दांतों और जबडों के निरीक्षण के आधार पर कही गई है।

शिवालिक क्षेत्र अर्थात जहां यह जीवाश्म पार्क स्थित है, में भू-वैज्ञानिकों को विभिन्न आकारों के जीवाश्म प्राप्त हुए हैं। उनका मानना है कि छह हजार मीटर बिछी चट्टानी परतों में जो कि शिवालिक क्षेत्र में 2 से 25 मिलियन वर्ष पूर्व नदी प्रवाह से बनी, मेरुदण्डीय जीवाश्मों का भण्डार है। तृतीय महाकल्प के प्रारम्भ होते अर्थात 70 मिलियन वर्ष पूर्व जब मध्य हिमालय पर्वत श्रेणियां तीन से चार चरणों में विकसित हुईं, शिवालिक पहाडियों ने तीव्रता से बढना शुरू कर दिया। यह सभी कुछ प्राकृतिक था। इसी समय घोडों, पशुओं, हाथियों, सुअरों, जिराफों, दरियायी घोडों, गैंडों, मगरमच्छों, भूमि पर रहने वाले कछुओं और कई मांसाहारी पशुओं की कई आकृतियों का विकास और बढोत्तरी इस क्षेत्र में हुई लेकिन इनमें कपि मानव नहीं था। हिमयुग में जो स्तनधारी प्राणी/ पशु विलोम हो गये थे, उनके जीवाश्म अवशेष चट्टानी परतों में उपलब्ध होते हैं।

जुरैसिक पार्क फिल्म में जिस तरह के डाइनासोर दर्शाये गये हैं, उनसे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि शिवालिक क्षेत्र में ऐसे अनेक भीमकाय जीव मौजूद रहे होंगे और सुकेती में स्थित/ स्थापित इस जीवाश्म पार्क में जो फाइबर ग्लास के भीमकाय छह सेट स्थापित किये गये हैं वे इस बात को प्रमाणित भी करते हैं। इस स्थापित प्रतिरूपों में (जैसा कि ऊपर बताया गया है) दुर्लभ चीते, मगरमच्छ, गैंडे, हाथी, कछुए और जिराफ हैं।

यहां पाठकों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जुरैसिक युग क्या है और कितना पुराना रहा होगा तथा वास्तव में फासिल या जीवाश्म बनते कैसे हैं।

जहां तक जुरैसिक युग का सम्बन्ध है वह मध्यजीव कल्पों में मध्य युग है। मध्यजीव के अन्तर्गत तीन युग आते हैं इनमें जुरैसिक युग मध्य युग माना जाता है। ब्रौंन्यार (Brongniar) ने सन 1829 में आल्प्स पर्वत की जुरा श्रेणी के आधार पर इस प्रणाली का नाम जुरैसिक रखा था। विश्व के स्तरशैल विद्या (Stratigraphy) में इस प्रणाली का विशेष महत्व है क्योंकि इसी आधार पर विलियम स्मिथ ने, जो स्तरशैल विद्या के प्रणेता कहे जा सकते हैं, इसके अधिनियमों का निर्माण किया। इस युग के शुरू में पृथ्वी का धरातल शान्त माना गया है। परन्तु जुरैसिक युग के अपरान्ह में यह देखा गया है कि पृथ्वी पर विविध विक्षोभ हुए और समुद्री अतिक्रमणों से जगह-जगह पानी भर गया। पृथ्वी का उत्तरी मध्यवर्ती और दक्षिणी भाग पूरी तरह जल से भर गया। शेष भाग सूखा रह गया। उत्तरी समुद्र अमेरिका अवं ग्रीनलैण्ड के उत्तर से लेकर वर्तमान आर्कटिक सागर और साइबेरिया तक फैला था। यूराल पर्वत के पश्चिमी भूभाग से इस समुद्र की एक शाखा इसको उस समय के भूमध्य सागर से मिलाती थी।

वर्तमान भूमध्य सागर के विस्तार की तुलना में उस समय का समुद्र विशाल था और सम्पूर्ण पृथ्वी को घेरे हुए था। इस सागर को टेथिस सागर कहते हैं। भूविज्ञानियों का मानना है कि भारत के उत्तरी प्रदेश से लेकर उत्तरी बर्मा, हिन्दचीन अवं फिलीपीन से होता हुआ टेथिस सागर का ही एक भाग दक्षिणी सागर बनाता था। इस युग में पृथ्वी पर जो कुछ भी मौजूद होगा, वह जलमग्न होकर भूमिगत हो गया होगा और जब कभी जल सागर से पृथ्वी मुक्त हुई होगी तो रेतीली/ चट्टानी परतों में दबे तत्कालीन मानव/ जीव आज के उपलब्ध जीवाश्म हो गये होंगे। यही आधार आज भूगर्भ वैज्ञानिकों की खोज का रहा है।

इसके बाद जो शैल समूह बने वे यूरोप, दक्षिण-पूर्वी इंग्लैण्ड, उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी भाग, एशिया माइनर, हिमाचल प्रदेश, उत्तरी बर्मा और अफ्रीका के पूर्वी तट पर मिलते हैं। भारत में जुरैसिक प्रणाली के पर्वत उत्तर में स्पीति, कश्मीर, हजारा, शिमला-गढवाल और एवरेस्ट प्रदेश में पाये जाते हैं। शिमला का तात्पर्य निचली शिवालिक पर्वत श्रेणियों से रहा है, जिसमें नाहन के निकट सुकेती का शिवालिक फासिल पार्क स्थित है। इसे जुरैसिक युगीन माना जाता है- और इसी केन्द्र बिन्दु को लेकर हालीवुड की ‘जुरैसिक पार्क’ फिल्म बनी है। हालांकि इसमें डाइनासोर के विशाल स्वरूप को प्रदर्शित करके यह दर्शाया गया है कि जुरैसिक काल/ युग में ऐसे अनेक जानवर थे, लेकिन हिमाचल की शिवालिक पहाडियों और विशेषकर शिवालिक फासिल पार्क के परिप्रेक्ष्य में विचार और मनन करते हुए यह फिल्म कई विचार बिन्दु मानव के मस्तिष्क पर तो छोडती ही है बल्कि वैज्ञानिकों और भूगर्भवेत्ताओं को नये आयाम खोजने और जोडने के लिये भी आमन्त्रित करती है।

सामान्यतः जीवाश्म शब्द से अतीत काल के भौमीकीय युगों के उन जैव अवशेषों से तात्पर्य है जो भूपर्पटी के अवसादी शैलों में पाये जाते हैं। भौमीकीय युगों में पृथ्वी पर ऐसे अनेक जीवों के समुदाय रहते थे जिनके कठोर अंग थे। जीवाश्म बनने के लिये यह होना अनिवार्य है क्योंकि यहीं अंग युग-युगान्तर तक जीवाश्म के रूप में शैलों में परिरक्षित रह सकते हैं और आज के युग में वैज्ञानिकों/ भूविज्ञानवेत्ताओं की खोज का यही एक आधार है।

आज के सन्दर्भ में हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर की सुकेती नामक जगह में स्थित यह जीवाश्म पार्क कई कारणों से ख्याति नहीं पा सका जो इसे पानी चाहिये थी। एशिया में अपनी तरह के एकमात्र होते हुए भी यहां वे सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं जो प्राथमिक स्तर पर होनी चाहिये। काला अम्ब से चार किलोमीटर की कच्ची सडक है। हल्की सी वर्षा से यह बीच-बीच में बन्द हो जाती है। यातायात सुलभ न होने के कारण लोग वर्ष भर नहीं जा सकते। इस पार्क के निकट कोई उपयुक्त आवास और जलपान सुविधा भी नहीं है। पर्यटन विकास निगम ने बहुत पहले अपना एक कैफे खोला भी था लेकिन अब बन्द कर दिया गया है। पार्क का विकास उस रूप में भी नहीं हुआ है जिस स्थिति में होना चाहिये था। जो जीवाश्म पार्क निर्माण के समय उपलब्ध थे, जो प्रतिरूप उस समय स्थापित किये गये थे, वही आज भी हैं, हालांकि उसमें कोई विकास नहीं हुआ है।

सोच का विषय यह है कि एक फिल्म निर्माता ने केवल कम्प्यूटर की सहायता से डाइनासोर विकसित करके ‘जुरैसिक पार्क’ फिल्म का विश्व भर में डाइनासोरों की तरह ही आतंक मचा रखा है और छह करोड डालर की लागत से इसे बनाया है, लेकिन हम लोग एक वास्तविक जीवाश्म पार्क के लिये, जिसमें जुरैसिक युगीन जीवों के जीवाश्म मौजूद हैं, महज चार किलोमीटर मार्ग भी यातायात के लिये अच्छी तरह नहीं बना पाये।

हालांकि वैज्ञानिक मानते हैं कि अब कभी भी डाइनासोर को धरती पर पैदा करना सम्भव नहीं है लेकिन जो विज्ञान विषय के बच्चे इस फिल्म को देखकर आते हैं, और जिन्होंने एकाध झलक में इस फासिल पार्क को देखा है, वह इस देश के वैज्ञानिकों से यह अपेक्षा अवश्य लगाये हैं कि जिस तरह डाइनासोर काल के एंबरा में दबे मच्छर के खून से डाइनासोर का डीएनए अलग किया गया, उसी तरह से इस क्लोनिंग तकनीक को अपनाकर इस क्षेत्र में पाये जाने वाले उपलब्ध जीवाश्मों को यह रूप देंगे और जो कृत्रिम माडल यहां लगाये हैं वह जीवित जैसे विचरने लगेंगे। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले यदि काला अम्ब से यहां तक पक्का मार्ग ही सरकार बना दे तो यही महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।

लेख: एस. आर. हरनोट

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

रविवार, दिसंबर 11, 2011

वशिष्ठ- पौराणिक स्मृतियों को दामन में समेटे एक गांव

हिमाचल प्रदेश के स्वर्ग मनाली से मात्र चार किलोमीटर दूर लेह राजमार्ग पर स्थित है- स्वप्निल प्रकृति का एक और विशिष्ट स्थल वशिष्ठ, जहां सौन्दर्य और धर्म, पर्यटन व तीर्थाटन, परम्पराएं और आधुनिकता, ग्रामीण शैली व उपभोक्तावादी चमक-दमक आपस में एक हो रहे हैं। एक ऐसा गांव है वशिष्ठ जो अपने दामन में पौराणिक स्मृति को छुपाये हुए है। महर्षि वशिष्ठ ने इसी स्थान पर बैठकर तपस्या की थी। कालान्तर में यह स्थल उन्हीं के नाम से जाना जाने लगा। ऋषि का यहां प्राचीन मन्दिर है।

यहां प्रकृति के जादुई आकर्षण का अछूतापन बिखरा हुआ है। फिर यहां कुदरत का सबसे निराला उपहार है- गर्म जल के स्त्रोत। जिन्हें स्नान कुण्डों की शक्ल दे दी गई है। आप घूमिये, नहाइये। ताजादम होकर रोहतांग दर्रे की हिमश्रंखलाओं से लेकर गोशाल, बाहंग, बुरुआ, सोलांग व मनाली व्यास घाटी को यहां से बैठे बैठे देखें तो यूं लगता है जैसे हम स्वप्न लोक में विचर रहे हों। इसी अनाम सम्मोहन के वशीभूत होकर यहां बडे पैमाने पर देश-विदेश से प्रकृति प्रेमी व पर्यटक आते हैं। मुम्बई की फिल्म कम्पनियों को यह स्थल विशेष पसन्द है। अब तक दर्जनों फिल्मों की यहां शूटिंग हो चुकी है। एक दशक पूर्व तक यहां पैदल मार्ग से पहुंचा जाता था। तब कम ही लोग यहां पहुंचते थे, लेकिन अब सडक बन जाने व अन्य कई सुविधाओं के जुटने से भारी भीड यहां पहुंचती है। बडे से बडे व भव्य होटल यहां खुल गये हैं।

एक होटल तो हैलीस्कीइंग की सुविधा तक मुहैया करा रहा है। पर्यटन निगम, हिमाचल ने गर्म जलों के डीलक्स व लग्जरी बाथ्स तैयार कराये हैं। विदेशियों के लिये तो यह स्थल तीर्थ की तरह है। हिप्पियों की एक भरपूर जमात यहां गांव में डेरा डाले रह रही है।

50 परिवारों का यह गांव वशिष्ठ भी कम दर्शनीय नहीं है। सभी मकान पुरानी कुल्लुई काठकुणी शैली के हैं जो बहुत सुन्दर व कलात्मक लगते हैं। लकडियों पर की गई मोहक पच्चीकारी आकर्षित करती है। यहां के सेब बगीचे भी मशहूर हैं। हर साल यहां बसन्त आगमन के साथ ही विरशु मेले का परम्परागत आयोजन होता है। सर्दी की ठिठुरन से निजात पाकर यहां के जनजीवन में एक नई स्फूर्ति और उल्लास का संचार होने लगता है। विरशु मेला इन्हीं खुशियों की सामाजिक अभिव्यक्ति है। इस मेले में चरासे तरासे नामक लोकनृत्य में जब महिलाएं नाचती हैं तो लास्य भाव बेहद मुग्ध करता है।

इस अवसर पर आसपास क्षेत्र के स्थानीय देवताओं की डोलियां भी यहां आती हैं। देवता स्नान करते हैं और ऋषि वशिष्ठ को अर्घ्य चढा आते हैं। यूं भी बडे स्नान के लिये वर्ष भर घाटी के देवताओं का यहां तांता लगा रहता है।

वशिष्ठ के नजदीक छोईड नाम का सुन्दर झरना है। इस झरने की विशेषता यह है कि लोग इसमें अपने बच्चों को मुण्डन हेतु यहां पर लाते हैं। प्रचलित धारणा है कि यहां मुण्डन कराने से बच्चों को प्रेत बाधा अथवा छाया से मुक्ति मिल जाती है। गांव के ठीक नीचे ब्यास और मनालसू नदियों का संगम भी आकर्षक है।

वशिष्ठ के बारे में पौराणिक श्रुति इस प्रकार है कि वनवास के दौरान जब युद्ध में रामचन्द्र जी द्वारा रावण मार दिया गया तो रामचन्द्र पर ब्रह्महत्या का पाप लगा। अयोध्या वापस आने पर श्रीराम इस पाप के निवारण के लिये अश्वमेध यज्ञ को करने की तैयारी में जुट गये। यज्ञ शुरू हुआ तो उपस्थित सारे ऋषि मुनियों ने गुरू वशिष्ठ को कहीं नहीं देखा। वशिष्ठ राजपुरोहित थे, बिना उनके यह यज्ञ सफल नहीं हो सकता था। उस समय वशिष्ठ हिमालय में तपस्यारत थे। श्रंगी ऋषि लक्ष्मण को लेकर मुनि वशिष्ठ की खोज में निकल पडे। लम्बी यात्रा के बाद वे इसी स्थान पर आ पहुंचे। सर्दी बहुत थी। लक्ष्मण ने गुरू के स्नान के लिये गर्म जल की आवश्यकता समझी। लक्ष्मण ने तुरन्त धरती पर अग्निबाण मारकर गर्म जल की धाराएं निकाल दीं। प्रसन्न होकर गुरू वशिष्ठ ने दोनों को दर्शन देकर कृतार्थ किया। गुरू ने कहा कि अब यह धारा हमेशा रहेगी व जो इसमें नहायेगा, उसकी थकान व चर्मरोग दूर हो जायेंगे। लक्ष्मण ने गुरूजी को यज्ञ की बात बतलाई। तदुपरान्त गुरू वशिष्ठ ने अयोध्या जाकर यज्ञ को सुचारू रूप से सम्पन्न कराया।

वशिष्ठ मन्दिर लोक शैली में बना हुआ है। लकडियों पर सुन्दर नक्काशी की गई है। मन्दिर के भीतर वशिष्ठ मुनि की काले रंग की भव्य आदमकद पाषाण मूर्ति है। वशिष्ठ मन्दिर के साथ रामचन्द्र जी का प्राचीनतम भव्य मन्दिर भी कुछ ही दूरी पर है। मन्दिर परम्परागत शैली में बना है। मन्दिर में लगी परिचय पट्टिका के अनुसार लगभग 4000 वर्ष पूर्व राजा परीक्षित की मृत्यु के बाद उसका बडा पुत्र जनमेजय राजा बना। उसने पिता की आत्मा शान्ति हेतु तीर्थ यात्राएं कीं। उसने जगह जगह पर अपने कुल देवता रामचन्द्र जी के मन्दिर बनवाये व राम पंचायतें स्थापित कीं। यह मन्दिर तब का ही है।

लेख: प्रकाश पुरोहित जयदीप

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

शनिवार, दिसंबर 10, 2011

मणिकर्ण- अर्धनारीश्वर की प्रिय स्थली

मणिकर्ण तीर्थ कुल्लू घाटी का प्रसिद्धतम तीर्थ है। यहां हिन्दू और सिख दोनों बडी श्रद्धा से जाते हैं। वैसे भी देवताओं की घाटी कुल्लू अपनी प्राकृतिक सम्पदा के लिये प्रसिद्ध है। ब्यास, सरबरी, पार्वती नदियां और कई झरनें इसे सींच रहे हैं। इसी सौन्दर्य पर मुग्ध होकर देवताओं ने इसे अपना निवास बनाया होगा।

चण्डीगढ से कुल्लू जाते हुए कुल्लू से दस किलोमीटर पहले भुन्तर पडता है। यह बहुत ही खुली घाटी में बसा है। कुल्लू मनाली हवाई अड्डा यही पर है। ब्यास और पार्वती नदियों का संगम इसके सौन्दर्य को दूना कर रहा है। पार्वती के किनारे-किनारे करीब 35 किलोमीटर चलने पर मणिकर्ण आ जाता है। ब्रह्माण्ड पुराण में इस स्थल को अर्धनारीश्वर का प्रिय स्थल कहा गया है।

पार्वती के किनारे ऊंचे पर्वत और घने जंगलों के बीच संकरे मार्ग से मणिकर्ण पहुंचा जाता है। मणिकर्ण तीर्थ अपने गरम पानी के स्त्रोतों के कारण प्रसिद्ध है। इस स्थान पर करीब पच्चीस किलोमीटर क्षेत्र में जगह-जगह उष्ण जल के स्त्रोत बिखरे पडे हैं। सात हजार फीट ऊंचाई पर सघन वन के बीच यह स्थान सहज ही तीर्थ बन गया है। धन्य हैं वे वनवासी जिन्होंने इस जगह को खोजा होगा।

एक पौराणिक कथा के अनुसार मणिकर्ण स्थान पर एक बार शंकर पार्वती ने ग्यारह वर्ष तपस्या की। उस तपस्या के फलस्वरूप शंकर जी को कल्पवृक्ष की प्राप्ति हुई और पार्वती को चिन्तामणि मिली। एक दिन नदी में स्नान करते समय पार्वती के कान की मणि गिर गई। नदी की तेज धारा में बहती हुई वह मणि पाताललोक तक चली गई। पाताललोक के निवासी शेषनाग ने उसे रख लिया। शिव पार्वती के गणों ने मणि को बहुत खोजा परन्तु उन्हें नहीं मिली। तब शंकर ने क्रोधित होकर अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। सृष्टि कांपने लगी। प्रलय की आशंका से देव दानव सब भयभीत हो उठे।

इसी समय शिव के तीसरे नेत्र से एक कन्या जन्मी। यह कन्या नैना देवी नाम से प्रसिद्ध हुई। नैना देवी ने पाताललोक जाकर शेषनाग को पार्वती की मणि तुरन्त लौटाने को कहा। शेषनाग ने उसी क्षण एक तीव्र फुंकार मारी। उसकी फुंकार से चिन्तामणि के साथ साथ कई मणियां धरती के ऊपर आकर मणिकर्ण क्षेत्र में बिखर गईं। वे मणियां चट्टानों के बीच दब गईं। तभी से इस क्षेत्र का नाम मणिकर्ण पडा और यहां लोग मणियों की खोज में आने लगे।

इस क्षेत्र में यूरेनियम, गंधक, रेडियम, नीलम और मणियों के भण्डार हैं। गंधक के कारण ही यहां गर्म जल के स्त्रोत हैं।

आजकल शिव पार्वती के इस प्रिय स्थान में एक रघुनाथ मन्दिर और एक विशाल गुरुद्वारा भी है। यहां आधुनिक सुविधाओं से पूर्ण पार्वती होटल भी खुल गया है। जीप, कार और मेटाडोर मन्दिर के द्वार तक चली जाती हैं। मन्दिर और गुरुद्वारा दोनों में भोजन और निवास की निशुल्क व्यवस्था है। जन जन का उद्धार करते 1574 विक्रमी में नानक देव इस स्थान पर आये थे। उन्हीं की पवित्र स्मृति स्वरूप यहां हरिहर घाट पर गुरुद्वारा बना है। आश्चर्य होता है इस कठिन पहाडी क्षेत्र में इतने विशाल गुरुद्वारे का निर्माण और फिर इतनी उत्तम व्यवस्था। एक हजार व्यक्ति यहां एक साथ ठहर सकते हैं और एक दिन में भोजन भी कर सकते हैं। सेवा भाव का सच्चा अर्थ यहां समझा जाता है। गर्म जल के कुण्ड मन्दिर और गुरुद्वारे दोनों में बने हैं। स्त्री और पुरुषों के लिये अलग अलग स्नान की व्यवस्था है।

मणिकर्ण के उत्तर में हरिन्द्र पर्वत है। इसकी बर्फ ढकी चोटियां चांदी सी चमकती हैं। इसी पर्वत से ब्रह्मगंगा का उदगम है। यह गंगा मणिकर्ण के पास पार्वती नदी में मिलती है। ब्रह्मगंगा की घाटी मणियों से समृद्ध मानी जाती है। मणिकर्ण से तीन किलोमीटर ऊपर रूप गंगा और 25 किलोमीटर ऊपर खीरगंगा है। खीरगंगा का पानी दुग्ध सा सफेद है। प्राचीन कथा के अनुसार खीरगंगा पार्वती के स्तनों से गिरे दूध से बनी है। खीरगंगा तक पहुंचना अत्यन्त कठिन है।

लेख: उर्मिकृष्ण

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

शुक्रवार, दिसंबर 09, 2011

कुल्लू- बुला रही है खुशनुमा घाटी

प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण हिमाचल प्रदेश भारत में ही नहीं अपितु विश्व के पर्यटन मानचित्र पर अपना स्थायी स्थान बना चुका है। इसकी नदी घाटियों में बसे नगर अथवा गांव अलौकिक अनुभूति प्रदान करते हैं। घाटियों की चर्चा आते ही कुल्लू घाटी बरबस ही सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती है। इस घाटी को देव घाटी के रूप में भी जाना जाता है। 46 किलोमीटर लम्बाई और डेढ किलोमीटर चौडाई की इस घाटी का मुख्य नगर है कुल्लू। समुद्र तल से 1200 मीटर की ऊंचाई पर ब्यास नदी के किनारे बसा कुल्लू नगर किस आगंतुक का मन नहीं मोह लेता। कुल्लू का पौराणिक ग्रंथों में कुलूत नाम से वर्णन हुआ है। यही कुलूत बाद में कुलूता या कुलान्त नाम से भी जाना गया। कुल्लू कुलूत का ही अपभ्रंश है।

खुशनुमा पहाडी ढलानों पर बसे घाटी के गांवों में सीढीनुमा फलों के बगीचों का दृश्य तो देखते ही बनता है। प्राकृतिक सौन्दर्य के अतिरिक्त कुल्लू के सेब और शालें पर्यटकों के मुख्य आकर्षणों में से एक हैं। इस क्षेत्र में जून-जुलाई के महीनों में हल्की सी गर्मी होती है। परन्तु वर्ष के शेष समय मौसम सुहावना रहता है। सर्दियों में ठण्ड बढ जाती है पर घाटी के निचले हिस्सों में बरफ नहीं पडती। परन्तु दोनों ओर की पहाडियों की चोटियां श्वेत बर्फ से ढककर गजब का आकर्षण पैदा करती हैं।

कुल्लू घाटी की अन्य विशेषताओं के अतिरिक्त यहां मनाया जाने वाला दशहरा उत्सव भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। विजयदशमी को जब अन्य स्थानों पर दशहरा सम्पन्न होता है तो कुल्लू में आरम्भ होता है। कुल्लू के दर्शनीय रघुनाथ जी के मन्दिर के साथ जुडी किंवदंती ही इस उत्सव के आरम्भ का आधार मानी जाती है। अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लोक उत्सव में घाटी के दूर-दराज के क्षेत्रों में बसने वाले गांवों के देवी देवता हिस्सा लेते हैं। रंग-बिरंगी पालकियों में सज-धजकर ये देवी देवता ग्रामवासियों के कंधों पर झूमते नाचते हुए जब आते हैं तो चिरस्मरणीय आनन्द प्रदान करते हैं। लगता है जैसे स्वर्ग ही इस धरा पर उतर आया हो।

कुल्लू घाटी में ठहरने के लिये आवास की कोई समस्या नहीं है। पर्यटन निगम के होटलों के अतिरिक्त निजी होटल भी अच्छी खासी गिनती में हैं। होटलों के अतिरिक्त पेइंग गेस्ट हाउस भी उपलब्ध रहते हैं। यों तो इन सभी स्थानों के किराये सरकार द्वारा ही निश्चित किये रहते हैं, यदि फिर भी कोई समस्या आये तो स्थानीय पर्यटन कार्यालय से सम्पर्क साध कर इसका निदान हो सकता है। जहां तक भोजन सम्बन्धी आवश्यकता का प्रश्न है, तो पंजाबी खाने से लेकर कांटीनेंटल तथा चाईनीज खाना तक आसानी से उपलब्ध हो जाता है। सडकों के किनारे चलंतु ढाबों से लेकर स्तरीय जलपान गृह भी स्थान-स्थान पर मिल जायेंगे।

इस घाटी में भ्रमण के दौरान उचित होगा कि अपने साथ हल्के कपडे ही रखे जायें। पहाडों में यदा-कदा वर्षा होने के कारण तापमान में गिरावट आने की सम्भावना बनी रहती है। एहतियात के तौर पर साथ में एकाध स्वेटर अथवा हल्की-फुल्की सी जैकेट रख ली जाये तो उचित रहेगा।

कुल्लू घाटी में प्रवेश के लिये यातायात की कोई समस्या नहीं। सडक के अतिरिक्त वायु अथवा रेल मार्ग की सहायता से भी यहां पहुंचा जा सकता है। सडक मार्ग चण्डीगढ, दिल्ली एवं देश के अन्य महत्वपूर्ण स्थानों से सीधा जुडा है। सडक मार्ग पर हिमाचल के अतिरिक्त पंजाब, हरियाणा और दिल्ली की सरकारें नियमित तौर पर बस सुविधा उपलब्ध करवाती हैं। वायु मार्ग से दिल्ली अथवा चण्डीगढ से भुन्तर नामक स्थान तक आने में परेशानी नहीं होती। रेल सुविधा मात्र चण्डीगढ अथवा पठानकोट के पश्चात जोगिन्द्रनगर तक ही उपलब्ध होती है। यात्रा चाहें किसी भी मार्ग से करें परन्तु इसे सुखद बनाने के लिये उपलब्ध आरक्षण सुविधाओं का लाभ लेने में संकोच न करें।

कुल्लू घाटी में कुल्लू नगर के अतिरिक्त अन्य पर्यटन स्थल भी हैं। अपने यात्रा कार्यक्रम में इन स्थानों के भ्रमण के लिये भी समय निश्चित कर लें। कुल्लू से 40 किलोमीटर की दूरी पर मनाली नामक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। ब्यास नदी के दायें किनारे बसा यह छोटा सा नगर अति रमणीय है। ठहरने और खाने पीने की लगभग सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। इस नगर से 2-3 किलोमीटर की दूरी पर पुराना मनाली गांव है। कहा जाता है कि ‘मनु-स्मृति’ से विख्यात मनु ऋषि के अलौकिक नौका प्रलय के बाद इसी स्थान पर आकर रुकी थी। मनु से ही यह गांव मनु-आलय से मनु-आली तक का सफर तय करने के बाद मनाली बन कर प्रसिद्ध हुआ। इस गांव के साथ लगते देवदार के घने जंगल में हिडिम्बा का मन्दिर है। यह वही हिडिम्बा है जिसका वर्णन महाभारत में भी आता है। पांडवों ने अपना अज्ञातवास इन पहाडों के आश्रय में ही बिताया था।

मनाली से थोडा ऊपर लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर ब्यास नदी के दायें किनारे प्रसिद्ध वशिष्ठ गांव है। कहा जाता है कि वशिष्ठ ऋषि ने यहां तप किया था। इसकी याद दिलवाता एक पुरातन मन्दिर भी है यहां। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक गर्म पानी के चश्मे इस गांव की विशेषता हैं। यदि कुछ अधिक रोमांच लेने की इच्छा हो तब इसी रास्ते रोहतांग दर्रे तक का सफर भी किया जा सकता है।

3978 मीटर की ऊंचाई पर लगभग एक किलोमीटर लम्बे इस दर्रे की एक खासियत तो यह है कि यहां पहुंचना आसान है। दूसरे यह गर्मियों में भी पर्यटकों को बर्फ पर खेलने का अवसर प्रदान करता है। स्कीइंग के शौकीन पर्यटकों को गर्मियों में भी सोलांग नाला नामक स्थान पर स्कीइंग करने का मौका मिल जाता है। मनाली से 51 किलोमीटर दूर रोहतांग दर्रे के दूसरी ओर लाहौल का क्षेत्र आरम्भ हो जाता है। यह दर्रा ब्यास नदी का उदगम स्थल भी है। यहीं पर स्थित ब्यास कुण्ड से पतली सी धारा के रूप में ब्यास नदी प्रवाहित होना आरम्भ करती है।

इन स्थानों का भ्रमण करने के पश्चात यदि समय हो तो वापसी ब्यास नदी के बायें किनारे से होकर करनी चाहिये। एक पक्की सडक है जो इस रास्ते मनाली को कुल्लू से जोडती है। कुल्लू पहुंचने पर बायें किनारे से नदी के उस पार जाने के लिये पुल पर से पैदल ही गुजरना पडता है। निजी वाहन से यदि सफर किया जा रहा हो तो नगर नामक स्थान से पतली-कुहल नामक स्थान पर मुख्य राजमार्ग पर मिलना पडता है।

ब्यास के बाईं ओर मनाली से छह किलोमीटर दूर एक स्थान है जगतसुख। सुरम्य पहाडियों में बसा बहुत ही लुभावना गांव। ठहरने के लिये यहां लोक निर्माण विभाग का विश्राम गृह भी है। वास्तव में यह गांव कभी कुल्लू रियासत की राजधानी भी रहा है। कुल्लू के राजवंशजों ने बारह पुश्तों तक यहां रहकर राज किया था। इसके पश्चात राजधानी नगर नामक स्थान पर स्थानांतरित कर दी गई। जगतसुख में प्राकृतिक सौन्दर्य के अतिरिक्त शिखर शैली में निर्मित पुराना शिव मन्दिर भी है। इस मन्दिर के साथ ही गायत्री देवी का मन्दिर भी है। इसके पुजारी के मुताबिक, देश भर में शायद यह अपनी किस्म का एक अलग ही मन्दिर है।

जगतसुख से 12 किलोमीटर की दूरी पर बसा है नगर, एक ऐतिहासिक गांव। कुल्लू से लगभग 27 किलोमीटर की दूरी पर। जगतसुख के बाद नगर भी कुल्लू राजवंश की राजधानी रहा है। इस कारण यहां एक पहाडी किला भी है। आजकल इस किले को पर्यटन विकास निगम एक होटल के रूप में चला रहा है। विश्व प्रसिद्ध रौरिक आर्ट गैलरी भी नगर में ही है। यह आर्ट गैलरी किले से लगभग एक किलोमीटर दूर है। इसी रास्ते में आने वाला त्रिपुरा सुन्दरी का मन्दिर भी दर्शनीय स्थलों में से एक है। निजी वाहनों में सफर करने वालों को नगर से ही अपने वाहन पतली कुहल की ओर मोड लेने चाहिये वरना उन्हें कुल्लू जाने के लिये इसी स्थान पर वापिस आना होगा।

मुख्य मार्गों के आसपास बसे होने के कारण इन स्थानों का भ्रमण बिना किसी कठिनाई के किया जा सकता है। परन्तु साहसिक एवं रोमांचक पर्यटन के लिये अलग से तैयारी करके आना होगा। ऊंचे क्षेत्रों की यात्रा से पूर्व मनाली स्थित पर्वतीय प्रशिक्षण संस्थान से सम्पर्क करना अपनी रोमांचक यात्रा को और अधिक रोमांचक करने में सहायक होगा।

कुल्लू घाटी की ओर आती एक अन्य घाटी भी है। इस घाटी का नाम है पार्वती। इस घाटी में प्रवेश के लिये भुन्तर नामक स्थान से होकर जाना पडता है। इस स्थान पर ही विमानपत्तन भी है। इस घाटी में यदि मणिकर्ण का भ्रमण न किया जाये तो सफर अधूरा ही रहता है। यहां पर गर्म पानी के बहुत से चश्मे हैं। धरती से खौलता हुआ पानी इन चश्मों से बाहर आता है। शिव पार्वती से जुडी किंवदंती को अगर इस स्थान पर आकर ही सुना जाये तो उसका अपना ही मजा है।

मणिकर्ण में रघुनाथ जी के मन्दिर के अलावा एक भव्य गुरुद्वारा भी है। लंगर के साथ साथ रात्रि विश्राम की सुविधा भी उपलब्ध होती है। इसके अतिरिक्त पर्यटन विभाग भी खाने पीने और आवास की सुविधाएं उपलब्ध करवाता है।

लेख: रमेश शर्मा

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

गुरुवार, दिसंबर 08, 2011

मलाणा- सिकन्दर की सेना से ताल्लुक

सिकन्दर को जब यह मालूम हुआ था कि भारत दुनिया का सबसे अमीर देश है और इसे सोने की चिडिया कहा जाता है तो इसे जीतने की सिकन्दर की इच्छा को मानो पंख लग गये थे। 326 ई.पू. में सिकन्दर ने भारत को जीतने के लिये कूच किया। सबसे पहले सिन्धु पार के लडाकू कबीलों ने सिकन्दर का सामना किया लेकिन सिकन्दर की सेना के सामने वे टिक न सके। इसके पश्चात सिकन्दर ने ओहिन्द के स्थान पर नावों का पुल बनाकर सिन्धु नदी को पार किया और तक्षशिला की ओर बढा।

सिकन्दर ने कई रियासतों पर अपना विजयी ध्वज फहराया लेकिन चूंकि भारत बहुत विशाल देश था और इसे फतह करने के लिये कई महीने लग सकते थे, अतः निरन्तर युद्ध से उकता चुके सिकन्दर के कई सैनिक अब अपने मूल वतन लौटने को उतावले होने लगे। परन्तु सिकन्दर का भारत विजय का हठ बरकरार था। तंग आकर सिकन्दर के कुछ सैनिकों ने उससे किनारा करके अपने मूल वतन की ओर कूच कर दिया। लेकिन घर लौटना इतना आसान नहीं था, जितना उन्होंने सोचा था। रास्ते में शिवी, क्षुद्रक, मलोई, मौशिकनोई आदि अनेक युद्धप्रिय जातियों ने इन सैनिकों को युद्ध के लिये ललकारा। लेकिन निरन्तर युद्ध से बुरी तरह थक चुके और गोला बारूद खत्म हो जाने की वजह से इन सैनिकों में अब और अधिक लडने की हिम्मत नहीं थी। इसलिये इन सैनिकों ने अपने मूल वतन वापस लौटने का विचार त्याग कर सुरक्षित स्थानों में पनाह लेने की सोची। छिपते छिपाते कुछ सैनिक पहाडी क्षेत्रों में भाग गये और दुर्गम घाटियों में बस गये।

ऐसी ही एक दुर्गम घाटी मलाणा है जहां के वाशिंदों के बारे में विद्वानों का मत है कि ये लोग सिकन्दर के सैनिकों के वंशज हैं। अपने कथन की पुष्टि में ये विद्वान मलाणा के जमलू देवता के मन्दिर के बाहर लकडी की दीवारों पर हुई नक्काशी का प्रमाण देते हैं, जिसमें युद्धरत सैनिकों को एक विशेष पोशाक और हथियारों से लैस दिखाया गया है। मलाणा वासियों की बोली भी बडी विचित्र है और ऐसी मान्यता है कि यह बोली ग्रीक भाषा से कुछ मिलती-जुलती है। इसके अलावा मलाणा वासियों के नैन-नक्श भी ग्रीक के मूल लोगों की तरह तीखे हैं। चारों ओर से ऊंची-ऊंची पहाडियों से घिरा और मलाणा नदी के मुहाने पर बसा मलाणा हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में समुद्र तल से 8640 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मलाणा पहुंचने के लिये लम्बा, कठिन और चढाईदार रास्ता नापना पडता है। गांव के आसपास पन्द्रह किलोमीटर के घेरे में कोई आबादी नहीं है। सिर्फ पेड-पौधे और जीव जन्तु ही आगन्तुक का स्वागत करते दिखते हैं।

मलाणा जाने के दो रास्ते हैं। एक मार्ग नग्गर से है और दूसरा जरी से। नग्गर से जाना हो तो तीस किलोमीटर का पैदल सफर है और रास्ते में चन्द्रखनी दर्रा लांघना पडता है। लेकिन अगर जरी होते हुए जाना हो तो पन्द्रह किलोमीटर की खडी और जोखिमपूर्ण चढाई है। मलाणा के लिये कोई तीसरा रास्ता नहीं है।

मलाणा गांव दो हिस्सों में बंटा है। ऊपरी भाग जो कि पहाडी पर स्थित है को ‘धाराबेहर’ के नाम से जाना जाता है। जबकि निचले भाग को ‘साराबेहर’ कहा जाता है। गांव के बीच पडने वाले भूभाग को ‘हरचा’ कहा जाता है। हरचा एक ऐसा केन्द्र बिन्दु है जिसके इर्द गिर्द मलाणा की सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और न्यायिक गतिविधियां केंद्रित हैं। मलाणा गांव में सवा सौ घर हैं और आबादी होगी कोई हजार बारह सौ के करीब। मलाणा के अधिकांश घर लकडी के बने हैं और छतों पर स्लेटों की जगह कहीं कहीं लकडी के फट्टों का इस्तेमाल किया गया है। कई घर तीन-तीन मंजिले भी हैं, जिनमें निचली मंजिल में पशु बांधे जाते हैं और ऊपरी मंजिलों में लोग रहते हैं।

मलाणा से जुडा एक अजूबा यह है कि यहां विश्व की सबसे पुरानी लोकतान्त्रिक व्यवस्था मौजूद है। भारतीय गणराज्य का एक अंग होते हुए भी मलाणा की अपनी एक अलग न्यायपालिका और कार्यपालिका है। भारत सरकार के कानून यहां नहीं चलते। इस गांव की अपनी अलग संसद है, जिसके दो सदन हैं- ज्येष्ठांग (ऊपरी सदन) और कनिष्ठांग (निचला सदन)। ज्येष्ठांग में कुल 11 सदस्य होते हैं। जिनमें तीन सदस्य कारदार, गुर व पुजारी स्थायी सदस्य होते हैं। शेष आठ सदस्यों को गांववासी मतदान द्वारा चुनते हैं। इसी तरह कनिष्ठांग सदन में गांव के प्रत्येक घर से एक सदस्य को प्रतिनिधित्व दिया जाता है। यह सदस्य घर का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति होता है।

दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही सदनों में गांव की किसी महिला को प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता और इनमें पुरुषों का ही वर्चस्व होता है। अगर ज्येष्ठांग सदन के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाये तो पूरे ज्येष्ठांग सदन को पुनर्गठित किया जाता है। इस संसद में घरेलु झगडे, जमीन-जायदाद के विवाद, हत्या, चोरी और बलात्कार जैसे मामलों पर सुनवाई होती है और दोषी को सजा सुनाई जाती है। संसद भवन के रूप में यहां एक ऐतिहासिक चौपाल है जिसके ऊपर ज्येष्ठांग सदन के 11 सदस्य और नीचे कनिष्ठांग सदन के सदस्य बैठते हैं। अगर संसद किसी विवाद का निपटारा करने में विफल रहती है तो मामला स्थानीय देवता जमलू के सुपुर्द कर दिया जाता है और इस मामले में देवता का निर्णय अन्तिम व मान्य होता है।

जमलू देवता द्वारा फैसला सुनाए जाने की प्रक्रिया भी बडी विचित्र है। इस प्रक्रिया के तहत दोनों पक्षों को एक-एक बकरा लाने को कहा जाता है। फिर दोनों बकरों की टांग चीरकर उसमें जहर भर दिया जाता है। जिसका बकरा पहले मर जाये, वही पक्ष दोषी माना जाता है और उसे सजा कबूल करनी पडती है। देवता के निर्णय को चुनौती देने की हिम्मत कोई नहीं करता और न ही देवता के फैसले के खिलाफ कोई अदालत में जाने की जुर्रत करता है। अगर कोई देवता के फैसले का अपमान करे तो मलाणावासी उसका सामाजिक बहिष्कार कर देते हैं। यहां आने वाले आगन्तुक को देवता की तरफ से दो समय की खाद्य सामग्री व रहने का स्थान दिया जाता है। इस कार्य के लिये चार आदमी तैनात होते हैं, जिन्हें ‘कठियाला’ कहा जाता है।

मलाणा के सामाजिक संस्कार भी बडे विचित्र हैं। एक परम्परा है- बच्चे को जन्म देते समय स्त्री को घर से बाहर एक तम्बू में नवजात शिशु संग पन्द्रह दिन तक रहना पडता है। भले ही बाहर कई-कई फुट मोटी बर्फ की तहें जमी हों। इस अवधि में कोई भी व्यक्ति जच्चा और बच्चा को नहीं छू सकता। यदि कोई गलती से छू जाये तो उसे भी 15 दिन तक बाहर इनके साथ ही रहना पडता है। सोलहवें दिन घर में लिपाई-पुताई करने के बाद ही इन्हें घर के अन्दर प्रवेश दिलाया जाता है।

मलाणा में किसी की मृत्यु होने पर तीन दिन तक शोक मनाया जाता है। अगर कोई महिला विधवा हो जाये तो वह एक साल तक जेवर नहीं पहनती और उल्टी टोपी पहनती है। इस अवधि के बाद अगर वह दूसरा विवाह करना चाहे तो कोई रोक-टोक नहीं है। एक वक्त था जब इस गांव के लडके-लडकियों की शादियां गांव की चाहरदीवारी के अन्दर ही होती थी, लेकिन अब यह परिपाटी बदल रही है। मलाणावासी गांव से दस किलोमीटर दूर रशोल गांव से भी लडकियां ब्याह कर लाने लगे हैं। लेकिन मलाणा समाज में औरत की वही स्थिति है जितनी मुस्लिम समाज में। यानी वैवाहिक जीवन में उसे उसका पति कभी भी तलाक दे सकता है। अगर मर्द ने कह दिया कि घर से बाहर निकल जाओ तो फिर उस घर के दरवाजे औरत के लिये बन्द हो जाते हैं।

लेकिन दूसरी तरफ यह भी एक अकाट्य सत्य है कि मलाणा की पूरी अर्थव्यवस्था यहां की मेहनतकश महिलाओं के कन्धों पर ही टिकी हुई है। मीलों पैदल चलकर बाजार से सामान लाने, खेत-खलिहान से लेकर चौका-चूल्हा संभालने के सारे दायित्व महिलाएं ही निभाती हैं।

लेख: गुरमीत बेदी

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

बुधवार, दिसंबर 07, 2011

किन्नौर- प्रकृति की सुन्दर कृति

प्राकृतिक छटा के लिये प्रसिद्ध हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से लगभग 190 किलोमीटर की दूरी पर स्थित, संसार की दृष्टि से सदियों से अब तक बची हुई, जो कि अभी कुछ वर्ष पूर्व तक कुछ सीमित लोगों द्वारा देखी जा सकती थी, हिमालय पर्वत की श्रंखला में आदिवासियों की सभ्यता संजोये हुए यही किन्नौर घाटी अब जन साधारण के लिये खोल दी गई है। यह घाटी पूर्व में तिब्बत, पश्चिम में कुल्लू घाटी, उत्तर में स्पीति घाटी एवं दक्षिण में गढवाल से घिरी हुई है। बहुत ऊंचाई पर होने के कारण यहां ठण्ड रहती है अर्थात ग्रीष्म ऋतु का समय बहुत ही कम रहता है। अधिक सर्दी होने पर यहां के निवासी कुछ निचले स्थानों पर आ जाते हैं। लगभग सारा क्षेत्र ऊंचा नीचा होने के कारण उपजाऊ नहीं है। लद्दाख की भांति यहां भी बहुत कम वर्षा होती है।

किन्नौर घाटी तिब्बत के पास होने के कारण यहां के लोगों की जीवन शैली पर बौद्ध धर्म का काफी प्रभाव देखने को मिलता है। यद्यपि मूलतः लोग हिन्दू ही हैं। यहां घाटी में लगभग हर गांव में मन्दिर या गोम्पा (बौद्ध स्थल) हैं। किन्नौरी लोग स्वभाव से भोले, धार्मिक एवं ईमानदार हैं। यहां बहु-पति प्रथा आज भी कायम हैं। शायद इसी वजह से यहां की आबादी नियन्त्रण में है। सतलुज नदी जोकि तिब्बत में मानसरोवर क्षेत्र से निकलती है, इसी घाटी से अपना सफर तय करती हुई मैदानी इलाकों में पहुंचती है। किन्नौर में इस नदी के साथ दो संगम, प्रथम खाबो में स्पीति नदी से, दूसरा कडछम में बस्पा नदी से, प्रसिद्ध हैं। भारत-तिब्बत मार्ग किन्नौर घाटी से ही होकर निकलता है।

प्रकृति की इस खूबसूरत घाटी को देखने का शुभारम्भ पुरातन ‘रामपुर बुशहर’ रियासत की राजधानी रामपुर से होता है। यह ट्रैकिंग करने वालों का भी प्रथम पडाव है। यहां का लवी मेला बहुत प्रसिद्ध है, जो 11 से 14 नवम्बर तक लगता है। यहां से श्रीखण्ड महादेव चोटी (5155 मीटर) के दर्शन किये जा सकते हैं। पूरी चोटी की परिक्रमा भी 7-8 दिन में की जा सकती है। इससे आगे सराहन का भीमाकाली मन्दिर पहाडी कला की मुंह बोलती तस्वीर है। किसी समय यहां पर भगवान को प्रसन्न करने के लिये नर बलि दी जाती थी, आजकल बकरे की बलि दी जाती है। पुजारियों के अनुसार अब यह बलि मन्दिर के बाहर ही दी जाती है।

यहां श्री रघुनाथ जी, श्री नरसिंह जी और श्री लांकडा वीर जी की तीन मूर्तियां स्थापित हैं। इस मन्दिर का निर्माण राजशाही द्वारा 200 वर्ष पूर्व किया गया था। मन्दिर में ठहरने के लिये बहुत ही बढिया सराय बनी हुई है तथा एक अन्य का निर्माण कार्य चल रहा है। यहां हिमाचल पर्यटन का होटल श्रीखण्ड बहुत ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत करता है।

वापस ज्यूरी आने पर तीन किलोमीटर की दूरी पर किन्नौर घाटी का आरम्भ चौरा (1638 मीटर) गांव से होता है। यहां पर श्री तरगडा देवी जी का मन्दिर है, जिसका निर्माण भारत-तिब्बत मार्ग निर्माण के समय हुआ था।

भाभा नगर: रामपुर से 35 किलोमीटर की दूरी पर पूरी तरह पहाडों के अन्दर बना भाभा विद्युत केन्द्र 120 मेगावाट विद्युत पैदा करता है। इसमें 40 मेगावाट की तीन चक्कियां लगी हुई हैं। यह 8 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और पूरी तरह स्वचालित है।

सांगला/ बस्पा घाटी: राष्ट्रीय राजमार्ग पर कडछम से 18 किलोमीटर की दूरी पर किन्नौर की सबसे सुन्दर घाटी है। यह रास्ता बहुत छोटा है और डरावना भी है क्योंकि यहां बहुत ही गहरी खाईयां हैं। पूरी किन्नौर घाटी में सांगला क्षेत्र हरा-भरा है। यह घाटी देखने के बाद यही रहने को मन करता है। यहां का सेब बहुत प्रसिद्ध है। यहां बादाम एवं केसर की भी खेती होती है। इसी रास्ते में कामरू गांव बहु-पति प्रथा के लिये आज भी प्रसिद्ध है। छितकुल (3435 मीटर) इस मनोहर घाटी का अन्तिम गांव है। यह स्थान तो परीलोक लगता है। यहां से कुछ किलोमीटर पर भारत-तिब्बत सीमा आरम्भ हो जाती है।

कल्पा/ रिकांगपियो: किन्नौर जिले के प्रशासनिक कार्यालय रिकांगपियो (2290 मीटर) में हैं। यह स्थान राजमार्ग पर स्थित पवारी से 7 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां से कल्पा (2960 मीटर) सात किलोमीटर पर है। देवदार के वृक्षों से ढका यह रास्ता बहुत सुन्दर है। कल्पा भी इस घाटी के सुन्दरतम स्थानों में से एक है। इस मनोरम स्थान से किन्नौर कैलाश (6000 मीटर) के साफ दर्शन किये जा सकते हैं। इस चोटी के बार-बार रंग बदलते दिखाई देते हैं, ऐसा मौसम बदलते ही होता रहता है। यहां परिधि गृह से ये दृश्य सहज ही देखे जा सकते हैं। यहां से कुछ दूरी पर पांगी, मूरंग और केनम आदिवासी गांव हैं जिनमें पूर्णतः उनकी प्राचीन सभ्यता देखी जा सकती है।

पवारी से 16 किलोमीटर की दूरी पर टिब्बा अंगूरों के लिये प्रसिद्ध स्थान है। यहां अंगूरों के बडे बाग हैं। यहीं से दस किलोमीटर दूरी पर मूरांग क्षेत्र है, जहां खुरमानी की खेती होती है। मूरांग से 32 किलोमीटर पर पूह नगर है। यह नगर पूरी तरह आधुनिक सुविधाओं से युक्त है।

खाबो/ नाको/ समदू: खाबो (2831 मीटर) में सतलुज एवं स्पीति नदियों का सुरम्य स्थल है। यहां से सतलुज तिब्बत की ओर हो जाती है जबकि स्पीति नदी आगे साथ-साथ चलती है। नाको (2950 मीटर) एक अलग ही किस्म का गांव है, जहां एक बहुत ही सुन्दर झील है। यहां टेण्ट लगाकर रहने में बहुत आनन्द मिलता है। समदू किन्नौर घाटी का अन्तिम गांव है, जहां स्पीति और परी-धू नदी का संगम होता है। यहां से स्पीति घाटी आरम्भ हो जाती है।

लेख: सुनील जैन

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

मंगलवार, दिसंबर 06, 2011

कसोल- हर मधुर कल्पना जहां यथार्थ रूप लेती है

चांदी सी चमचम करती बर्फ से ढकी बुलन्द पहाडों की गोदी में रचता-बसता हो एक छोटा सा दिलकश गांव, ठीक बगल में बहती हो इठलाती इक नदिया, नदिया के किसी एक किनारे पर बना हो कुदरती गर्म पानी का छोटा सा कुण्ड, आजू-बाजू हो हरा भरा उद्यान, उस उद्यान में झूलते हों एक से बढकर एक मौसमी फूल और पत्ते, आसपास ही बनी हो सैलानियों की रिहाइशी ‘हट्स’, वहीं सुबह शाम अक्सर दिखाई दे जाये भेड-बकरियों का लम्बा काफिला और न जाने कब पहाडों को नीचे तक छूने चले आयें गोरे, काले, सलेटी बादल....

नाम है कसोल जो हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले से महज 35 किलोमीटर के फासले पर है। ऊंचाई है करीब पांच हजार फीट। यहां न दिल्ली या मुम्बई जैसी उमस है, न कुल्लू शहर जैसी रेलमपेल। कुछ है तो बस सादगी।

कहने को तो कसोल 30-35 घरों का छोटा सा गांव है लेकिन प्रकृति ने खुले दिल से उस पर खूबसूरती की बरखा की है। चारों तरफ जिधर भी नजर जाती है, प्रकृति एक नये रंग, रूप और साज-सिंगार के साथ हर सैलानी की अगवानी करती प्रतीत होती है। नदियां, पहाड, कद्दावर पेड, फल-फूल, नर्म मुलायम घास, वन्य जीवन और मिलनसार लोग- क्या कुछ नहीं है शहरी तनातनी से सुकून चाहने वाले इंसान को अपनी ओर खींचने वाले कसोल में।

कसोल कुल्लू और मणिकर्ण के बीच स्थित है। कुल्लू या मनाली से मणिकर्ण जाने वाली हर बस कसोल रुकती है, सो बहुत आसान है कसोल पहुंचना। सीधे सडक सम्पर्क के कारण यह गांव तेजी से पर्यटक स्थल के रूप में विकसित होता जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि सर्दियों में मनाली वगैरह में बर्फ के कारण सडकें भले ही कई-कई दिनों के लिये बन्द पडी रहें लेकिन कसोल का रास्ता हमेशा खुला रहता है। अतः सालभर यहां सैलानियों की आवाहाजी लगी ही रहती है।

बस से उतर कर बायीं ओर प्रस्थान करें तो भागमभाग की जिन्दगी से दूर एक शान्त वातावरण में पहुंचने का रोमांचक एहसास होता है। सामने ही एक ओर ‘कसोल फारेस्ट हाउस’ की तरतीब से बनी हुई टूरिस्ट हट्स हैं और बगल में ही दिखाई दे जाते हैं कुछ उद्यमी सैलानियों या ट्रेकरों द्वारा गाडे हुए रंग-बिरंगे टेंट जो बरबस ही नजर खींच लेते हैं। आगे चलें तो इस क्षेत्र की आत्मा समझी जाने वाली पार्वती नदी अपने पूरे उफान के साथ बहती नजर आती है। कद्दावर, घने देवदार के पेड और ऊपर आसमान से बातें करतीं बुलन्द चोटियां दिखाई देती हैं, जो सुबह की पहली किरण पडते ही स्वर्णिम रंग बिखेरती प्रतीत होती हैं।

हर रुचि के सैलानी के लिये कसोल के झोले में सामान मौजूद है। खासकर वन्य जीवन में रुचि रखने वालों के लिये कसोल तो जैसे खजाना है। राज्य के वन्य विभाग द्वारा जहां ‘कनवार वन्य जीवन अभयारण्य’ (सेंचुरी) विकसित किया गया है। कसोल से ग्राहण की ओर पैदल चलिये तो रास्ते में आपको लम्बी पूंछ वाली कई रंग बिरंगी पहाडी चिडियाएं मिलेंगीं। यहीं जंगल की खामोशी को तोडता नजर आ जायेगा हिमाचल प्रदेश का राज्य पक्षी मोनाल। हिम्मत और साहस करके और आगे घने जंगल की छानबीन करें तो वहां काले भालू, भूरे भालू, कस्तूरी मृग वगैरह के दर्शन का भी सौभाग्य प्राप्त हो सकता है। जंगल में वन्य जीवन की खोज व अध्ययन के इच्छुक लोगों की रिहाइश के लिये वन विभाग ने सज्जित इंस्पेक्शन हट्स भी बना रखी हैं जिनका किराया बहुत ही नाममात्र का है।

अगर आपकी रुचि धार्मिक पर्यटन में है तो पहुंचिये मणिकर्ण जो कसोल से महज चार किलोमीटर दूर है। पैदल या वाहन से कैसे भी जा सकते हैं। यहां पार्वती नदी के ठीक किनारे पर स्थित है वह पवित्र ऐतिहासिक गुरुद्वारा जहां एक ही छत के नीचे मन्दिर भी है। अतीत में किसी समय श्री गुरुनानक देव जी और उनसे पूर्व शिव पार्वती यहां पधारे थे। सो उनकी याद में निर्मित है यह गुरुद्वारा जो सर्वधर्म समभाव की अदभुत मिसाल है।

पर्वतारोहण या ट्रेकिंग के शौकीन व्यक्तियों के लिये बेस कैम्प यानी आधार शिविर का काम करता है कसोल। यहां से शुरू होकर भी आप चन्द्रखनी दर्रे (13000 फीट) या सरपास दर्रे (14000 फीट) तक जाकर उन्हें छूने या फतह करने का रोमांचक अनुभव हासिल कर सकते हैं।

यूं तो कसोल घूमने के लिये साल का कोई भी महीना उपयुक्त है। लेकिन खासकर वन्य जीवन के अध्ययन में रुचि रखने वालों के लिये अक्टूबर से मार्च का समय बेहतरीन माना जाता है, क्योंकि इस दौरान उन्हें अधिकांश वन्य जीव एक साथ देखने को मिल जाते हैं। इस क्षेत्र में ट्रेकिंग के लिये गर्मियों का मौसम ज्यादा उपयुक्त है।

लेख: जगजीत सिंह

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

सोमवार, दिसंबर 05, 2011

खतरनाक भी है बर्फीला मणिकर्ण

दिल्ली से मणिकर्ण जाने वाले ट्रेकिंग ग्रुप में हमारे विद्यालय के दस बच्चों में मेरा नाम भी काफी प्रयासों के बाद आखिर चुन ही लिया गया। वैसे तो हमारे विद्यालय का ट्रेकिंग दल हमेशा ही कहीं न कहीं जाता रहता है पर इस बार हमारे शारीरिक शिक्षक राजकुमार जी के हमारे दल के साथ जाने से सभी छात्रों में विशेष उत्साह था क्योंकि वह ट्रेकिंग के बारे में सब शिक्षकों से अधिक जानकारी रखते थे।

हमारी औपचारिक यात्रा कुल्लू से ही शुरू हो गई थी जहां से मणिकर्ण लगभग 40 किलोमीटर दूर है। कुल्लू हिमाचल प्रदेश का एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। जहां से टेढे मेढे रास्तों और दुर्गम चढाई के बाद हमें मणिकर्ण पहुंचना था। लगभग 10000 फीट की ऊंचाई पर ढाडी गुफा पर भी हम ठहरेंगे। हमारे सर ने बताया कि यह वही गुफा है जहां कभी गुरू नानक ठहरे थे। इसके बाद हम शांगडा गांव होते हुए तोशी गांव पहुंचेंगे और फिर मणिकर्ण ग्लेशियर।

कहते हैं कि मणिकर्ण का पुराना नाम अर्द्धनारी है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार शिव अर्द्धनारी के रूप में यहां नहा रहे थे कि पार्वती के कान की मणि नदी में गिर गई और पाताल में चली गई। शिव ने प्रकृति में सबसे पूछा लेकिन कोई न बता पाया कि मणि कहां गई। इस पर शिव को क्रोध आ गया और उन्होंने तीसरी आंख खोल दी। तब नैना देवी प्रकट हुई और उन्होंने मणि ढूंढने का जिम्मा उन्हें सौंपा। नैना देवी पाताल से लाखों मणियां उठा लाई और पार्वती से अपनी मणि ढूंढने को कहा। पार्वती ने अपनी मणि ढूंढ ली लेकिन लोगों के लालच के डर से बाकी मणियों को पत्थर बना दिया। तभी से इस स्थान का नाम मणिकर्ण पड गया।

इसी स्थान पर शिव पार्वती ने अर्द्धनारी के रूप में 1100 वर्ष तक तपस्या की। मणिकर्ण में ही पार्वती नदी बहती है जो मानतलाई से लगभग 100 किलोमीटर की यात्रा करके यहां पहुंचती है। पार्वती नदी के किनारे किनारे महत्वपूर्ण खनिज अयस्कों की खानें हैं। मणिकर्ण में भी पानी प्राकृतिक रूप से गर्म है क्योंकि इसके नीचे सल्फर बहुतायत में पाया जाता है।

हम खतरनाक रास्तों से होते हुए बर्फीली चोटियों को देखते हुए सावधानी से आगे बढ रहे थे। कई जगह हमें खतरनाक ‘रोलिंग स्टोन जोन’ क्षेत्रों से भी गुजरना पडता था। लेकिन हमारे सर इस दुर्गमता में हमारा साहस बढाते रहते थे। मणिकर्ण से मणिकर्ण ग्लेशियर के रास्ते तक ढेरों चीड और देवदार के पेड हैं। जैसे जैसे मणिकर्ण ग्लेशियर पास आता जा रहा था हमारी उतावली भी बढती जा रही थी। हमारा सफर अब दुर्गम व रास्ता भी बर्फीला हो चला था क्योंकि तोश गांव के बाद हम ग्लेशियर पहुंचने वाले थे। ऊपर पहुंचने के साथ साथ ठण्ड भी बढने लगी थी और हवा के तेज थपेडे हमें लगातार पीछे धकेल रहे थे। बीच बीच में कई छोटे बडे झरने भी हमें रोक लेते थे।

एकाएक मेरा एक साथी तेज आवाज में चिल्लाया ‘बस, अब 100 मीटर चलने के बाद हम ग्लेशियर पर होंगे।’ दरअसल वह पहले भी यहां आ चुका था। उसने हमें बताया कि ग्लेशियर वास्तव में बर्फ की गति से बहने वाली नदी को कहते हैं जिसमें समय-समय पर एवलांव होते रहते हैं। एवलांच पहाडों से ढेरों बर्फ नीचे लुढक आने वाली एक खतरनाक प्रक्रिया है। अचानक हमारे सर हमें रोक देते हैं और अपने सामने देखने को कहते हैं। हम ऊपर देखते हुए चल रहे इसलिये हमारे पैर कब बर्फीले रास्तों पर पडने लगे थे, हमें पता ही नहीं चला था।

हमारे सामने बर्फ का विशाल लम्बा मैदान था जो दूर तक घाटी बनाता हुआ फैला था। यही मणिकर्ण ग्लेशियर है जिसे देखने के लिये हम हजारों फीट ऊंची दुर्गम चढाई चढकर यहां पहुंचे थे। हमारे चेहरों पर आश्चर्य फैला था और आंखें अचरज से सामने बर्फ की ऊंची विशाल दीवारों पर टिकी थीं। मानों वे ग्लेशियर की प्रहरी हों। दूर तक फैले ग्लेशियर में जगह जगह क्रेवास बने थे इसलिये हम सब एक सुरक्षित स्थान पर समूह बनाकर बैठे थे। क्रेवास दरअसल बर्फ के ग्लेशियर में पडी उन दरारों को कहते हैं जिनके नीचे गहराई पर पानी होता है और कई बार असावधानी बरतने पर ट्रेकिंग दल के लोग उसमें गिर कर मर भी जाते हैं।

ग्लेशियर पर आये हुए हमें लगभग एक घण्टा हो चला था और मौसम खराब होने लगा था। बारिश कभी भी हो सकती थी और बर्फ गिरने का भी कोई भरोसा नहीं था। हम वापस लौट पडे क्योंकि अभी हमें बेस कैम्प लौटना था जहां एक अन्य ट्रेकिंग दल हमारा इंतजार कर रहा था।

यात्रा वृत्तान्त: जीशान हुसैन खान

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

रविवार, दिसंबर 04, 2011

हिमानी जल से फूटते हैं गर्म फव्वारे

प्रकृति ने न केवल हिमाचल में दिल खोलकर अपना नैसर्गिक सौन्दर्य लुटाया है बल्कि इसे खूबसूरत झीलों, नदियों, झरनों व गर्म जल के चश्मों से संवारने में भी कोई कसर नहीं छोडी है। हिमाचल आया सैलानी अगर यहां के दिलकश, लुभावने दृश्यों से अभिभूत हो उठता है तो यहां के प्राकृतिक स्रोत उसे नई स्फूर्ति से भर देते हैं। ये प्राकृतिक स्रोत सैलानी के लिये कौतूहल का विषय भी हैं और श्रद्धा के प्रतीक भी। ऐसे ही प्राकृतिक स्रोतों में हिमाचल के गर्म जल के चश्मों को गिना जा सकता है।

हिमाचल में दस के करीब गर्म जल के चश्में हैं, जिनमें मणिकर्ण, वशिष्ठ, तत्तापानी, ततवाणी, कसोल और ज्यूरी के चश्में मशहूर हैं। इन चश्मों का जल न केवल स्वास्थ्यवर्धक है, बल्कि इन चश्मों के साथ कई धार्मिक कथाएं भी जुडी हैं। श्रद्धालु इन चश्मों में स्नान करने भी आते हैं और श्रद्धा से नतमस्तक होने भी। ये सभी चश्में अत्यन्त खूबसूरत स्थलों पर स्थित हैं।

शिमला व मण्डी जिले की सीमाओं को जोडती सतलुज नदी के किनारे गर्म पानी के चश्मों का सुरम्य स्थल तत्तापानी नाम से है, जो समुद्र तल से 656 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। सतलुज नदी में एक तरफ बहता हिमानी जल और नदी के किनारे दो सौ मीटर लम्बे क्षेत्र में भूगर्भ से फूटते गर्म जल के स्रोत सैलानी को आश्चर्य में डाल देते हैं। सतलुज नदी में पानी की मात्रा बढने के साथ साथ ये चश्में भी ऊपर की ओर आ जाते हैं।

यहां गर्म जल के चश्में फूटने के बारे में एक रोचक किंवदंती प्रचलित है। कहा जाता है कि यह क्षेत्र महर्षि जमदग्नि की तपोभूमि रहा है। एक बार ऋषि जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने तपस्या के लिये हिमालय पर जाते समय अपने पिता से आग्रह किया था कि अगर उन्हें कोई संकट आये तो वह उसे (परशुराम को) याद कर लें। कहा जाता है कि परशुराम के जाने के बाद महर्षि जमदग्नि को अकेला पाकर सुन्नी रियासत के राजा ने परेशान करना शुरू कर दिया। हारकर ऋषि जमदग्नि ने अपने बेटे परशुराम का स्मरण करना पडा। परशुराम उस समय कुल्लू घाटी स्थित मणिकर्ण के चश्में मंम स्नान कर रहे थे। जैसे ही उन्हें अपने पिता पर आई विपत्ति का आभास हुआ, वह स्नान अवस्था में ही तत्तापानी पहुंच गये। वहां जैसे ही उन्होंने अधोवस्त्र निचोडे, पानी की बूंदें नीचे टपकने से यहां गर्म पानी के चश्में फूट पडे। इस स्थल के बारे में श्रद्धालुओं में बहुत मान्यता है और प्रथम माघ को यहां भारी मेला भी लगता है। यात्रियों के ठहरने के लिये राज्य के पर्यटन विभाग ने यहां सरायों का निर्माण भी कराया है।

कुल्लू की पार्वती घाटी में स्थित मणिकर्ण के गर्म जल के चश्मों को देखने के लिये शायद सर्वाधिक पर्यटक उमडते हैं। यहां गर्म जल फव्वारों के रूप में फूटता है। ये चश्में पार्वती नदी के दाहिने छोर पर स्थित हैं। वैज्ञानिक आज तक इस बात पर आश्चर्यचकित हैं कि पार्वती नदी में बहता जल जहां बर्फ की तरह ठण्डा है, वहीं इस नदी से ही उबलता जल कैसे फूट रहा है? इस जल का तापमान 95 डिग्री के करीब है। कहा जाता है कि शरीर के चर्म रोग, यहां तक कि गठिया भी यहां के पानी में कुछ दिन स्नान करने से ठीक हो जाता है। यहां गर्म जल के स्रोत कैसे फूटे, इस बारे में एक रोचक किंवदंती प्रचलित है।

कहा जाता है कि कालान्तर में भगवान शिव, पार्वती के साथ टहलते हुए इन पहाडियों में पहुंचे। यहां का वातावरण उन्हें इतना पसन्द आया कि वे यहीं तपस्या में लीन हो गये। उधर एकाकीपन से उकताकर पार्वती एक दिन पास ही बह रही नदी में उतर गई और जलक्रीडा करते हुए अपना दिल बहलाने की कोशिश करने लगी। तभी उनके कान की एक दुर्लभ मणि पानी में गिर गई और सीधे पाताल में शेषनाग के पास जा पहुंची। पार्वती ने मणि को ढूंढने की बहुत कोशिश की और अंत में थककर उदास सी एक चट्टान पर जा बैठी। शाम जो जब भगवान शिव की समाधि टूटी और उन्हें पार्वती के दुखी होने का कारण मालूम हुआ तो उन्होंने अपने गणों को तुरन्त मणि ढूंढ निकालने का आदेश दिया। गणों ने नदी का चप्पा चप्पा छान मारा लेकिन उन्हें मणि नहीं मिली।

भगवान शिव को गणों की असफलता का पता चला तो वे क्रोधित हो उठे। उनके नेत्रों से ऐसी चिंगारियां निकलने लगी कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कम्पायमान हो उठा। यही आंच जब पाताल में शेषनाग ने महसूस की तो वह तुरन्त भगवान शिव की नाराजगी का कारण समझ गये। उन्होंने शिवजी को प्रसन्न करने के लिये फुंकार मारी, जिसकी आंच से यहां का पानी गर्म हो गया और पृथ्वी के गर्भ से फव्वारे फूटने लगे। उन फव्वारों के साथ ही पार्वती की मणि भी बाहर आ गई। इस प्रकार इस स्थल का नाम मणिकर्ण पडा और यहां बहने वाली नदी को पार्वती के नाम से जाना जाने लगा। उस दिन से यहां गर्म जल के फव्वारे फूट रहे हैं। पार्वती नदी के साथ ही एक भव्य गुरूद्वारा और भगवान राम का प्राचीन मन्दिर भी है। गुरुद्वारे के भूतल और मन्दिर के प्रांगण में स्नानगृह बने हुए हैं, जहां गर्म पानी के कुण्ड हमेशा भरे रहते हैं। इन दोनों धर्मस्थलों में श्रद्धालुओं के आवास व लंगर की सुविधा है।

कुल्लू घाटी में गर्म जल का एक और चश्मा मनाली से 6 किलोमीटर दूर वशिष्ठ में है। इस जल का तापमान 53 डिग्री के करीब है और यह जल अत्यन्त स्वास्थ्यवर्द्धक भी है। वशिष्ठ गांव में कई जगह गर्म जल के चश्में हैं। हिमाचल पर्यटन निगम ने गर्म पानी को पाइप द्वारा नीचे लाकर पर्यटकों के लिये स्नान करने की व्यवस्था भी कर रखी है। महर्षि वशिष्ठ के मन्दिर के अन्दर भी चश्में का गर्म पानी रोककर महिलाओं व पुरुषों के लिये अलग-अलग स्नान कुण्ड बनाये गये हैं। कहा जाता है कि महर्षि वशिष्ठ यहां गर्म जल मणिकर्ण से लाये थे। यहां के चश्मों में स्नान करने के लिये वर्ष भर पर्यटक उमडते हैं।

मनाली से केवल सात किलोमीटर दूर क्लाथ में भी गर्म जल के चश्में हैं। यहां के जल का तापमान 25 से 45 डिग्री के आसपास है। यहां का जल अत्यन्त स्वास्थ्यवर्द्धक है। कहा जाता है कि इस जल के सेवन से कई असाध्य बीमारियां भी ठीक हो जाती हैं।

जिला कांगडा में बैजनाथ से करीब बीस किलोमीटर दूर तत्तापानी के नाम से मिलता-जुलता ततवाणी नामक गर्म जल का चश्मा है। चारों ओर से बर्फीली पहाडियों से घिरा यह स्थल लूणी नदी के किनारे पर है। इस स्थल पर पहुंचने के लिये कुछ पैदल भी चलना पडता है। यहां का पानी इतना गर्म है कि अगर चावल पोटली में बांधकर कुछ मिनट पानी में रखे जायें तो वे पूरी तरह पक जायेंगे। यह जल गंधकयुक्त भी है। लोगों में मान्यता है कि इस जल से स्नान करने पर शरीर की अनेक व्याधियां दूर हो जाती हैं। निर्जला एकादशी के दिन यहां बहुत बडा मेला लगता है और दूर दराज से सैंकडों श्रद्धालु यहां स्नान करने उमडते हैं।

शिमला जिले में रामपुर बुशैहर से आगे ज्यूरी के पास भी गर्म जल के चश्में हैं।

लेख: गुरमीत बेदी
सन्दीप पंवार के सौजन्य से

शनिवार, दिसंबर 03, 2011

भरमौर- विश्व का एकमात्र धर्मराज का मन्दिर

बहुत दिनों से सुन रखा था कि इसी भारत के अन्दर किसी महत्वपूर्ण शिवधाम के करीब धर्मराज का कोई मन्दिर है। इंसान की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा सबसे पहले इसी मन्दिर में जाती है और वहीं पर उसके कर्मों के अनुसार उसे अगले जन्म में प्रवेश मिलता है। हिमाचल में सिद्धों की तपस्थली भरमौर की ‘चौरासी’ में स्थित है यह मन्दिर। गत दिनों जब हम भरमौर स्थित मन्दिर ‘चौरासी मन्दिर’ गये तो एक साधु ने हमें मन्दिर के बारे में बताया। हम अनेक प्रश्नों को मन में लिये जब मन्दिर में गये तो वहां का सारा माहौल देखकर भयमुक्त हो गये मगर अनेक प्रश्नों के घेरे में आ गये, जिनका उत्तर ढूंढने का प्रयास किया।

श्री धर्मेश्वर महादेव (धर्मराज) के इस विश्व भर में अकेले मन्दिर की कथा बताते हुए मन्दिर के श्री लक्ष्मी दत्त पुजारी, जो इस महत्वपूर्ण स्थल की देख-रेख करते हैं, ने बताया कि जिस प्रकार पुष्कर राज में ब्रह्मा जी का मन्दिर विश्व का एकमात्र मन्दिर है, उसी प्रकार धर्मेश्वर जी महाराज का यह एकमात्र मन्दिर है।

हमने जब इस मन्दिर में प्रवेश किया तो बाहर से यह मन्दिर लगा ही नहीं। घर जैसा प्रतीत होने का कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि इस चौरासी में सबसे कम लोग यहां आते हैं। ज्यादातर लोग बाहर से ही लौट जाते हैं। मन्दिर में प्रवेश द्वार पर बने एक कमरे को दिखाते हुए उन्होंने बताया कि जब संसार में कोई भी व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त होता है तो वह सबसे पहले इस कमरे में चित्रगुप्त जी के समक्ष हाजिर होता है। चित्रगुप्त, जो धर्मराज के छोटे भाई हैं तथा उनके सचिव का कार्य भी संभालते हैं, सभी प्राणियों का लेखा-जोखा भी इनके पास होता है।

धर्मराज जी के इस अदभुत मन्दिर की सबसे ऊपर की पौडी पर लकीरें जैसी खुदी हुई हैं। ऐसा बताते हैं कि चित्रगुप्त आत्मा को यहां खडी करते हैं। फिर चित्रगुप्त उसके कर्मों का लेखा-जोखा बताते हैं। इसके ठीक सामने धर्मराज जी की कचहरी में कर्मों के हिसाब से उसके भविष्य का फैसला होता है।

मन्दिर के बाहर अदृश्य चारों दिशाओं को रास्ता बना है। धर्म के चार द्वारों, जो क्रमशः सोने, चांदी, लोहे एवं तांबे के बने हैं, में से कर्म के अनुसार एक दरवाजा खुलता है तथा फैसले के अनुसार आत्मा को उसी द्वार से फल भोगने के लिये भेजा जाता है।

श्री लक्ष्मणदत्त पुजारी ने बताया कि आम प्राणी के लिये तो यहां ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं देता मगर उनके गुरू श्री जयकृष्ण गिरि जो इसी मन्दिर के प्रमुख रहे हैं, ने यहां लोगों की इतनी आई-चलाई देखी कि पलक झपकने की फुरसत नहीं मिलती। अनेक अन्य पहुंचे हुए महात्मा भी बताते हैं कि परोक्ष रूप से धर्मराज जी का धाम यही है।

सदियों पुराने इस मन्दिर के ठीक सामने लगभग चार फीट ऊंचे बने एक विशाल मंच पर श्री सदाशिव का प्रतीक शिवलिंग है, जो गहरे काले रंग का है। इसमें बेमिसाल चमक है, जिसे देखने वाले मोहित हो जाते हैं। इस शिवलिंग की कहानी सुनाते हुए श्री पुजारी ने कहा कि सन 1905 एवं 1947 में आठ भूकम्पों में इस मन्दिर को काफी क्षति पहुंची थी। गुरूजी ने विक्रमी संवत 2029 में इसका जीर्णोद्धार कराया जो भूकम्प के कारण टेढे हो गये थे। शिवलिंग को सीधा करने के लिये श्रमिक लगाये गये थे। बारह फीट तक खोदकर भी जब उन्हें लिंग का आदि-अंत न पता चला तो गुरूजी ने भगवान श्री शिव से प्रार्थना की कि प्रभु आप तो अनन्त हैं, आप स्वयं अपनी सीधी स्थिति में आ जायें तो शिवलिंग स्वयं सीधा हो गया। तब श्री शिव ने गुरूजी को कहा कि टेढा होने से जो स्थान खाली हुआ है, उसे भर दिया जाये। तब इस मन्दिर को नया रूप दिया गया मगर शिवलिंग को युगों पुरानी उसी स्थिति में छोड दिया गया।

यात्रा वृत्तान्त: डा. जवाहर धीर

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

शुक्रवार, दिसंबर 02, 2011

चम्बा- श्रद्धा, शिल्प और सौन्दर्य का संगम

हिमाचल प्रदेश को अपने नैसर्गिक सौन्दर्य, अपनी समूची प्राकृतिक सम्पदा पर नाज है। हिमालय की गोद में बसे इस भूखण्ड को प्रकृति ने अत्यन्त मनोयोगपूर्वक सजाया है, संवारा है। जहां एक तरफ कल-कल करती नदियां, सौन्दर्य के दर्प में चूर उत्तुंग हिमशिखर, देववन व कंदराएं, शीतल मन्द मन्द बहती बयार, दुग्ध धवल झरने, सम्पूर्ण प्रदेश को विशेष आकर्षण शक्ति प्रदान करते हैं, वहीं लगभग छह हजार देवालयों व तीर्थ-स्थलों वाला यह प्रदेश आस्था का केन्द्र बना हुआ है। प्रदेश की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत, तीर्थ स्थल, पर्वतीय अंचल में छह विभिन्न शैलियों में निर्मित अति प्राचीन व कलात्मक इमारतें, अनूठे उत्सव व मेले तथा भोले-भाले सरल हृदयी हिमाचलवासी हर आगन्तुक को बार-बार आने का निमन्त्रण देते हैं।

इसी प्रदेश में एक जनपद है चम्बा, जहां पग-पग पर बिखरा सौन्दर्य आगन्तुकों की राह देखता है। कुछ ऐसी ही खूबियों को संजोये है मणि महेश की यात्रा, मिंजर मेला व कलात्मक मन्दिरों के लिये विख्यात अचम्भा कहा जाने वाला चम्बा।

पठानकोट से लगभग 120 किलोमीटर व डलहौजी से मात्र 47 किलोमीटर दूर रावी नदी के तट पर बसा चम्बा समुद्र तल से 996 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। पठानकोट, धर्मशाला, डलहौजी, शिमला व चण्डीगढ से चम्बा के लिये नियमित बस सेवा तथा डलहौजी से टैक्सी सेवा भी उपलब्ध है। चम्बा का निकटतम रेलवे स्टेशन पठानकोट देश के प्रमुख नगरों से जुडा हुआ है।

चम्बा के साथ इसके नामकरण व इतिहास को लेकर कई किंवदंतियां व रोचक घटनाएं जुडी हैं। अगर विस्तार से बात करें तो चम्बा के साथ भरमौर का जिक्र जरूरी हो जाता है। भरमौर प्राचीन काल में ब्रह्मपुर के नाम से जाना जाता था। मरु वर्मन नामक सूर्यवंशी राजा ने छठी शताब्दी में यहां अपना शासन कायम करने के बाद भरमौर (ब्रह्मपुर) को अपनी रियासत की राजधानी बनाया। इस तरह लगभग चार सौ वर्षों तक भरमौर चम्बा घाटी की राजधानी रहा। 920 ई. में तत्कालीन राजा मरु वर्मन के वंशज साहिल वर्मन ने अपनी राजधानी ब्रह्मपुर से बदलकर चम्बा कर दी। इस तरह चम्बा दसवीं शताब्दी में मरु राज्य की राजधानी बना और फिर शुरू हुई इसकी विकास यात्रा। कहते हैं कि साहिल वर्मन ने अपनी पुत्री चम्पावती के नाम पर अपनी नई राजधानी का नामकरण किया, जो कालान्तर में चम्बा हो गया। आज भी साहिल वर्मन की पुत्री के नाम पर चम्पावती मन्दिर चम्बा नगर के मध्य में विद्यमान है।

चम्बा का नामकरण साहिल वर्मन की सुपुत्री चम्पावती के नाम पर हुआ या इस क्षेत्र में बहुतायत में पाये जाने वाले चम्पा नाम के फूल पर हुआ, इस तथ्य को अगर यूं ही छोड दें, तब भी यह तो मानना ही पडेगा कि आज चम्बा को जो गौरव प्राप्त है, उसका अधिकतर श्रेय साहिल वर्मन को ही जाता है। इस राजा ने इस सम्पूर्ण क्षेत्र का विकास किया तथा अद्वितीय शिल्प एवं वास्तुकला से सुसज्जित कई कलात्मक मन्दिर निर्मित कराए।

कलात्मक मन्दिरों के लिये विख्यात चम्बा में यूं तो अनेक प्राचीन मन्दिर हैं, लेकिन प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच श्रेष्ठ शिल्प सौन्दर्य का जादू समेटे लक्ष्मीनारायण मन्दिर समूह अति प्राचीन एवं विख्यात है। शिखर शैली में उत्तर से दक्षिण की ओर निर्मित यह मन्दिर समूह समूचे प्रदेश में उत्कृष्ट वास्तुकला के प्रथम चार कलात्मक मन्दिरों में से एक है। छह मन्दिरों के इस भव्य मन्दिर समूह में सबसे विशाल एवं मुख्य मन्दिर श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर है। अन्य मन्दिर क्रमशः श्री राधाकृष्ण, श्री चन्द्रगुप्त, श्री गौरीशंकर, श्री अंबकेश्वर एवं श्री लक्ष्मीदामोदर के हैं। प्रांगण में कुछ अन्य लघु मन्दिर भी हैं। चम्बा के राजा जीत सिंह की विधवा रानी शारदा द्वारा निर्मित श्री राधाकृष्ण मन्दिर इस समूह में अपेक्षाकृत नवीन मन्दिर है, जबकि श्री लक्ष्मीनारायण एवं श्री चन्द्रगुप्त मन्दिर प्राचीनतम हैं, जिन्हें सम्भवतः 10वीं एवं 11वीं शताब्दी में राजा साहिल वर्मन ने बनवाया था। 16वीं शताब्दी में राजा प्रताप सिंह वर्मन के राज्यकाल में इन मन्दिरों का पुनरुद्धार हुआ। कश्मीर शैली में बनी संगमरमर की श्री लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा बहुत ही सुन्दर है, जो 10वीं शताब्दी से सम्बन्धित है।

मन्दिर की दीवारों के गवाक्षों का शिल्प 15वीं शताब्दी के बाद का है। दीवारों के बाहरी तरफ उकेरी गई मूर्तियां एवं स्वतन्त्र आकृतियां देखकर दर्शक प्रथम दृष्टि में ही सम्मोहित से हो जाते हैं। ये आकृतियां एवं मूर्तियां सम्पूर्ण मन्दिर को भव्यता एवं सौम्यता प्रदान करती हैं। इस मन्दिर समूह के अन्य मन्दिरों में स्थापित अति प्राचीन प्रतिमाएं भी दर्शनीय हैं।

लक्ष्मीनारायण मन्दिर समूह के अतिरिक्त चम्बा में चौगान के साथ रावी नदी की तरफ प्राचीन हरिराय मन्दिर भी अति महत्वपूर्ण एवं दर्शनीय है। शिखर शैली में निर्मित यह मन्दिर भगवान विष्णु को समर्पित है। मन्दिर का निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में राजा अष्ट वर्मन के राज्यकाल का है। मन्दिर का वर्गाकार गर्भगृह वक्ररेखीय शिखर से अलंकृत है तथा अंतराल दो नक्काशीयुक्त स्तम्भों पर स्थित है। मन्दिर में स्थापित बैकुण्ठ विष्णु की 1.17 मीटर ऊंची चतुर्मुखी कांस्य प्रतिमा उत्कृष्ट कला का अनुपम उदाहरण है।

चम्बा से लगभग तीन किलोमीटर दूर ऊपर पहाडी पर स्थित चामुण्डा देवी मन्दिर भी इसी शैली का है। यह मन्दिर भी दसवीं शताब्दी का है। मन्दिर में माता चामुण्डा की अष्टधातु निर्मित लगभग ढाई फीट ऊंची प्रतिमा अति सुन्दर है। मन्दिर परिसर में भगवान शिव का भी एक मन्दिर है, जो 1905 के कांगडा भूकम्प में एक तरफ झुक गया था और अब तक वैसे ही तिरछा खडा है। इसके अतिरिक्त चम्बा का रानी सुही देवी मन्दिर, बंसी गोपाल मन्दिर तथा चरपटनाथ मन्दिर भी अति प्राचीन व दर्शनीय हैं।

इसके अलावा यहां की अमूल्य लोक कला के कई बेहतरीन उदाहरण शहर के मध्य में स्थापित राजा भूरी सिंह संग्रहालय में देखे जा सकते हैं। वास्तुकला की दृष्टि से चम्बा के राजा उम्मेद सिंह (1748-1764) द्वारा निर्मित अखण्ड चण्डी पैलेस व रंगमहल भी अति सुन्दर व दर्शनीय हैं। 1958 में अखण्ड चण्डी पैलेस सरकार के स्वामित्व में आ गया तथा आज इसमें एक कालेज है।

शहर के बीच ही एक हरा भरा एक ऐतिहासिक मैदान है, जिसे चौगान कहते हैं। चम्बा का चौगान में ही आयोजित होता है विख्यात मिंजर मेला। इस चौगान ने चम्बा की लम्बी विकास यात्रा व इसके हर सुखद दुखद पहलू को बहुत करीब से देखा है। यहां से रावी नदी का नयनाभिराम दृश्य तथा उसमें झांकती पर्वत श्रंखलाएं देखी जा सकती हैं। शाम ढलने पर चम्बा के लोग व पर्यटक यहां घूमते-फिरते, खाते-पीते व मौज मनाते देखे जा सकते हैं। एक मेले का सा माहौल बना रहता है। वैसे भी चौगान पर वर्ष भर कोई ना कोई आयोजन चलता ही रहता है। मिंजर के अतिरिक्त दशहरा व सूही मेला इस मैदान पर होने वाले अन्य मुख्य आयोजन हैं।

चम्बा आने वाले पर्यटकों के लिये चम्बा के आसपास के दर्शनीय स्थल भी विशेष आकर्षण रखते हैं। मनमोहक स्थलों की इस श्रंखला में खजियार, डलहौजी व भरमौर अति सुन्दर व रमणीय पर्यटन स्थल हैं। खजियार, डलहौजी व भरमौर के अतिरिक्त चम्बा से सरोल (11 किलोमीटर), झामवार (10 किलोमीटर), साहू (20 किलोमीटर), सलूनी (56 किलोमीटर), कटासन देवी मन्दिर (30 किलोमीटर) का भ्रमण तथा कई पर्वत श्रंखलाओं की ट्रेकिंग भी की जा सकती है। खजियार व डलहौजी की चम्बा से दूरी क्रमशः 25 किलोमीटर व 45 किलोमीटर है, जबकि छठी शताब्दी के अति प्राचीन एवं महत्वपूर्ण मन्दिरों के लिये विख्यात भरमौर की चम्बा से दूरी 65 किलोमीटर है।


लेख: राकेश ‘मगन’
सन्दीप पंवार के सौजन्य से

मंगलवार, नवंबर 15, 2011

किन्नौर- धरती पर एक स्वर्ग

हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत घाटी है किन्नौर, जिसके नयनाभिराम सौन्दर्य से कोई भी पर्यटक सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सकता। एक जानकारी:

पांच हजार से आठ हजार मीटर ऊंची पर्वत श्रंखलाओं से घिरी किन्नौर घाटी धरती पर स्वर्ग से कम नहीं। घुमक्कड इसे बर्फ और झरनों की घाटी के साथ-साथ सौन्दर्य की खान तक कह देते हैं। यहां का सौन्दर्य नयनाभिराम है। प्रकृति के विभिन्न रूप यहां परिलक्षित होते हैं। आसमान छूते हिमशिखर, बादलों में लिपटे वृक्ष, सेब और केसर की सौंधी सौंधी महक, फूलों का परिधान ओढे घाटियां, बर्फीले झरनें, संगीत गुनगुनाती नदियां... सैलानी अभिभूत सा हो उठता है... प्रकृति के समक्ष नतमस्तक।

किन्नौर हिमाचल प्रदेश का कबायली इलाका है जिसका जिक्र महाभारत काल में भी मिलता है। कुछ इतिहासकारों के मत में अर्जुन ने जिस ‘इमपुरुष’ नामक स्थान को जीता था, वह वास्तव में किन्नौर ही था। कुछ विद्वानों की राय में पाण्डवों ने अपने अज्ञातवास का आखिरी समय यहीं गुजारा था। यह भी मान्यता है कि किन्नौर ने इसी क्षेत्र में महाभारत से बहुत पहले हनुमान के साथ राम की उपासना की थी।

कुछ समय पहले तक इस जनजातीय क्षेत्र में सैलानियों का बिना परमिट लिये प्रवेश वर्जित था जिससे इसकी सुन्दरता बरकरार थी। लेकिन गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी करके यह घाटी सैलानियों के लिये खोल दी है और अब वांगतू से शुरू होने वाली इनर लाइन से आगे प्रवेश करने के लिये परमिट लेने की जरुरत नहीं पडती। सिर्फ विदेशी सैलानियों को सुरक्षा की दृष्टि से किन्नौर की कल्पा और सांगला घाटियों से आगे जाने के लिये अनुमति लेनी पडती है।

इस अनूठी घाटी की यात्रा हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से शुरू होती है और कहीं सुरम्य तो कहीं खतरनाक, ढलानदार पहाडी सडकों पर गुजरती गाडी कभी मस्ती तो कभी रोमांच भर देती है। कहीं संकरे रास्ते किसी गुफा से गुजरने का भ्रम पैदा कर देते हैं तो कहीं सतलुज नदी पछाडें मारती साथ चलती सी लगती है। शिमला से छह घण्टे का सफर तय करने के बाद रामपुर बुशैहर नामक एक खूबसूरत और ऐतिहासिक स्थल आता है। हिन्दुस्तान-तिब्बत राष्ट्रीय मार्ग पर स्थित रामपुर के राजमहल पहाडी वास्तुकला के अनुपम उदाहरण हैं। रामपुर बुशैहर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के व्यापारिक मेले ‘लवी’ के लिये भी मशहूर है। यह मेला हर साल 11 से 14 नवम्बर तक हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस मेले का शुभारम्भ 1681 में बुशैहर रियासत के राजा केहरी सिंह और तिब्बत के बीच हुए व्यापारिक समझौते के परिणामस्वरूप हुआ था। इस समझौते को नमग्या अभिलेख के नाम से जाना जाता है जिसके अनुसार जब तक कैलाश पर्वत पर बर्फ जमी रहेगी और मानसरोवर में पानी रहेगा तब तक दोनों राज्यों में दोस्ती रहेगी।

रामपुर के बाद आता है ज्योरी और यहां तक का सफर बडा रोमांचकारी है। फिर अगला पडाव सराहन है जो शिमला की सीमा कुछ आगे खत्म होने की घोषणा करता है। सराहन भले ही एक खूबसूरत रमणीय गांव है लेकिन कभी यह बुशैहर रियासत की राजधानी था। यहां सुप्रसिद्ध भीमाकाली मन्दिर और चांदी पर अंकित देवप्रतिमाएं पर्यटकों पर जादू सा असर करती हैं।

पहाडों का वक्ष चीरकर जिस तरह सडकें बनाई गईं हैं, इंजीनियरों के अथक परिश्रम और कार्यकुशलता का नमूना हैं। रास्ते में झर-झर झरते झरनों को देखकर मन प्रफुल्लित हो उठता है। ऐसा ही सफर तय करके आता है भावनगर। हिमाचल की मशहूर संजय विद्युत परियोजना यहीं है। पूरी तरह से भूमिगत यह परियोजना उच्च स्तरीय तकनीक का जीवंत उदाहरण है। यहां से करीब दस किलोमीटर आगे वांगतू पुल है। पहले यहां पुलिस चौकी पर परमिट चैक किये जाते थे लेकिन अब यह क्षेत्र सैलानियों के लिये खोल दिये जाने के कारण ऐसा नहीं होता। लेकिन औपचारिकता निभाने के लिये पुलिसकर्मी अपनी तसल्ली जरूर करते हैं। वांगतू से आगे आता है टापरी और फिर कडछम। कडछम इस जिले की दो प्रमुख नदियों सतलुज और वास्पा का संगम कहलाता है। वास्पा नदी यहां सतलुज के आगोश में समा जाती है। यहां से एक मार्ग इस घाटी के एक खूबसूरत स्थल सांगला को जाता है।

सांगला किन्नौर की सर्वाधिक प्रसिद्ध और रमणीय घाटी है। समुद्र तल से करीब ढाई हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित सांगला घाटी को पहले वास्पा घाटी भी कहा जाता था। ऐसी भी मान्यता है कि पूरी सांगला घाटी कभी एक विशालकाय झील थी, लेकिन कालान्तर में इस झील का पानी वास्पा नदी में तब्दील हो गया और बाकी क्षेत्र हरियाली से लहलहा उठा। भले ही यह मात्र किंवदंती ही हो लेकिन रंगीन फसलों, फूलों का परिधान ओढे सांगला घाटी स्वर्ग से कम नहीं लगती। अनेक घुमक्कडों ने अपने संस्मरणों में इस घाटी के नैसर्गिक सौन्दर्य का वर्णन किया है। सांगला में बेरिंग नाग मन्दिर और बौद्ध मठ दर्शनीय है। सांगला में ही कृषि विश्वविद्यालय का क्षेत्रीय अनुसंधान उपकेन्द्र स्थित है। सांगला के ऊपर कामरू गांव है। यहां का पांच मंजिला ऐतिहासिक किला कला का उत्कृष्ट नमूना है। गांव के बीच में ही नारायण मन्दिर और बौद्ध मन्दिर स्थित हैं और दोनों मन्दिरों का एक ही प्रांगण है। नारायण मन्दिर की काष्ठकला देखती ही बनती है। सांगला घाटी से किन्नर कैलाश के दर्शन भी किये जा सकते हैं। वास्तव में किन्नर कैलाश के पृष्ठ भाग में ही यह घाटी फैली हुई है। यहां पर आप किन्नौरी शालें और टोपियां खरीद सकते हैं।

यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य की तरह यहां के लोग भी सुन्दर हैं। किन्नर बालाएं फूलों से सुसज्जित अपनी परम्परागत टोपियां पहनती हैं। टोपियों के दोनों ओर पीपल पत्र नामक चांदी का एक गहना बना होता है और चांदी के ही एक नक्काशीदार कडे पर कसा रहता है। अपने शरीर को ये ऊनी कम्बल से साडी की भांति लपेटे रखती हैं। इस ऊनी कम्बल को स्थानीय भाषा में ‘दोहडू’ कहा जाता है।

किन्नरियों में मेहमानों के आदर-सत्कार की भावना भी बहुत होती है। मेहमानों का स्वागत वे अपने हाथों से शराब पेश करके करती हैं। ऐसा करते समय उन्हें कोई संकोच नहीं होता, क्योंकि शराब को किन्नर समाज में महत्व प्राप्त है, लेकिन ताज्जुब की बात यह भी है कि जहां किन्नरियां शराब को बनाने से लेकर पेश करने तक का कार्य अपने हाथों से करती हैं, वहीं वे स्वयं शराब को मुंह तक नहीं लगातीं। शाल बुनने में तो उनका कोई सानी नहीं है। उनकी बनाई शालों में प्रकृति के विभिन्न रूप परिलक्षित होते हैं। सर्दियों में जब भारी बर्फबारी के कारण किन्नौर का सम्पर्क शेष दुनिया से कट जाता है तो किन्नरियां ऊनी कपडे, कालीन और अन्य चीजें बुनने का काम करती हैं। उनके बनाये ऊनी वस्त्रों में डोहरियां, पट्टू, गुदमा आदि उल्लेखनीय हैं।

सांगला से 14 किलोमीटर आगे रकछम गांव है। समुद्र तल से करीब तीन हजार मीटर की ऊंचाई पर स्थित रकछम का नामकरण रॉक और छम के मिलन से हुआ है। रॉक अर्थात चट्टान या पत्थर और छम यानी पुल। कहते हैं कभी यहां पत्थर का पुल हुआ करता था, जिस वजह से गांव का नाम ही रकछम पड गया। रकछम से 12 किलोमीटर दूर किन्नौर जिले का आखिरी गांव है- छितकुल। लगभग साढे दस हजार फीट की ऊंचाई पर चीन की सीमा के साथ सटा है यह गांव। आबादी होगी कोई पांच सौ के करीब। साठ-सत्तर घर हैं। एक ओर वास्पा नदी बहती है तो दूसरी ओर दैत्याकार नंगे पहाड दिखते हैं। साल में चार माह से ज्यादा यह हिमपात के कारण दुनिया से कटा रहता है। उत्तराखण्ड के गंगोत्री और चीन के तिब्बत इलाके से सटे इस गांव में आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी, पशु चिकित्सालय, ब्रांच पोस्ट ऑफिस, पुलिस पोस्ट और स्कूल जैसी आधुनिक सुविधाएं हैं।

सांगला के बाद दूसरी खूबसूरत घाटी कल्पा है, लेकिन कल्पा पहुंचने के लिये पहले फिर से करछम लौटना पडता है। करछम से करीब 20 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद आता है- पियो और यहां से 15 किलोमीटर आगे कल्पा है। दुर्गम चढाई तय करने के बाद जब सैलानी कल्पा पहुंचता है, तो एक शहर सरीखा कस्बा देख उसकी बांछें खिल जाती हैं। यही कल्पा किन्नौर घाटी का मुख्यालय है और यहां सभी आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं। कहते हैं कि यहां मूसलाधार बरसात नहीं होती बल्कि हल्की हल्की सी फुहारें पडती हैं। यहां के झरनों की छटा निराली है। ये गुनगुनाते झरने यहां सैलानी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं, वही यहां के खेतों और बागों को सींचते भी हैं।

किन्नौर घाटी वर्ष में तकरीबन छह मास बर्फ की सफेद चादर से ढकी रहती है। अगस्त से अक्टूबर तक का मौसम यहां खुशगवार होता है। इन्हीं दिनों यहां सैलानियों और घुमक्कडों का सैलाब उमडता है। सेब, खुबानी, चूली, बग्गूगोशे, चिलगोजे और अंगूर यहां उम्दा किस्म के होते हैं। अंगूर की शराब भी यहां बडे चाव से पी जाती है। किन्नौर में वर्ष भर त्यौहारों का सिलसिला चलता रहता है। ‘फूलैच’ किन्नौर घाटी का प्रमुख त्यौहार है। इस त्यौहार को ‘उख्यांग’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘उख्यांग’ दो शब्दों ‘ऊ’ और ‘ख्यांग’ से मिलकर बना है। ‘ऊ’ का अर्थ है फूल और ‘ख्यांग’ फूलों को देखना। यह त्यौहार फूलों के त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।

लेख: गुरमीत बेदी

संदीप पंवार के सौजन्य से

आप भी अपने यात्रा वृत्तान्त और पत्र-पत्रिकाओं से यात्रा लेख भेज सकते हैं। भेजने के लिये neerajjaatji@gmail.com का इस्तेमाल करें। नियम व शर्तों के लिये यहां क्लिक करें।

मुसाफिर हूं यारों- नीरज जाट का यात्रा ब्लॉग

मंगलवार, नवंबर 08, 2011

पांगी घाटी- रोमांचकारी अनुभव

पहाडों की सुन्दरता एवं विशालता के विषय में बातें करना या उनके बारे में कोई तस्वीर बनाना वास्तविकता से कहीं भिन्न है। पहाडों की विशालता व दुर्गम घाटियों की वास्तविकता को जानने का अवसर उन्हीं की गोद में जाकर या उनके सीने पर चलकर मिलता है। हमारी छोटी सी टीम को भी इसी प्रकार का अवसर मिला, जब हमने कुछ अरसे पूर्व पांगी घाटी (साच पास) से साक्षात्कार किया। हमारी भेल (बी.एच.ई.एल.) टीम अभी भी उस सुखद यात्रा के आनन्द से वशीभूत है।

पांगी घाटी हिमाचल प्रदेश का वह हिस्सा है, जो जम्मू कश्मीर की सीमा को छूता हुआ चलता है। पांगी घाटी की अपनी अलग सभ्यता और मनमोहकता है, जो पर्यटन के लिये एक विशेषता है। पांगी साल में नौ महीने बर्फ से ढकी रहती है।

हमने पांगी को क्यों चुना, यह कहना कठिन है परन्तु हमने किसी भी ऐसी कठिनाई का सामना नहीं किया जो हमारी इस यात्रा को कोई दुखद अनुभव देता। दिल्ली से रात को चलकर सुबह-सुबह पठानकोट पहुंचकर हमने चम्बा की बस लेकर 125 किलोमीटर का सफर हंसते हंसते तय किया। एक शाम चम्बा में रहकर सुबह फिर अपने ट्रैकिंग पाइण्ट पर पहुंचने के लिये बस ली और तरेला पहुंचे। तरेला ही हमारा वह प्रारम्भिक स्थान था, जहां से हमें पैदल यात्रा प्रारम्भ करनी थी। हमने अपने साथ कुछ खाने की सामग्री ले ली थी जिसके लिये हमने चम्बा से ही भरमौर के दो वासी साथ ले लिये थे। जो अन्त तक हमारे साथ रहे। वे वहीं के वासी थे और हमें उनका काफी सहारा रहा। हमारे सभी नौ साथियों के पास रकसैक (पिट्ठू) थे, जिनमें वस्त्र व अन्य आवश्यक वस्तुएं थीं।

तरेला से हमारी चढाई का क्रम आरम्भ हो गया। पहला पडाव हमने उसी दिन भनौडी में एक नेपाली ढांचे में किया। भनौडी की ऊंचाई लगभग 2744 मीटर है।

भनौडी से चढाई के क्रम को जारी रखते हुए हम सतरुंडी पहुंचे। यह रास्ता बडा ही दुर्गम पर मनोरम था। चढाई ऐसे आती थी, मानों खत्म ही नहीं होगी परन्तु प्रकृति का स्वस्थ व मनमोहक वातावरण हमें थकान से उबार रहा था। सतरुंडी 3658 मीटर ( 12000 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है। जहां से हमें ट्रैकिंग का सबसे ऊंचा स्थान ‘साच पास’ पार करना था। हमने एक रात वहीं पर काटी। अगले दिन प्रातः पांच बजे ही हम सभी चल पडे साच पास की ओर। कुछ ही घण्टों में हमने अपनी ट्रैकिंग के सबसे ऊंचे स्थान पर जाकर 14500 फीट की ऊंचाई का आनन्द लिया। यहीं से हमने अगले दो पडाव तक बर्फ व बर्फ की नदियों (ग्लेशियर) का सामना किया और अपने अगले पडाव बगोटू पर जाकर ही दम लिया। ग्लेशियर जो सितम्बर के महीने में पिघलने लगते हैं, थोडे से खतरनाक हो जाते हैं। परन्तु सावधानी व साहस से उनका मुकाबला किया जा सकता है।

ग्लेशियर पर चलने का आनन्द ही अलग है। उन ग्लेशियर का सामना हमने अपने अगले पडाव बिंद्रावनी तक किया। बिंद्रावनी में बर्फ से पीछा छूटा। इस पडाव के बाद आगे का रास्ता आसान ही रहा। हम चंद्रभागा पुल से होते हुए चंद्रभागा नदी के किनारे-किनारे परन्तु लगभग 1000 फीट ऊपर चलते-चलते किलाड पहुंचे। यहां पर पी.डब्ल्यू.डी. के बंगले में कुछ वक्त गुजारा। यहां पर कुछ कश्मीरी आतंकवादियों की घुसपैठ से छोटी सी तहसील आतंकित थी। अतः हमने खाना खाकर बंगले में ही सो जाना उचित समझा। किलाड के बाद हमने अपने पडाव चेरी बंगला व पूर्थी में डाले । ये सभी जगहें पांगी में ही आती हैं।

पांगी में ट्रैकिंग एक अलग ही अनुभव है। अलग संस्कृति, अलग भाषा, अलग पहनावा, अलग प्रकृति, यह सब पांगी घाटी की ट्रैकिंग की विशेषताएं हैं, जो वहीं पर अनुभव की जा सकती हैं। पांगी घाटी ट्रैकिंग में हमने पूरे दस दिन पैदल यात्रा की और पूर्थी से बस लेकर उदयपुर, लाहौल-स्पीति होते हुए मनाली आये। यहां से दिल्ली की बस लेकर वापस लौटे।

लोग अक्सर ट्रैकिंग के नाम से भयभीत होते हैं परन्तु पांगी जैसे दुर्गम रास्ते में भी ट्रैकिंग को एक खेल की तरह किया जा सकता है। बशर्ते आपके अन्दर प्रकृति को देखने और समझने की चाह हो। हमारे जैसे मानव वहां भी बसते हैं और पूरा जीवन उन्हीं वादियों में हर तरह के मौसम में काटते हैं। दरअसल ट्रैकिंग का अनुभव प्रकृति व मानव के निकटतम सम्बन्धों को जानने का बहुत ही सुन्दर साधन है। यदि कुछ समय निकालें तो ट्रैकिंग पर अवश्य जायें। इससे प्रकृति की आवश्यकता को समझने और पर्यावरण की जरूरत महसूस करेंगे।

पांगी घाटी (साच पास) ट्रैकिंग के लिये विस्तृत ब्यौरा हिमाचल पर्यटन कार्यालयों से लिया जा सकता है।

यात्रा वृत्तान्त: सुनील चौधरी

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

सोमवार, नवंबर 07, 2011

भंगाल घाटी- इक्के दुक्के पर्यटक ही जहां का लुत्फ उठा पाते हैं

हिमाचल की कांगडा घाटी अपने नैसर्गिक सौन्दर्य के लिये ही नहीं मशहूर है, अपितु हिमशिखरों पर बने देवालयों, भोले-भाले लोगों, अनूठी धार्मिक परम्पराओं, रीतिरिवाजों और अनमोल प्राकृतिक सम्पदा के लिये भी विख्यात है। यहां एक बार आया सैलानी बार-बार आने को लालायित रहता है। वैसे तो इस घाटी में ऐसे अनेक स्थल हैं जो सैलानियों को मोह लेते हैं लेकिन जहां तक भंगाल घाटी का सवाल है, यहां का सौन्दर्य दैवीय है और यहां एक बार की गई यात्रा की स्मृतियां उम्र भर के लिये मानस पटल पर अंकित हो जाती हैं।

भंगाल कांगडा जिले की सबसे दुर्गम घाटी है और सरकारी कर्मचारी इसे कालापानी तक कह देते हैं क्योंकि यहां अधिकतर क्षेत्रों में न तो सडक मार्ग हैं और न ही जीवन की भौतिक सुविधाएं। वैसे भी बर्फबारी के कारण साल में पांच महीने इस घाटी का सम्पर्क शेष दुनिया से कटा रहता है। घाटी में यातायात के साधन नाममात्र के हैं, अतः सैलानियों का सैलाब तो यहां नहीं उमडता लेकिन रोमांच प्रेमी पर्यटक, घुमक्कड और पर्वतारोहण के शौकीन यहां अक्सर दस्तक देते रहते हैं।

पोलिंग, रूलिंग, नलौता, राजगुंदा, कुकडगुंदा, बडाग्राम और प्लाचक इस घाटी के दर्शनीय स्थल हैं। आकाश का सीना नापते हिमशिखर, झर-झर करते झरने, शीतल हवा के झौंके, तोष, कैल और रई के गगनचुम्बी वृक्ष बरबस ही मन मोह लेते हैं। सभी स्थल छह से दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं और यहां का अस्सी फीसदी क्षेत्र जंगल से घिरा है। इन जंगलों से गुजरते हुए भेड बकरियों के झुण्ड के साथ गुजरते गडरिये भी मिलेंगे और दूर कहीं से उठती बांसुरी की मधुर तान भी सुनने को मिलेगी। जडी बूटियां और लकडी चुनने आई हिमबालाओं के लोकगीतों के बोल भी पल भर के लिये ठिठकने को मजबूर कर देंगे।

इस घाटी के विवाह संस्कार निराले हैं। पचास फीसदी विवाह प्रेम-विवाह होते हैं जिन्हे ‘झंझराडा’ कहा जाता है। इस प्रथा के अन्तर्गत प्रेमी अपनी प्रेमिका को घर ले जाता है और घरवालों को इस शादी के लिये मान्यता प्रदान करनी पडती है। तयशुदा शादियां भी दूर-दराज नहीं होतीं अपितु साथ लगते गांवों में ही तय हो जाती हैं। आमतौर पर लडके या लडकी की शादी इक्कीस वर्ष की उम्र तक हो जाती है। बिरले ही ऐसे युवक-युवतियां मिलेंगे जो पच्चीस वर्ष के हो जाने पर कुंवारे बैठे हों।

‘झंझराडा’ के अलावा विवाह की एक प्रथा ‘बट्टा-सट्टा’ नाम से है। इसके अन्तर्गत विवाह में लडका पत्नी प्राप्त करने के लिये अपनी चचेरी या फुफेरी बहन को अपनी पत्नी के भाई से ब्याहता है। एक अन्य प्रथा ‘चोली-डोरी’ संस्कार है, जिसके अन्तर्गत अपने पति की मृत्यु के बाद विधवा स्त्री अपने जेठ या देवर (अगर वह कुंवारा हो) से विवाह कर लेती है। एक अन्य परम्परा ‘बरमाना विवाह’ है। ऐसे विवाह में कन्या का पिता लडके से या फिर उसके मां-बाप से कुछ रुपये ले लेता है और निश्चित राशि मिलने पर अपनी कन्या उस घर में ब्याह देता है।

देवी-देवताओं की इस समाज में बहुत मान्यता है और हर महत्वपूर्ण काम यहां तक कि फसल की बिजाई भी देवता की अनुमति से होती है। ‘अजय पाल’ और ‘गोहरी’ इस घाटी के प्रमुख ग्रामीण देवता हैं। ये देवता प्रतीकात्मक रूप से मन्दिरों में विराजमान हैं और अपने चेलों, जिन्हें गुर कहा जाता है, के माध्यम से जनता को आदेश सुनाते हैं। गुर को देवता का प्रवक्ता माना जाता है और उसकी हर बात को गांववासी सिर मत्थे लेते हैं। उपरोक्त देवताओं के अलावा ‘कैलू’ देवता के प्रति यहां के लोगों की अगाध आस्था है। लेकिन यह देवता आदेश नहीं सुनाता। वास्तव में कैलू शब्द कुल अर्थात वंश का अपभ्रंश है यानी कुल का देवता। इस देवता से सम्बन्धित एक विचित्र बात यह है कि केवल स्त्रियां ही इस देवता की पूजा-अर्चना कर सकती हैं। पुरुषों का देवता के स्थान पर प्रवेश वर्जित है। कैलू देवता की आराधना भी केवल शादीशुदा स्त्रियां ही करती हैं। स्थानीय परम्पराओं के अनुसार जब युवती की शादी हो जाती है, तो उस दिन से वह कैलू देवता की पूजा अर्चना शुरू कर देती है। अगर शादी के बाद लडकी कैलू देवता को अपने ससुराल भी ले जाना चाहे तो उस पर कोई रोक नहीं है। कैलू देवता की स्थापना तब ससुराल पक्ष के घर से कुछ ही दूरी पर कर दी जाती है। यदि ऐसा न हो पाये तो देवता की आराधना के लिये लडकी को अपने मायके आना पडता है।

घाटी के गांवों में किसी के यहां जन्म और मौत पर लोग खेतों पर काम नहीं करते। अगर कोई ऐसा करता है तो उसे जुर्माने के रूप में बकरे या भेडू की बलि देवता को चढानी पडती है। जन्म या मृत्यु की सूचना देने के लिये गांव का एक व्यक्ति पूरे गांव में आवाज लगाता है- जूठ, जूठ। गांववासी इसका अर्थ समझ जाते हैं। घाटी के 95 फीसदी लोग मांसाहारी हैं और शराब के भी शौकीन होते हैं। हर त्यौहार को ये बडे चाव से मनाते हैं और लोकनृत्यों में भी पूरी उमंग से हिस्सा लेते हैं।

इस घाटी के भ्रमण के लिये अप्रैल से मई तक और फिर सितम्बर से नवम्बर तक का मौसम सर्वाधिक उपयुक्त है। जून-जुलाई में भारी वर्षा से भूस्खलन का खतरा हर पल बना रहता है। और दिसम्बर में बर्फबारी से इस घाटी का सम्पर्क शेष दुनिया से कट जाता है। कई बार तो नवम्बर माह के शुरू में ही बर्फबारी से सारे रास्ते बन्द हो जाते हैं। यहां के रमणीय स्थलों का अस्सी फीसदी सफर पैदल ही तय करना पडता है। अतः केवल रोमांच प्रेमी, घुमक्कड व पर्वतारोही ही इस घाटी के अछूते सौन्दर्य से साक्षात्कार कर सकते हैं।

लेख: गुरमीत बेदी

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

शनिवार, नवंबर 05, 2011

पांगी- अब कालापानी नहीं है

हिमशिखरों के बीच पसरा एक जादुई लोक, रहस्य और रोमांच का अनूठा मेल। कभी कालापानी कहा जाता था इसे लेकिन अब यह धारणा बदल रही है। हिमाचल प्रदेश की दुर्गम, जनजातीय घाटी पांगी में जाने वाले सैलानी जब इस जादुई लोक से लौटते हैं तो यहां बार-बार आकर घूमने का सपना उनकी आंखों में झिलमिलाता दिखता है। पहाड, बर्फ, पेड, जडी बूटियों की महक, सरसराती हवाएं, संकरी चट्टानों से बहती नदियों का नाद, हरियाली घाटियां, चरागाहें ही सैलानी को यहां आने का न्यौता नहीं देती, अपितु यहां की समृद्ध संस्कृति, निराली बोलियां, भोले भाले ग्रामीण, अनूठा पहनावा-खानपान और सबसे बढकर जिन्दादिल मेहमानबाजी सैलानी के मन पर इस खूबसूरती से दर्ज हो जाती है कि वह बार-बार यही लौटना चाहता है।

आज का पर्यटक महानगरों की चकाचौंध संस्कृति और फाइवस्टार होटलों से निकल, एकदम शान्त और अछूते स्थलों में जाना चाहता है। जहां चारों ओर प्रकृति ही प्रकृति बिखरी पडी हो, पुरानी सभ्यताओं के अवशेष हों, वन्य प्राणियों का अस्तित्व हो। पांगी घाटी सैलानियों की उम्मीदों पर खरी उतरती है। लेकिन केवल उन्हीं सैलानियों को यह रास आ सकती है जो निजी वाहन को छोड कर पैदल सैर का रोमांच लेना चाहते हों। साहसिक पर्यटन के शौकीनों के लिये तो सचमुच स्वर्ग है यह घाटी।

पांगी घाटी आठ दर्रों से घिरी है और ये सभी दर्रे तेरह हजार फीट की ऊंचाई से सोलह हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। दर्रा साच, दर्रा मध, दर्रा चनैनी, दर्रा द्राटी, दर्रा काली छोह, दर्रा कुगति, दर्रा चोमिया और दर्रा रोहतांग नाम के ये दर्रे हैं। लेकिन पांगी पहुंचने के लिये ये सभी दर्रे नहीं लांघने पडते। क्योंकि ये सब अलग-अलग दिशाओं में स्थित हैं। पांगी पहुंचने के लिये रास्ते भी अलग-अलग हैं। एक रास्ता चम्बा से, दूसरा जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड से और तीसरा लाहौल घाटी के त्रिलोकनाथ से जाता है। इनमें से पांगी के लिये चम्बा और लाहौल से जाने वाले रास्ते तो सर्दियों में भारी बर्फबारी से बन्द हो जाते हैं लेकिन किश्तवाड से होकर जाने वाला रास्ता सर्दियों में भी चालू रहता है। पहले पांगी घाटी पहुंचने के लिये सडक नहीं थी लेकिन अब पांगी घाटी के मुख्यालय किलाड तक सडक पहुंच जाने से यह जादुई लोक सैलानियों के लिये कल्पनालोक नहीं रहा।

चम्बा जिले में करीब चौदह हजार फीट की ऊंचाई पर पांगी घाटी 1650 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली है। आमतौर पर धारणा है कि यहां पहले बस्तियां नहीं थीं और एक तरह से इसे कालापानी कहा जाता था। जिस तरह अंग्रेज सरकार गुलामी के दौर में आजादी की मशाल उठाने वालों को कालापानी की सजा दे देती थी, उसी तरह दूरवर्ती राज्यों के शासकों द्वारा जिन अपराधियों और राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाना होता था, उन्हें यहां धकेल दिया जाता था। कुछ विद्वान यहां के निवासियों को पडोसी क्षेत्रों के उन लोगों का वंशज मानते हैं जो मुस्लिम हमलावरों के बार-बार के हमलों से उकताकर, चैन से अपनी जिन्दगी बिताने के लिये यहां भाग आये थे और यही हिमशिखरों के आगोश में उन्होंने अपने बसेरे बनाकर एक नई दुनिया रच ली। ऐसी मान्यताएं और भी हैं और इनसे जुडी किंवदंतियां भी। अपने नैन-नक्श के हिसाब से यहां के लोग दो श्रेणियों में बंटे हैं। एक वे जिनके नैन-नक्श मंगोलों की तरह हैं और दूसरे वे जिनके नैन-नक्श आर्यों से मिलते जुलते हैं। इन सभी लोगों को पंगवाले कहा जाता है यानी पांगी घाटी के खूबसूरत निवासी। जो प्रकृति के रंग में भी रंगे हैं और मेहमाननवाजी का सलीका भी जानते हैं।

पांगी के लोगों ने अपनी संस्कृति और परम्पराओं को मूल रूप से सहेजकर रखा है। हालांकि आजादी से पहले और बाद में भी मिशनरी पांगी जाते रहे, लोगों को धर्म परिवर्तन की प्रेरणा देते रहे लेकिन भावुक होकर या पैसों के लालच में आकर पंगवालों ने अपनी संस्कृति नहीं छोडी। पांगी के समाज में जागायें (धार्मिक यात्राएं), मेले, सामाजिक त्यौहार और देवीपूजन की परम्पराएं उतना ही महत्व रखती हैं जितनी कि वनस्पतियों के फलने-फूलने में ऋतु चक्र का महत्व है। पांगी में आमतौर पर संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित है और घर के बुजुर्ग की आज्ञा की तौहीन करना पंगवालों की फितरत में नहीं है। ऐसे सामाजिक संस्कार हैं इनके। इन संस्कारों के चलते बुजुर्ग भी स्वयं को उपेक्षित महसूस नहीं करते और न ही उनमें कोई हीन भावना पनपती है। पंगवालों में भ्रातृत्व की भावना इतनी बुलन्द होती है कि एक परिवार का सुख-दुख पूरे गांव का साझा होता है।

पांगी घाटी के विवाह संस्कार भी निराले हैं। एक ही गांव में शादियां नहीं की जाती क्योंकि सामाजिक मर्यादा के तहत गांव के युवक-युवतियां भाई-बहन माने जाते हैं। पहले गांव में अपहरण के जरिये अपनी पसंदीदा युवती से शादी की जा सकती थी। लेकिन अब गांववासी जागरुक हो गये हैं, प्रशासन तो सजग है ही। घाटी की लडकियों को जबरन अपना बनाना अब आसान काम नहीं है। पंगवाला समाज में शादियां तीन चरणों में होती हैं जिन्हें पीलम, फरबी और चरबी के नाम से जाना जाता है। शादी में लडकी की सहमति सर्वोपरि मानी जाती है। पहले चरण में लडके-लडकी के अभिभावक अपने बच्चों की शादी तय करते हैं। दूसरे चरण में लडकी परम्परा और कानून की नजर में लडके की जीवनसंगिनी बन जाती है लेकिन लडके के घर नहीं जाती। उसे इंतजार रहता है शादी के तीसरे चरण यानी ‘चरबी’ संस्कार के सम्पन्न होने का, जब दूल्हा बारात लेकर उसे लिवाने आता है। उस रात समूह भोज और नृत्यों का आयोजन होता है।

नाचगाने के तो पंगवाले बहुत शौकीन हैं। सामूहिक नृत्य को घुरेई कहा जाता है। इसमें मर्द-औरतें एक दूसरे का हाथ पकडकर, कदम से कदम मिलाकर नृत्य करते हैं। नृत्यों के दौरान गीतों की तर्ज भी अपनी ही किस्म की होती है और यह नृत्य बडी धीमी गति से किया जाता है। पांगी घाटी के लोकगीतों में पंगवालों का दुख दर्द, घाटी की खूबसूरती, झरने, नाले और बर्फीली ढलानें सजीव होती दिखती हैं। पंगवालों के सजने संवरने का ढंग भी निराला है। महिलाओं का पहनावा तो देखते ही बनता है। चूडीदार पायजामा और ऊपर रंग-बिरंगी चादर, सिर पर जोजी (एक किस्म का आभूषण), कानों में दर्जनों मुरकियां, नाक के लौंग, बाहों में टोके और बंगे, गले में डोडमाला और तबीत की सजावट... भीड में खडी पंगवालिनें दूर से ही दिख जाती हैं। गजब का हुनर भी है पंगवालिनों के हाथ में। रंग बिरंगे डिजाइनदार ऊनी कम्बल, ऊनी पट्टियां, शालें, गुदमें और चटाईयां बनाने में इनका कोई सानी नहीं।

पांगी घाटी में भोट जनजाति के लोक भी रहते हैं लेकिन इनके ठिकाने जांस्कर पर्वत श्रंखला से सटी ऊंची उपत्यकाओं में हैं। ये लोग बौद्ध मत के अनुयायी हैं और गोम्पाओं में जाकर पूजा अर्चना करते हैं। गोम्पाओं में की गई बौद्ध चित्रकला और काष्ठकला देखते ही बनती है। भोट बस्तियों को यहां बोलचाल की भाषा में ‘भुटोरियां’ कहा जाता है। इन भुटोरियों में सुराल भुटोरी, कुमार भुटोरी, हिल्लोटवान भुटोरी, चस्क भुटोरी, हुडान भुटोरी और परमार भुटोरी प्रमुख हैं। ये तमाम भुटोरियां अपनी प्राकृतिक छटा के लिये मशहूर हैं लेकिन यहां पहुंचने के लिये टांगों में खूब दमखम चाहिये। बिना शारीरिक कसरत के प्रकृति के अनूठे सौन्दर्य से तो साक्षात्कार नहीं किया जा सकता। पांगी घाटी के कुछ गांवों से जुडा एक अजूबा यह भी है कि यहां खेतों में जौं, गेहूं, फुल्लज और भरेस की फसलें एक साथ लहलहाती देखी जा सकती हैं।

पांगी के दर्शनीय स्थलों में धरवास, मिंघल, साच, किलाड, लुज, पुर्थी, सुराल व हुडान प्रमुख है। यहां ठहरने की व्यवस्था वन विभाग के विश्राम गृहों में हो सकती है। अब तो दूसरंचार सुविधाओं से भी जुड गया है पांगी। किलाड-पठानकोट और किलाड-भुन्तर (कुल्लू) हवाई मार्ग से निर्धारित तिथियों को उडानें भरी जाती हैं। सरकारी कर्मचारियों को यहां जनजातीय क्षेत्र की सुविधाएं प्राप्त हैं। अब अत्यन्त दुर्गम और कालापानी नहीं रहा पांगी। धौलाधार, जांस्करधार और पांगीधार की हिमानी श्रंखलाओं से घिरी पांगी घाटी अब गर्मियों के मौसम में सैलानियों की बाट जोहती दिखती है।

लेख: गुरमीत बेदी

सन्दीप पंवार के सौजन्य से

शुक्रवार, नवंबर 04, 2011

भंगाल- कुदरत की गोद में

धौलाधार की हिममण्डित पर्वत श्रंखलाओं से घिरे कांगडा जिले का एक सुरम्य स्थल है- भंगाल। समुद्र तल से आठ हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित रावी नदी के किनारे बसा भंगाल धरती पर प्रकृति का स्वर्ग कहा जा सकता है। तोष, देवदार और कैल के गगनचुम्बी पेडों से सुशोभित इस स्थल में प्रकृति झूमती, गाती, इठलाती प्रतीत होती है।

भंगाल चूंकि सडक मार्ग से नहीं जुडा है, अतः घुमक्कड और रोमांच प्रेमी सैलानी ही यहां के नैसर्गिक सौन्दर्य को आत्मसात कर सकते हैं। इस दुर्गम स्थल का राहुल सांकृत्यायन ने भी भ्रमण किया था। अपने संस्मरणों में उन्होंने लिखा है- ‘यहां चार-पांच दर्जन कनैत लोगों के घर हैं। जाडों में हिमपुंज यहां गिरते रहते हैं, जिसके कारण कितने ही घर बह जाते हैं। उपत्यका की तीन दिशाओं में रावी के करीब करीब किनारे कितने ही शिखर हैं, जिनकी ऊंचाईयां 17000 फीट से 20000 फीट है। निचले भागों में कितने ही बहुत सुन्दर देवदार के जंगल हैं और ऊपर कितनी ही हिमानियां हैं।’ भंगाल तालुके का आधा भाग छोटा भंगाल कहा जाता है जो धौलाधार के दक्षिण की ओर फेंकी 10000 फीट ऊंची एक पर्वत श्रेणी द्वारा दो हिस्सों में बांट दी जाती है। यह पर्वत श्रेणी बीड और कोमन्द के ऊपर से फताकाल होती मण्डी की ओर जाती है। इस पर्वत श्रेणी के पूर्व के भूभाग को कोठीसोवार अथवा अन्दरला और बाहिरला बाढ गढ कहते हैं। इसी में अहल नदी का स्रोत है। इस इलाके में कनैत आदि लोगों के 18-19 गांव हैं जो उपत्यका के निचले भाग में बिखरे हुए हैं। इसकी ढलानें बहुत तीखी हैं।

भंगाल की भौगोलिक स्थिति भी बडी दिलचस्प है। इसके उत्तर में लाहौल-स्पीति, उत्तर-पश्चिम में चम्बा और उत्तर पूर्व में कुल्लू जिला स्थित है। यहां तक पहुंचने के भी तीन रास्ते हैं। अगर कांगडा जिले के बीड से जाना हो तो 71 किलोमीटर पैदल चलना पडता है। रास्ते में 15546 फीट ऊंचा थमसर दर्रा भी नापना पडता है। दूसरा रास्ता चम्बा होते हुए है और 45 किलोमीटर का पैदल सफर है। तीसरा रास्ता कुल्लू जिले के पतलीकुहल से है। रास्ते में कालीहनी दर्रा लांघना पडता है। इतना कठिन और दुर्गम सफर तय करने के बाद जब सैलानी भंगाल पहुंचता है तो उसे प्रकृति का एक बिल्कुल नया और अछूता रूप दिखता है। सारी थकावट पल भर में छूमन्तर हो जाती है। ढलानों पर बने यहां के लोगों के रैन-बसेरे और जडी बूटियों की महक सैलानी को किसी स्वप्नलोक में ले जाती है।

भंगाल दो भागों में बंटा है। ऊपर के क्षेत्र को स्थानीय लोग ‘ग्रां’ कहते हैं और नीचे बसा गांव ‘फाली’ कहलाता है। ‘ग्रां’ की प्राचीनता निर्विवाद है। फाली बाद में आबाद हुआ है। क्षेत्र के वयोवृद्ध पूर्व प्रधान दानू राम बताते हैं- भंगाल का पूरा क्षेत्र 204 वर्गमील है। यहां के सभी वाशिंदे कनैत राजपूत हैं। अलग-अलग आठ खानदानों के ये राजपूत अलग-अलग स्थानों से यहां आकर बसे हैं। भंगालिये राजपूत सबसे पहले बंगाल से यहां आकर बसे। उसके बाद लाहौर से हुदिये राजपूत आये।

भंगाल में रावी नदी के साथ कालीहाण की सहायक नदी मिलती है। इस नदी का उदगम ‘रई गाहर’ नामक स्थान से हुआ है और रावी नदी का नाद दूसरी नदियों से अधिक है। रई गाहर को सात बहनों का निवास स्थान माना जाता है। भंगाल क्षेत्र में इस बारे में एक प्राचीन गाथा प्रचलित है। इसके अनुसार रई गाहर में एक प्राचीन दुर्ग था, जिसे हनुमान का किला कहा जाता था। इस किले में ‘सत भाजणी’ (सात भगनियां) रहा करती थीं। इनमें आपस में बहुत स्नेह था। किसी अनकहे कारण या घटनावश एक रात छह बडी बहनें छोटी बहन को सोया छोड रई गाहर से दूर विभिन्न स्थानों को चली गईं। बेचारी छोटी बहन जब जागी, स्वयं को अकेला पाकर रोने लगी। उसके नेत्रों से इतने आंसू बहे कि उन्होंने नदी का रूप धारण कर लिया और स्वयं रावी नदी बन गई। अपने उदगम क्षेत्र में काफी दूर तक रावी का बहाव बहुत तेज, भयंकर आवाज करता है। यह आवाज उसके करुण क्रंदन की है। उसकी बहनों के कान में भी यह घोर ध्वनि पहुंची। वे जान गईं कि उनकी लाडली बहन निराश, हताश, असहाय पडी रो रही हैं। वे भी रो पडी और रोते रोते नदियां बन गईं। इस प्रकार वे सात बहने, सात भजणियां, विभिन्न उदगमों से प्रवाहित होने लगीं। उनका नाम पडा- गंगा, यमुना, सरस्वती, सतलुज, व्यास और चिनाब।

रावी भले ही आज देश की अन्य नदियों की भीड-भाड में खोई-खोई लगे, किन्तु वैदिक काल में इस नदी ने समाज तथा राष्ट्र के जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऋग्वेद में रावी, जिसे तब ‘परुष्णी’ कहा जाता था, काफी चर्चित थी। इसकी गणना सप्त सिन्धु अथवा सप्त नदों में होती थी। शायद यही वैदिक कालीन विश्वास की ही प्रतिच्छाया है कि भंगाल के लोग सतभाजणी को देवी रूप में पूजते हैं। इसके अलावा लोग यहां अजयपाल, केलंग वीर, शिवशक्ति, इलाके वाली भगवती, डंगे वाली भगवती और मराली देवी के उपासक हैं। गांव में इन सभी देवी-देवताओं के मन्दिर हैं। गांववासी इन देवताओं की रहनुमाई में ही सारा कामकाज करते हैं। यहां तक फसल की बिजाई व कटाई भी।

सर्दियों के दिनों में भंगाल कई-कई फीट बर्फ से ढक जाता है। इन दिनों यहां के अधिकतर वाशिंदे बीड और बैजनाथ क्षेत्र में आ बसते हैं। कुछ लोग चम्बा चले जाते हैं। यहां इन्होंने अपने घर बनाये हैं और कृषि योग्य भूमि भी खरीद रखी है। भंगाल पंचायत के प्रधान श्री प्रेमदास ने तो बीड में बहुत खूबसूरत घर डाला है और जीप रखी है। गर्मियां वह भंगाल में ही गुजारते हैं।

भंगाल के लोगों का पुश्तैनी व्यवसाय भेड बकरी पालन है और जडी बूटियों की भी इन्हें खासी पहचान है। भंगाल में आजादी के इतने सालों बाद भी बिजली नहीं पहुंची लेकिन आयुर्वेदिक औषधालय, गार्डखाना, पटवारखाना, प्राइमरी स्कूल, आंगनबाडी केन्द्र और राशन का डिपो जैसी सुविधाएं लोगों को मुहैया हैं। यहां किसी तरह अगर सडक बन जाये तो जालसू दर्रे के रास्ते भंगाल तक साल में सात-आठ महीने आवागमन बना रह सकता है।

भंगाल के लोगों की वेशभूषा भी निराली है और आगन्तुक को सहज ही आकर्षित करती है। पुरुष ऊनी चोला, कमर पर काला डोरा और सिर पर पगडी पहनते हैं। महिलाएं गद्दिनों की तरह चादरु ओढती हैं और ‘लुआंचडी’ भी लगाती हैं। लुआंचडी यहां की महिलाओं के परम्परागत परिधान का नाम है।

लेख: इकबाल

सन्दीप पंवार के सौजन्य से